दौसा राजस्थान में जयपुर क्षेत्र का एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थान है। यह नगर जयपुर से 54 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। यह पुरातात्त्विक सम्पदाओं से युक्त एक कस्बा है, जो वर्तमान में जिला मुख्यालय है। प्राचीनकाल में यह स्थान द्यौसा, देवसा आदि नामों से पुकारा जाता था, जो कालान्तर में दौसा हो गया। यह कस्बा देवगिरि नामक पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ है। इसकी स्थिति 26:54’ और 76’21’ के बीच है।
हिस्ट्री ऑफ जयपुर स्टेट के लेखक डॉ. मथुरालाल शर्मा के कथनानुसार कछवाहा शासक दूलहराय ने अपना पैतृक किला ग्वालियर अपने परिवार सरकारी की देख-रेख में छोड़कर स्वयं राल्हणसी चौहान की कन्या से विवाहार्थ लालसोट की ओर रवाना हुआ। राल्हणसी ने दौसा का आधा भाग दूलहराय को दहेज में दे दिया और दूसरे आधे भाग पर जो बड़गूजरों के अधीन था, कब्जा कराने का आश्वासन दिया। आगे चलकर पूरा दौसा दूलहराय के अधिकार में आ गया। ढूँढाड़ प्रदेश में दौसा कछवाहों की प्रथम राजधानी बना। आगे चलकर सारे ढूँढाड प्रदेश पर कछवाहा वंश के शासकों का कब्जा हो गया। दौसा अत्तीव प्राचीन स्थान है। कनिंघम के सहायक कार्लाइल ने सन् 1871-72 में पहाड़ी ढलान पर जो पहाड़ की तलहटी से उत्तर की ओर थी, कई पाषाण वृत्त ढूँढ निकाले थे। ये वस्तुतः पाषाण समाधियाँ थीं, जिनके निर्माता मेगालिथिक नाम से परिज्ञात आदिवासी थे। कार्लाइल ने यहाँ क्रोमलेक कुछ पाषाण वृत्ताकार समाधियाँ और मृतक समाधियाँ देखी थीं। ये सभी प्रागैतिहासिक काल से सम्बन्धित थीं। दयाराम साहनी ने दौसा का दौरा किया और कुछ महत्त्वपूर्ण मध्यकालीन पुरावस्तुओं का पता लगाया। इनमें कुछ प्रमुख हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों के अवशेष थे। इस खोज में एक विशाल पाषाण शिवलिंग भी मिला था, जिसका शीर्ष भाग जमीन के ऊपर दिखायी दे रहा था। ये पर्वत शिखर बने प्राचीन शिव मन्दिर में भूत काल में स्थापित किया गया था। आगे चलकर इसी प्राचीन शिव मन्दिर के स्थान पर नीलकण्ठ महादेव मन्दिर का निर्माण हुआ जो आज दौसा के दुर्ग में स्थित है। इसके अतिरिक्त 12वीं शती की सुन्दर कोरनीके काम से युक्त मूर्ति समूह भी प्राप्त हुआ जो सन् 1965 में बने माताजी के मन्दिर की सामने की दीवाल में चुनी हुई हैं।
दौसा में पांच शिव मन्दिर हैं, जिनके नाम नीलकण्ठ महादेव, बैजनाथ, सहजनाथ, सोमनाथ और गुप्तेश्वर महादेव हैं। देवताओं के नाम पर बसे हुए गाँव गणेशपुरा, रघुनाथपुरा और सूरजपुरा आदि भी पास के भू-भाग में अवस्थित हैं। इन शिव मन्दिरों के सम्बन्ध में यह बात प्रचलित है कि इन सारे शिवलिंगों की स्थापना एक ही रात में की गयी थी। ये मध्यकाल के उत्तरवर्ती काल से सम्बन्धित हैं। इन लिंगों के साथ पार्वती और गणेश की मूर्तियाँ नहीं हैं।
दौसा में रघुनाथजी एवं सीतारामजी के मन्दिर हैं, जो भरतपुर-आगरा सड़क मार्ग पर अवस्थित हैं। यहाँ एक पाठशाला के पास 14वीं शती का राम मन्दिर भी है।
