अनुवाद रै बारै में कैवण नै लोग अठा तांईं कैवै के अेक भासा सूं दूजी भासा में किणी रचना रौ हूबहू अनुवाद व्है इज नी सकै, मूळ भासा में रचना रौ जिको प्रभाव व्है, बौ दूजी भासा में उणी ढाळै नीं आ सकै। पण तौ ई अनुवाद रौ काम कित्तौ महताऊ व्है, आ बात इण सूं ई समझ सकां के संसार रा नांमी-गिरामी लिखारा इण काम नै सिकारयौ अर इण में आपरी रुची दरसाई।

 

अनुवादक री दोवड़ी जिम्मेदारी व्हिया करै। उणनै रचना री मूळ भासा अर जिणमें अनुवाद करणौ पड़ै वा भासा, आं दोनूँ भासावां री पूरी जाणकारी व्हेणी चाहिजै। मतलब के दोनां रा व्याकरण, सब्द संयोजन. सब्द-गति, मुहावरा अर कहावतां री पूरी समझ व्हेगी जरूरी है। इणरै साथै ई एक मुद्दे री बात आ भी है के अनुवादक नै दोनूं भासावां री भौगोलिक अर ऐतिहासिक जाणकारी रै साथौसाथ रचनाकाल रै समै रा राजनैतिक प्रभावां री भी जाणकारी व्हेणी जरूरी है। आं सगळी बातां नै देखतां थकां कैयौ जा सकै के अनुवाद रौ काम पूरी निष्ठा, गंभीरता खिमता अर ईमादारी री दरकार राखै।

 

सरूपोत जद कदांई दोय कबीला, जातियां अथवा सांस्कृतिक धारावां रौ आपस में मिळाप व्हियौ, अनुवाद रौ काम दोनां बिचाळै एक उपयोगी माध्यम साबित व्हियौ। गुरु-शिष्य परंपरा में भी अनुवाद रौ काम महताऊ गिणीजतौ। अनुवाद रा काम नै मोटै तौर सूं तीन मुख्य प्रभावों में बांट सकां: —(1) भक्ति प्रभाव, (2) स्वछंद कलात्मक प्रभाव अर (3) राजनैतिक प्रभाव। आं प्रभावां रै साथौसाथ अनुवादक अेक पासी अनुवाद रै जरियै आपरी लेखनी अर भासा नै सवारै अर पांण देवै, तो दूजै पासै वौ आपरा समान धरमी अथवा मिळताऊ रुची रा विचारां रै पांण खुद री वैचारिकता नै पुख्ता करै। निजू मानतावां रै बिगसाव री जाणकारी हासिल कर आपरौ पख प्रबळ करै। जद किणी अनुवाद रै बारै में औ विचार करणौ पड़ै के वौ किण ढंग ढाळै रो व्हियौ है तौ भासा रा मानदंडा माथै उणरी परख करण रै साथौसाथ आ बात ई देखणी पड़ैला के वौ क्यूं अर किण विचार-दीठ रै आधार माथै व्हियौ अर अनुवादक नै उणरी कांई जरूरत लखाई? अनुवाद रौ काम देस-काळ री मानतावां, समस्यावां अर साहित्यिक, सामाजिक जरूरतां नै ध्यांन में राख'र करीजै, तौ वौ बत्तौ महताऊ व्हिया करै। खुद री वैचारिकता अर संतोख रै साथै पाठक री मनगत रौ ई ध्यान राखणौ जरूरी व्है। कारण सुयोग्य पाठक रौ संतोख इज अनुवादक री सफळता रौ पैलौ अर प्रमुख आधार व्हिया करै।

 

हिंदी अर दूजी भारतीय भासावां में अनुवाद री सरुवात संस्कृत रा 'क्लासिक' अर धर्म-ग्रंथां सूं व्ही वा ही गत राजस्थानी में ई व्ही। आधुनिक राजस्थानी साहित्य में अनुवाद रौ काम खासौ मोळौ व्हियौ। पद्य में तो कीं थ्यावसबंदी पोथ्यां फेरयूं ई लाध सकै पण गद्य में गिणती री पोथ्यां इज हाथ आवै। हां, आा बात जरूर है कै आं गिणती री पोथ्यां रै साथै जिका अनुवाद सांमी आया है, वै जरूर सरावणजोग है। ज्यूँ धार्मिक पोथ्यां रै रूप में विद्वान जैन साधु श्री पुष्कर मुनि जी रै प्रवचनां री दोय पोथ्यां 'मिनखपणा रो मोल' अर 'राम राज' रो अनुवाद राजस्थानी विद्वान श्री नृसिंह राजपुरोहित कियो। राजस्थान हाई कोर्ट रा भूतपूर्व न्यायाधीश श्री इंद्रनाथ मोदी 'मिनखपणा रो मोल' री भूमिका लिखी। आं अनुवादां री खासी सरावणा व्ही। अनुवाद री कीं ओळयां आपरै सांमी है 'मिनख रा खोलिया में अर मिनख री सूरत में रैवतां थकां ई जिण मिनख में मिनखपणा रा लक्खण नीं व्है, विवेक री जोत नीं व्है, वो सही रूप में मिनख नीं है। इसा जीवण नै फगत विवेक इज मिनख बणाय सकै। सेलड़ी रा सांठा नै मिनख ई खावै अर ढोर-डांगर पण खावै। पण दोनां रै खावण में फरक है। मिनख सेलड़ी नै खूब चूस नै उणरौ सार ले लेबै अर फूंतरां नै फेंक देवै।'

