जैसै अंजुरी कौ नीर कोउ गहै नर धीर,
छिन छिन जाइ वीर राख्यौ न रहात है।
तैसैं घटि जै है आउ कोटिक करो उपाउ,
थिर रहै नहीं सही वातन की बात है।
अैसै जीव जांणि कै सुकृत करि धरि मन,
समता मै रमता रहै तो नीकी घात है।
अथिर देही सुं उपगार यौ हो सार जिन,
हरख सुथिर जस भौन मै लहातु है॥