ई. सन 1947! होस्टल में अेक गुलमोहर हो। उणरै जद फूल आवण लागता-तो समझ जावता के अबै गरमियां री छुट्टियां नैड़ी आयगी।

स्कूल री सगळी कक्षावां में लिखित हुकम फिर जावतौ के इतरी तारीख नै परीक्षाफळ सुणायां पछै छुट्यां हुय जासी। तद सूं कमरै में लाग्योड़ा कलैंडर री रोज री तारीख माथै सिंझ्या रा लाल स्याही सूं चौकड़ी लाग जावती। बाकी रा दिन ई घणी उडीक सूं गिणतां गिणतां कटता अर छेवट वो दिन ई आय जावतौ।

सगळा विद्यार्थी आप-आप री कक्षावां में धड़कतै हिवड़ै पूगता। पढेसर लड़का तो हंसता-गप्पां लगावता, पण म्हारै जिसा ठोठ ठीकरा मन में पूरौ वेहम राखता के कांई ठा परीक्षाफळ कांई आसी? राम-राम करतां घंटौ बाजतौ अर कक्षा टीचर जमदूत होवै ज्यूं हाथ में ‘रिजल्ट शीट’ लिया आय’र कुरसी माथै जम जाता।

पछै हाजरी लेयनै थोड़ा मुळक’र कैवता— ''हां सा! आज आपरै पूरे साल री मैणत रौ लेखौ-जोखौ त्यार है, सुण लिरावै!''

सगळा ई खरी मीट सूं वांरै मूंडै कानी देखण लागता अर माट सा’ब शुरू करता—

रामसिंह पैलै नंबर पास

हरी राम फेल

कांताप्रसाद पास

मीरां सप्लीमेंटरी

धीरै-धीरै म्हारौ नाम नेड़ौ आवतौ अर म्हारौ काळजौ जोर-जोर सूं धड़कण लागतौ, छेवट म्हारौ नाम ई आयौ—नाहरसिंह प्रमोटेड!

अर जाणै काळजै माथै ठंडै पाणी री छिड़काव हुयौ। चलो, डिविजन नीं आयौ तो नीं सही, पण पास होयग्या। फेल होय जावता तो घरां गयां जीसा री डांट त्यार ही। सगळी छुट्टियां हराम होय जावती अर पाछी वा री वा रामायण बांचणी पड़ती। गायोड़ा गीत पाछा दोरा घणा गाईजै।

पास हुयोड़ा जीत्योड़ा बेवारी रै ज्यूं घणी डींगां हांकता अर फेल हुयोड़ा गधा गुमायोड़ा कुभार रै ज्यूं मूंडौ उतार'नै नीची धूण घालनै बैठा रैवता। टण-टण-टण करतां घंटी बाजतां ई जाणै चिड़ियां में ढळ पड़्यौ। सगळा क्लासां सूं निकळ’र अेकण सागै आप आपरै होस्टलां कानी दौड़ता। अे जोधपुर रै चौपासनी स्कूल रा होस्टल हा। मन में रैवती के कितरा बेगा कमरां में पूगां अर सामान बांध’र घरां कानी रवानै हुवां।

घणकरा छोरां नै गांव सूं वांरा घर वाळा लेवण नै आवता। शहर में रैवता वांरै वास्तै तांगा-मोटरां आय जावती। आयोड़ा सै सूं पैली अेक ई सवाल पूछता—''पास हुयो के फेल?''

—पास!

—आछौ हुयौ, सामान कठै है?

