जूंझ्या केइक जूंझार,कीरत रा कमठांण में।

झाली थें रिझवार, सरसत री कल्यांण रा॥

कलम तेग कर अेक,वांणी वार ज साधिया।

बचन करम री रेख,कायम की कल्यांण रा॥

जस इण जग रौ जीत, परलोकां पद पावियौ।

नीर कमळ री रीत, राखी थें कल्यांण रा॥

बाही थें रस-बेल,फळ मुगती रा फूलिया।

करम धरम री केळ, करग्यौ थूं कल्यांण रा॥

स्रोत
  • पोथी : परम्परा ,
  • सिरजक : नारायण सिंघ भाटी ,
  • संपादक : नारायण सिंघ भाटी
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