ताम्रयुगीन संस्कृति की पश्चात्वर्तिनी संस्कृति लौहयुगीन संस्कृति थी। यह संस्कृति मेगालिथिक लोगों की थी। इनकी निश्चित तिथि ज्ञात नहीं हो पायी है। जयपुर जिले में दौसा महापाषाण समाधियाँ पायी गयी हैं, जो एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यहाँ पर तीन प्रकार की समाधियाँ मिली हैं। पहली पाषाणवृत्तीय समाधि है, जिसके मध्य में क्रोमलेक (शिलामण्डल) या मेनहरि (मैनहिर) है। यहाँ विशाल मिट्टी निर्मित टीला और एक खुरदरा पाषाण खण्ड भी मिला है। हाल ही में क्रेयख और मेनहिर प्राप्त हुए हैं। दयारामपुरा में कृष्ण और लाल रंग के मृद्भाण्डों की उपस्थिति एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हैं।
ऊपर कर्ण समाधि का उल्लेख हुआ है। इस प्रकार की समाधियों का निर्माण बड़े पत्थरों को गोल आकृति में लगा कर किया जाता है। एक खोदे गए गड्ढे में मानव शव रखकर उसे मिट्टी से ढक दिया जाता है तत्पश्चात् उसके ऊपर पत्थर रख दिए जाते हैं। मेनहरि समाधि के निर्माण के उपरान्त उसके पास में एक खड़ा प्रस्तर स्तम्भ लगा देते थे। ये प्रस्तर स्तम्भ डेढ़ मीटर से पांच मीटर तक लम्बे होते थे। इन प्रस्तर स्तम्भों को संकेत सूचक चिह्न के रूप में स्थापित किया जाता था।
महापाषाणिक संस्कृति के लोग अपने आवास गृहों में कृष्ण लोहित मृद्भाण्डों का प्रयोग करते थे। ये लौह उपकरणों का अत्यधिक प्रयोग करते थे। कृषि और पशुपालन में रुचि रखते थे। गाय, बैल, घोडे, भैंस और बकरी जैसे पालतू पशु रखते थे। इस संस्कृति के निर्माता पालतू पशुओं पर निर्भर थे।
दौसा में पुरातत्त्ववेत्ताओं को मानव सभ्यता के प्रारम्भिक काल से सम्बन्धित अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिसके कारण इसकी उपस्थिति छः हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। दयाराम साहनी ने सन् 1935-36 में दौसा का सर्वेक्षण किया था, उस समय उन्होंने ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक वस्तुएँ खोज निकाली थीं। इसका वर्णन पिछले पृष्ठों में किया जा चुका है।
दौसा अनेक मध्यकालीन घटनाओं से सम्बन्धित है। कछवाहा राज्य की प्रथम राजधानी होने का गौरव इसे प्राप्त है। आमेर के राजा पूरणमल का विद्रोही पुत्र सूजा इसी स्थान पर मारा गया था। इसका स्मारक किले के मोरी दरवाजे के बाहर एक प्राचीन सूर्य मन्दिर के पास निर्मित है। सन् 1562 ई. में बादशाह अकबर अजमेर जाते हुए दौसा होकर गुजरे थे। यह प्रसिद्ध दादूपंथी संत सुन्दरदास की जन्मस्थली है। यहीं संवत् 1653 में उनका जन्म बूसर गौत्रीय चोखा महाजन के घर हुआ था।
दौसा में एक प्राचीन किला है, जो पहाड़ी पर निर्मित है। यह किला समुद्रतल से 1643 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और चार मील की परिधि में विस्तृत है। इसका निर्माण बड़गूजर राजपूतों ने करवाया था। आगे चलकर जब कछवाहों का अधिकार हो गाया तो नई बुर्जें और भवन बनाए गए। किले के दो दरवाजे हैं, जो 'हाथीपोल' और मोरी' दरवाजे कहलाते हैं। नीलकण्ठ महादेव के पार्श्व में किले के अन्दर अश्वशाला, प्राचीन महल, चौदह राजाओं की साल, सैनिक आवासगृह आदि जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़े हैं।
अब दौसा एक जिला हैड क्वार्टर बन गया है।