तेरी अल्प आयु तूं तो खेलता है डाव,

जांणै है जीवन मेरो कबहुं न तूटैगो।

यौ तो है नदी का पूर दिन दिन घटै नूर,

करत अकाज नहीं लाज कैसै छुटैगो।

कंठगति प्रांण तेरै व्हैगे बल प्राण घेरे,

आइ जमरांण जब तोकूं गहि कूटैगो।

कहै जिनहरख न कोउ तेरो रखवाल,

देखत ही काल ठाल काया कोट लूटैगो॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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