डॉ. भगवतशरजी उपाध्याय सूं म्हारी ओळखाण खासी जूनी। वे आपरै लिख्योड़ी पोथ्यां म्हनै भेजबौ करै। कोई अेक पखवाड़ै पैली टेलीफोन आयौ के डॉक्टर सा’ब दिल्ली आयोड़ा है। जाण’र हरख होवणौ सुभाविक बात ही। गुणीजनां री सोहबत भाग-संजोग सूं मिळै। वे दो तीन दिन दिल्ली विराज्या जितरै मिळणौ-जुलणौ होवतौ रह्यौ। जावती वखत वे आपरी दो-तीन पोथ्यां देवता गया अर डाक सूं भेजण रौ कैयग्या। वांरी अेक पोथी ही—‘घूमने का राज।' सिंझ्या री वखत ढोल्या पै सूतां-सूतां अेक दो दिन में वा पूरी बांचली। बांच’र मन में अेक विचार आयौ के उपाध्यायजी रै ज्यूं म्हैं म्हारा यात्रा संस्मरण क्यूं नीं लिखूं? देस विदेस में म्हैं अमूमन फिरती रैवूं। यात्रा रौ रोजनामचौ संक्षेप में मांडती रैवूं। बीं नै जे मायड़भाषा राजस्थानी में विस्तार सूं लिखूं तो साहित्य री अेक विद्या सिमरिद्ध होवै। मन री भावना बळवती होवती गई अर संजोग री बात के तीजै-चौथे दिन ‘पीस कमेटी’ री अेक मिटिंग हुई जिण में बात नै हुई के पेरिस अर बर्लिन अठैरा दो प्रतिनिधि भेजणा है, जिणां में म्हारौ नाम भेळौ है। सागै लिजावण सारू सामान भेळौ करतां अर जमावतां बात मन में पक्की तेवड़ली के अबकाळे यात्रा संस्मरण जरूर मांडणा है। कालै भगवतशरण जी नै वांरै कागद रौ पडूत्तर देवतां म्हैं लिख्यौ के आपरै ‘घूमबा रौ राज’ म्हैं समझगी हूं अर उणरौ अनुकरण करण रौ पक्की तेवड़ली है।

पासपोर्ट तो बण्यौ थको हौ। विदेसी मुद्रा हासल करण में कोई अबखाई नीं आई। संसद सदस्यां वास्तै इण तांई कोटौ तै हवै। सत्ताईस सौ रुपियां रै बदळै अेक सौ अट्ठावन पाउंड मिळ्या। रिजर्व बैंक नै सवा तीन सौ रुपिया बट्टा रा दिया। कीं तो नगद रकम बटवा में घाली अर बाकी रा ट्रेवलिंग चैक लेय लिया। यात्रा में ट्रेवलिंग चैक सुविधाजनक रैवै। चोरी चकारी रौ डर नीं अर वांनै बंटावणा सोरा। घणकरा तो दुकानदार लेयलै नीं तो बैंक तो सिकारै ई।

मास्को होयनै पेरिस जावणौ हौ। उण मौसम में मास्को री ठंड। याद करतां डर लागै। कीं लोगबाग डराय देवै। आज हर्ष देवजी मालवीय कैवण लाग्या—म्हारी बेटी मास्को में है, बीं रौ कागद आयौ उठै माइनस 20 डिग्री ठंड चाल री है। यात्रा में कीं घंटां पछै मौसम बदळ जासी। तापमान अेकदम पचासे'क डिग्री नीचै आय जासी आज अठै दिल्ली रौ तापमान है—31.2 डिग्री। इण वास्तै सागै कपड़ा लत्ता मोकळा लेय लिया। फर रा अस्तर लाग्योड़ा ऊंचै तांई रा जूता अर दो जोड़ी गरम मोजा। रूस री ठंड रौ थोड़ौ घणौ अनुभव म्हनै हौ। अेकर नवंबर रै महीनै में कियोड़ी ताशकंद री यात्रा म्हनै याद आयगी। फ्लाइंड जूतां अर गरम मोजां में पग ठरनै माटी होयग्या। कूद-कूद नै पगां में गरमास लावणी पड़ी। उठै गणतंत्र दिवस री परेड देखतां म्हारै पगां री जिकौ हालत हुई वा भुलाई नीं भूलीजै। पण वो तो हो ताशकंद अर महीनौ हो लागतौ नवंबर। अबै जायरी हूं मास्को अर महीनौ है दिसंबर। देखां आगै कांई गत होवै। अेकर तो जावण री छाती कर लीधी।

