जैसै अंजुरी कौ नीर कोउ गहै नर धीर,

छिन छिन जाइ वीर राख्यौ रहात है।

तैसैं घटि जै है आउ कोटिक करो उपाउ,

थिर रहै नहीं सही वातन की बात है।

अैसै जीव जांणि कै सुकृत करि धरि मन,

समता मै रमता रहै तो नीकी घात है।

अथिर देही सुं उपगार यौ हो सार जिन,

हरख सुथिर जस भौन मै लहातु है॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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