 

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर री ई दोय पोथ्यां राजस्थानी मे आई। वांरै चावै उपन्यास 'नष्टनीड़' रौ अनुवाद 'ओळमों' रा संपादक अर मांनीता कवि श्री किशोर कल्पनाकांत कियौ अर 'रवि ठाकर री बातां'  रै नांव सूँ रवीन्द्रनाथ री कहाणियां रा अनुवाद राजस्थानी री प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती लक्ष्मीकुमारी चूँडावत कियौ है। आं दोनूँ अनुवादां री चौफेर तरावणा व्ही है। दूजी बात, अै दोनूँ अनुवाद मूळ भासा री कृतियां रै आधार सूं व्हिया, आ ई गिणावणजोग बात है। श्री किशोर कल्पनाकांत आपरी पत्रिका 'ओळमों' रै माध्यन सूँ केई देसी-विदेसी लेखकां री कथावां अर निबंध आद रौ अनुवाद कर राजस्थानी में लूंठौ काम कियौ है। सेक्सपियर रै पांच नाटकां रौ टाबरां लायक कथा रूप में अनुवाद, तेलगु विद्वान श्री विश्वनाथ सत्यनारायण री गद्य रचनावां, इणी गत गुजराती, बंगाली, तेलगु आदि सूं किशोर जी केई कथावां रा अनुवाद किया। श्रीमती लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ई अनुबाद री केई सरावणजोग पोथ्यां दीवी है—संसार री नांमी कहाणियां, लेनिन री जीवनी, सूळी री सेज सूं (ज्यूलियस फूचिक) आद रै पांण श्रीमती चूंडावत राजस्थानी में अनुवाद री अदभुत खिमता दरसाई है।

 

अमेरिका रा प्रसिद्ध लेखक वाल्ट डिज्ने री चावी घर सुंदर बाल कथा 'बांबी' रौ अनुवाद राजस्थानी रा प्रसिद्ध कवि सत्यप्रकाश जोशी कियौ। इणी कथा रै साथै चीन रा मनजोग लेखक चाऊ शु-जिन (लू-शुन) री चावी कथा 'डायरी ऑफ ए मंड मेन' रौ 'काला मिनख री डायरी' रै नांव सु सरावणजोग अनुवाद कियौ। बांबी माथै अंग्रेजी में फिल्म ई बण चुकी है। आ अेक बाळ हिरण री कथा है। अनुवाद रौ अेक अंस आपरै सांमी है—'बांबी उणरौ लारौ करियौ। उणनै दौड़ण री रफत कोनों ही। वौ थोड़ी ताळ दोड़ियौ तौ उणनै आपरै पगां माथै भरोसौ व्हियौ। मां नै पकड़ण सारू उणरी हूंस बंधी। हीया री हुरड़ाई करनै वौ पूरा करार सूं सोकड़ मनाई। छलाँग भरतौ वौ जांणै हवा में आपै ई उडण लागौ आ अनुवाद पोथीं बोरूंदा सूं छपी अर प्रकासित व्ही।

 

कोमल कोठारी रै संपादन में राजस्थानी पत्रिका 'वांणी' रा बानगी अंक में ई कीं सुथरी अनुदित रचनावां मिळै। इण अंक में श्री कोमल कोठारी मार्क ट्वैन री कां'णी—अेक प्रस्तावू बात, ईसप री पांच नीति कथावां, पंचतंत्र सूं 'घणजीवां फतै' रै रूप में सरावण जोग अनुवाद दिया है। जिणरी बानगी दरसावौ—'अेकर अेक कळावंत अेक तस्बीर बणाई। तस्बीर छोटी पण फूटरी घणी। तस्बीर नै वौ इण तजबीज सूं राखी के सांमी काच में वौ उणनै आसानी सूं देख सकै। वौ मन में विचार करियौ—आ बात तौ ठीक बण आई। अेक तौ इणसूं फासलौ दूणौ व्है जांवै अर दूजै तस्बीर में पांण आ जावै। तस्बीर पैला सूं दूणी खूबसूरत लागै।'—मार्क ट्वैन।