रात नै दो बज्यां अेरोफ्लोट सूं उड्या, वीमान में तीन-तीन कुरसियां री ओळ्यां। म्हारै लारली आडी नै पूरी री पूरी ओळ खाली पड़ी। कुरसियां रा हेडलां नै लारला कानी मरोड़ियां तो मजै सूं सूवण रौ काम सरग्यौ। आणंद सूं सूता-सूता आया। लारली ओळ खाळी नीं होवती तो रात दोरी कटती, अे कुरसियां लारै सरकवा वाळी नीं ही। इसी कुरसियां पैलड़ै दरजै में होवै। म्हैं मुसाफिर हा ‘अेकोनामी क्लास’ रा। ‘अेकोनामी क्लास’ कैवणौ फूटरापण रौ तरीकौ है। झांझरकै विमान मास्को पूग्यौ। पूरा छ: घंटा चाळीस मिनट लाग्या। चक्कर खाय’र नीचै उतरती वखत जेट विमान घोषणा करी के नीचै धरती माथै तापमान प्लस अेक डिग्री है। मन में थोड़ौ थावस बाधौ के सरदी अणूंतीज तो कोनीं।

शांति कमेटी मास्को रा अेक सज्जन सामी आयग्या हा। वां बतायौ के अठै सूं सुबै वाळौ प्लेन पेरिस सारू पकड़णौ है। कलेवौ करवा बैठग्या। हाल मांयली घड़ी माथै निजर पड़ी तो वखत सात बज’र अठारै मिनट। पण म्हा वाळी घड़ी बजाय री ही नव बजनै पचास। घड़ी नै मिळाई।

मास्को रा इण अेरोड्राम माथै म्हैं 1966 में उतरी ही। बैठी ही के मन में सोचण लागी—देखां इण लारला बरसां मे अेरोड्राम रा इण स्टालां में कांई फरक आयौ है? सोविनियर सारू मनपसंद कोई वस्तु होवै तो मोलावां। म्हारै सागै आया चीतौ विस्वास हंस्या अर बोल्या—दुनिया रा कोई खूणा में जावौ, लुगाइयां में आदत सगळी ठौड़ अेक सरीसी लाधसी।

यूं अेरोड्रोम माथै दो तरै का स्टाल है। अेक वे घरेलू स्टाल—जिणां में रूस रौ सिक्कौ ‘रुबल’ चलै अर दूजा वे स्टाल—जिणां में विदेसी मुद्रा रै बदळै सामान बिकै। विदेसी मुद्रा में डालर अर पाउंड दो इसी मुद्रावां, जिकौ आखी दुनिया में चालै। डालर रै बदळै माल सूंघौ मिळै। विदेसी मुद्रा कमावा रौ अेक गैलौ काढ राख्यौ है।

घरेलू स्टालां में खावा पीवा रौ सामान भर्‌यौ पड़्यौ। इणरै अलावा टाबरां री पोथ्यां, भांत-भांत री दवाइयां अर नित-रोज काम में आवण वाळी निरी चीजां। विदेसी मुद्रावाळा स्टालां माथै हस्तकला अर कारीगरी रौ सामान, फर री टीपियां, भांत-भांत रै रंगीन मणियां रा गहणा, कटग्लास रा प्याला अर कई कीमती चीजां। सगळी चीजां पैली देख्योड़ी ही। रूस रा स्टालां माथै इसी चीजां 1957 सूं देखती आई, इण वास्तै कोई नवाई नीं लागी।

ठीक दस बज्यां विमान सूं पेरिस वास्तै रवाना हुया। अेरोड्रोम रा ‘रन वे’ नै छोड़’र सगळी धरती धवळी-धवळी होय री। पण ऊजळौ बरफ नी। मैलो-मैलो दो दिनां रौ जूनौ बरफ। झाड़ बुहार नै फैक्योड़ौ। चोफेर ढिगलियां पड़ी। म्हनै याद आयग्यौ राजस्थान रौ सांभर। उठी होयनै रेल में जावां जद चांफर इस्सा लूण रा ढिगला अर क्यारा निजर आवै।

