जोधपुरा गाँव जयपुर से 98 किलोमीटर तथा बैराठ से 15 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यहाँ पुरातात्त्विक सामग्री का भण्डार है। पुरातत्त्व विभाग द्वारा इस सामग्री को प्राप्त करने के लिए यहाँ का उत्खनन करवाया गया था। इसके फलस्वरूप गैरिक रंग के पात्र टीले के सबसे नीचे के स्तर से प्राप्त हुए। इनमें बैठकदार तश्तरियाँ मुख्य हैं। इनके साथ आकारहीन ताम्र खण्ड भी प्राप्त हुए हैं। तीसरे स्तर से चित्रित सलेटी रंग के पात्र मिले हैं। इनमें कटोरे, पानी पीने के पात्र एवं तश्तरियाँ प्रमुख हैं। सलेटी रंग पर काली रेखाओं का सुन्दरता से चित्रण किया गया है। जोधपुरा में पुरातात्त्विक खुदाई सन् 1972-73 में प्रारम्भ की गयी। यह स्थान 27’31’ उत्तरी तथा 76.5 पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है।
यह कोटपूतली तहसील जयपुर जिले का गाँव है। जोधपुरा खुदाई में ओ.सी.पी. के सघन संग्रह प्राप्त हुए हैं। यह ब्लेक एण्ड रैड वेयर के पूर्वकालीन हैं। कार्बन पद्धति से ज्ञात हुआ है कि इसका समय 2500 ई.पू. से 2200 ई.पू. है। डॉ. डी.पी. अग्रवाल ने इसे जोधपुरा कल्चर का नाम दिया है।
इन पात्रों के अलावा लौह निर्मित वस्तुएँ भी यहाँ से प्राप्त हुई हैं। रंगविहीन काले और लाल पात्र मिले हैं, जो गेरू रंग और सलेटी रंग के पात्रों के अन्तराल को भरते हैं। काले और लाल रंग के पात्रों में तश्तरी और प्याले अधिक संख्या में मिले हैं। ये पात्र पूरी तरह पके हुए हैं। चित्रित सलेटी पात्र अन्दर और बाहर की ओर कलापूर्ण हैं और हस्तिनापुर और नोह के पात्रों से साम्यता रखते हैं। इनमें तश्तरियाँ, प्याले एवं कटोरे प्रमुख हैं। काले, लाल और सलेटी पात्र एक ही स्तर पर एक साथ मिले हैं। इनके अतिरिक्त लोहे के अस्त्र, मृण्मय घण्टाकार मणके, हड्डी की कीलें, छिद्रयुक्त अस्थि निर्मित वस्तुएँ और प्रस्तर मणके भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं। दो अन्य स्तरों पर ऐतिहासिक जानकारी मिलती है।
चौथे स्तर से सम्बन्धित लोग उत्तरी चमकदार पात्रों के अतिरिक्त लाल पात्रों का प्रयोग करते थे। इनमें प्याले, कटोरे, घड़े प्रमुख हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण वस्तुओं में तीराग्र भाग, लोहे की कीलें, शंख निर्मित चूड़ियों के टुकड़े, बैल तथा पाषाण निर्मित मणके हैं।
यहाँ के पांचवें स्तर पर शुंग एवं कुषाणकालीन पात्र मिले हैं, ये पात्र चाक द्वारा निर्मित हैं। ये मध्यम आका के एवं पतले हैं और उन पर चिकनाहट हैं। ढक्कन प्याले, कटोरे एवं टोंटीदार पात्र भी यहाँ से मिले हैं। त्रिरत्न एवं स्वस्तिक चिह्न वाले पात्र भी प्राप्त हुए हैं। महत्त्वपूर्ण पुरावशेषों में लौहास्त्र, मृण्मय घण्टाकार मणके, प्रस्तर निर्मित मणके और एक ताम्र मुद्रा उल्लेखनीय है। लौह भट्टियों से ज्ञात होता है कि वे लौह उपकरण बनाने के काम आती थीं। इनमें उपले जलाये जाते थे। मानव आवास के चिह्न भी फर्श एवं ईंटों की दीवार के रूप में मिले हैं। छत्तें खपरेलों से छायी जाती थीं। छप्पर छाने का भी रिवाज था। जोधपुरा से प्राप्त पुरातत्त्वीय वस्तुओं का काल निर्धारण हो चुका है। ये ई.पू. 2500 से ई. सन् 200 तक की हैं।
जोधपुरा का प्राचीन टीला 27°31’ उत्तरी अक्षांश व 76°5’ पूर्वी देशान्तर के बीच जयपुर जिले के कोटपूतली तहसील में जोधपुर से प्रायः 100 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यह जयपुर-दिल्ली मार्ग से थोड़ा हटकर बसा हुआ है। इस टीले का नाम धतुलघाट है, जो धरतुलदास संन्यासी के नाम पर पड़ा प्रतीत होता है। इस स्थल के उत्खनन का मुख्य उद्देश्य चित्रित भूरे मृद्भाण्डों की तिथि के अध्ययन हेतु तथ्य एकत्रित करना था। इस प्राचीन स्थल का उत्खनन राजस्थान के पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में किया गया था।
जोधपुरा का चतुर्थ स्तर मौर्यकाल से सम्बन्धित है। इस काल में मौर्य के प्रयुक्त होने वाले काले रंग के मृद्भाण्ड मिलते हैं। इसका पंचम स्तर शुंग एवं कुषाण काल से सम्बन्धित है। जोधपुरा साबी नदी के तट पर बसा है। यह प्रारम्भिक ऐतिहासिक युगीन राजस्थान के बारे में अनेक महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ देता है। इस उत्खनन में ईसा पूर्व स्तरों से बाण, कील, काँटे और खूंटे आदि बड़ी संख्या में मिले हैं। जोधपुरा के अंचल में मेगनीयस हेमाटाइट के भण्डार विद्यमान हैं। यह लौह निर्माण में उपयोगी धातु है। लो स्थानीय रूप में गलाकार यहीं औजार बनाये जाते थे। मृद्भाण्डों पर कटाव व चिपकवाँ विधि से अलंकरण किया गया है। यहाँ से उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्पात्र परम्परा का केवल एक ही नमूना प्राप्त हुआ है। मौर्यकालीन स्तरों में बने मकानों में पक्की ईंटें लगायी गयी हैं। इस काल में मृण्मय मूर्तियाँ, सिक्के और मोहरें मिली हैं।