 

प्रो० गोविन्दलाल माथुर रा कियोड़ा 'पंचतंत्र' अर 'सेक्सपियर री काणियां' रा अनुवाद ई गिणाइजै। प्रो० माथुर कीं जातक कथावां रा ई सुंदर अनुवाद किया है। इणी गत गुजराती सूं दामू सांगाणी रै एक नाटक रौ अनुवाद श्री जमनादास पचोरिया रौ कियौ गिणाइजै।

 

मरूवाणी, ओळमों, हरावळ, जांणकारी, जलम भोम, हेलो, आद राजस्थानी री पत्रिकावां में केई गद्य रचनावां रा अनुवाद छपता रैया है। हरावळ में विश्वप्रसिद्ध लेखक कामू रै चावै उपन्यास 'आउट साइडर' रौ अनुवाद श्री नंद भारद्वाज 'बेतियाण' नांव सूं कियौ है। इणी गत स्टीफेन ज्विग रै उपन्यास 'विराट' रौ अनुवाद म्है खुद कियौ जिणरो अेक अस 'ओळखाण' नामक मासिक पत्रिका में छप्यौ। जिण री अेक बांनगी दरसावौ—'बिराट एक नांमी जोधा होवाण रै कारण तरवार चलावण में निपुण। सगळा सूँ बत्तौ हिम्मतवर अर कदैई निसाणौ नीं चुकणियौ सिकारी हो। बर्छी माथै उण रौ हाथ इत्तौ खरौ के कांई मजाल जे हाथ अठी रौ उठी पड़ जावै। भुजावां में बज्जर समान बळ। गंभीर सरूप अर किणी टेढी निजर आगै नीं झुकणाळी आंख्या। क्रोध में किणी माथै मुक्कौ नी ताणियौ, जोस में कदैई बोली आकरी नीं व्ही।'

 

आं राजस्थानी री पत्र-पत्रिकावां में फुटकर रूप सूँ केई लेखकां रा किंथोड़ा अनुवाद छप्या है, जिकांरा की नांव इरण मुजब है—सर्व श्री किशोर कल्पनाकांत, रावत सारस्वत, वेद व्यास, श्रीमती लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, रामप्रसाद दाधीच, कोमल कोठारी, तेजसिंह जोधा, पारस अरोड़ा, नंद भारद्वाज, राजेन्द्र बोहरा, कृष्ण गोपाल शर्मा आद। आं रै अलावा भी केई नांव व्हेला इण में फरक नीं।

 

अनुवादां री बाबत अठै में अेक बात ओरयूं कैवणी चावूं के जठा तांईं व्है सकै अनुवादक नै रचना री मूळ भासा सूं अनुवाद करणौ चाहिजै। मूळ भासा सूँ अनुवाद कियां ई उण में खामी रैय सकै, पण फैंच सूँ अंग्रेजी, अंग्रेजी सूँ हिन्दी अर हिन्दी सूँ राजस्थानी में आवतां-आवतां तौ रचना में अर खास कर लंबी गद्य रचना में खासौ बदळाव आवण री स्थिति बण जाया करै।

 

दुजी बात, औ विचार ई त्यागणौ चाइजै के जिकौ कोई नीं कियौ वौ म्है करलूँ। इण लोभ में नुक्साण व्हेणै री इज संभावना बत्ती है। साथै ई आ भी कैवणी चावूंला के म्हानै आंपांणी बैनड़ भासा गुजराती रै बत्तौ नजदीक जावण री दरकार है। गुजराती रौ आधुनिक साहित्य समृद्ध है अर उण सूं राजस्थानी नै फायदौ तौ व्हेला इज दोनूँ भासावां रा लिखारां विचाळै ई मीठा सम्बन्ध कायम व्हैला।

 

अेक बात फेर, म्हां जद राजस्थानी नै हिन्दी सूं न्यारी भासा साबित करणी चावां तद हिन्दी साहित्य सूं परेज क्यूं ? हिन्दी री चावी रचनावां रा अनुबाद ई व्हैणा जरूरी है, जिण सूं हिन्दी वाळां साथै म्हांरा मधुर संबंध बणै अर राजस्थानी री लेखनी ई सबळी व्है।

स्रोत
  • पोथी : परंपरा (राजस्थानी गद्य री परंपरा नै आधुनिक विकास) ,
  • सिरजक : पारस अरोडा ,
  • संपादक : हुकम सिंह भाटी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर
जुड़्योड़ा विसै