अेयरोपलेट रौ विमान आभै में ऊंचौ-ऊंचौ उड रह्यौ। मौसम सुहावणौ। झीणी-झीणी तीतरपंखी बादळियां। गेहरौ-गेहरौ नीलौ आभौ। मंद-मंद मुळकती सूरज री किरणां। आंपणै देस भारत रै आभै में अर इण आभै में म्हनै कोई फरक नीं लखावै। कनै बैठ्या मुसाफिर आदमी अर लुगाइयां खुसी मे मुळकै, अचूंभै सूं झांकै। खावा-पीवा में अर भाव-ताव पूछवा में लाग रह्या ज्यूं आपां सगळा करां। पछै संसार में न्यावटौ अर राड़-धाड़ किण बात री? आखी दुनिया में सागण वो आभौ, वो सूरज, वो वायरौ अर वो मिनख।

ट्राली में ड्यूटी फ्री चीजां जमायां अेक लुगाई आई—चाकलेट, वाइन अर नैनी मोटी कई चीजां। श्री बेरू राय शैंपने री बोतल लेयनै खोली। दो डाल में। म्हनै जूनी बातां याद आयगी। जयपुर महाराजा स्व. मानसिंहजी नै कोई गोठ देवतौ, राजाजी की पधरावणी करतौ तो भाग्यौ फिरतौ शैंपेन की बोतल वास्तै। चावै जिकौ कीमत लागौ पण शैंपेन जरूरी—कारण के दरबार शैंपेन इज अरोगै। जयपुर में शैंपेन को इतरौ मोटौ नाम जाणै कजाणां कांई गजब रौ दारू है। फ्रांस में अेक जिलो है, जिणरौ नाम है शैंपेन। उण जिलै लारै इण दारू रौ नाम पड़्यौ ज्यूं स्काटलेंड लारै स्काच व्हिस्की। श्री बैरन राय बताय रह्या के अेकर वे उठै गया तो जमान में अेक मील लांबी सुरंग ही वा शैंपेन सूं भरी पड़ी। उण नगर रा नाम हो (Reims) रैंस।

विमान में लंच दिरीज्यौ। लंच में ‘केवियर’ परूसीज्यौ। थोड़ौ-थोड़ौ नीं, खासौ भलौ, ठीक-ठाक। यूं रूसी विमान अेयरो-फ्लोट में ‘केवियर’ परूसीजणो उणरी शोभा है। इणनै आजकल री बोली में कैवै—‘रशियन डेली केसी।’ दूजा मुल्कां में तो पैदा नीं होवै। जे कठैई होवै तो मामूली। अमेरिका में तो केवियर सोना रै भाव बिकै पण केवियर है कांई? आपनै जाण’र अचूंभौ होसी के अे माछळी रा अंडा है। चीड़ां जिसा नैना-नैना। अळगै सूं कळिकांगणी रा दाणा होवै ज्यूं लखावै। म्हनै वो रूसी तोहफा रै रूप मे मिळै तद म्है घनश्याम नै देय देवूं। उणनै आपरा अेयरफोर्स रा मित्रां नै केवियर परुसवा रौ घणां शौक है।

पेरिस में प्लेन सूं नीचै उतर्‌या। फगत दस मिनट में कस्टम पासपोर्ट रौ काम निवेड़’र टेक्सी में चढग्या। गजब री फरती। म्हांरे लारै रौ लारै म्हारौ सगळौ सामान उतरग्यौ। दिल्ली में मोटा विमानां में घणा यात्री होवै तद वो वखत लागै पण जयपुर सूं जावां जद सामान तांई बाट जोवणी पडै। अठै री सामान ढोवण री टालियां वाळौ सिस्टम आछौ लाग्यौ। उठै कुली इत्याद रौ तो सवाल कोनी। खुद रा हाथां सूं सामान उठाय ट्राली में राख अर गुड़काय लेयग्या बारणै तांई। चमाचम करती अर सरर्-सरर् तिसळती लगी ट्रालियां घणी आछी लागी।

हेलसिंकी सूं ओ.पी. पालीवाल अर वर्ल्ड पीस कांग्रेस रा जनरल सेकेटरी रोमेशचंद्रजी आयग्या हा। सिंझ्या रा बंगलादेश मिशन रा पैलड़ा सचिव मिळण नै आया। वे चीतौ रै ओळखीता है। अे वे इज है जिकौ सै सूं पैली दिल्ली में अेक स्टेटमेंट देय पाकिस्तान रो दूतावास छोड बारै आयग्या। यां रै लारै यांरा इष्ट मित्र आया। पाकिस्तानी फोरेन सर्विस छोड़वा री सरूआत करण वाळा आप पैलड़ा अफसर हा।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जनवरी 1988
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