अर झटपट सामान तांगा में मेल’र टप-टप करता टेसण रौ रस्तौ पकडता।

म्हैं ई घणै कोड सूं सामान तांगै में राख’र रावतजी बा सागै टेसण वास्तै रवानै होवता। मारग में तांगां में जावता सैंधा-मैंधा सहपाठी मिळ जावता तो अेक दूजै नै देख’र हाका करता अर तांगै वाळै नै तांगौ आगै लेवण रौ कैवता। इण भांत तांगा रेस सरु होय जावती जिकौ ठेट टेसण गयां पूरी होवती।

टेसण पूगां बा टिकट लेयनै आवता अर म्हैं वां नै भांत भांत रा सवाल पूछनै हैरान कर देवतौ। छेवट वे आंती आयनै कैवता—‘टाबर है के वजराग है?’ चुपचाप तो बैठीजै आथ कोनीं। अबकाळै बोल्या तो दूंला खोपड़ी में।’ म्हैं मूंडौ उतार नै डोकरां कनै बैठ जावतौ अर म्हारी नैनी सी दुनिया रै विचारां रै सागर में डूब जावतौ।

घरां पूगतां ई पैली दादीसा कनै जासूं, पछै भाबू कनै, फेरूं दादौसा कनै अर इणरै पछै जीसा कनै। (जीसा रौ डर घणौ लागतौ) सिंझ्या रा नदी कांठै रमवा जासूं। दूजा संगी साथी ई छुट्टियां में आया होसी। कोई पास हुयौ होसी कोई फेल...पण सगळा ई फेल हुय जावै तो ठीक—म्हारी टांग तो ऊंची रहसी...!

इत्ताक में इ जण री सोटी सागै अेक झटकौ लागतौ अर रेल छक-छक करती होळै-होळै चालण लागती। घणी उडीक पछै छेवट तो टेसण आवतौ जठै उतरणौ हौ। टेसण रै बारै आवतां ई गुमानजी ऊंट लियोड़ा त्यार लाधता। म्हैं दौड़ नै गुमानजी कनै जावतौ, वे म्हनै गोदी में ऊंचाय लेवता अर पछै लाड करता पूछता—‘अबकाळै थाकोड़ा कियां?’ पढाई घणी करी दीसै। म्है घमंड सू कैवतौ—‘हां गुमानजी बा, पढाई करी है, जद ई तो पास हुया हां।’

वे ऊंट लिजायनै घर रै आगै झेंकता। म्है कूद’र सीधौ दादीसा कनै जावतौ। दादी सा म्हनै देख’र घणा राजी होवता। कनै बिठाय नै लाड करता। बार-बार मूंडै पै हाथ फेरता। म्हनै घणौ चोखौ लागतौ। मांचै रै नीचै पड़्यै कटोरदान सूं लाडू काढ’र म्हनै देवता। म्हैं खावतौ जितरै म्हारै कानी देखबौ करता। पछै लाड करता कैवता—‘थारै भाबू कनै जा बेटा, वे बाट जोवता होसी। म्हैं दौड़’र भाबू कनै जावतौ। उठै ई लाड, लाड अर लाड! म्हैं तो जाणै लाड रै सागर में डुबकियां लगावण लागतौ जितरै दूजोड़ा भाईड़ा ई आयनै भेळा होय जावता, पूछता—‘पास हुया के फेल?’

म्हैं घणै घमंड सूं कैवतौ—‘पास’!

‘थै पास हुया के फेल?’ म्हैं पूछतौ।

वे कैवता ‘म्हैं ई पास हुया।’

भाबू कैवता—‘म्हारा सै दीकरा पास हुया। आज सिंझ्या रा थां नै खीर-पुड़ी खवाड़सूं।’

धीरै-धीरै सांझ पड़ती। काळजौ धड़कण लागतौ। अबै जीसा कनै पेसी पड़सी। वे नंबरां रौ पूछसी।

सिंझ्या रा सगळा जायनै चुपचाप जीसा कनै बैठ जाता। बारी आया वे सै ने इमतिहानां रौ हाल पूछता। पछै आधा घंटा रौ लेक्चर सुणणौ पड़तौ।

मैणत करनै पढणौ चाइजै। पढौला तो सोरा होवौला नीं तो पछै बळदां रा पूंछड़ा मुरड़णा पड़ैला। अबार मैणत कियोड़ी आगै काम आसी...अंत में कैवता—दो च्यार दिन खेल खूद लौ, पछै बालूराम जी माड़सा’ब री पोशाळ में जावणौ सरु कर दीजौ। स्कूलां खुलै जितरै मैणत करौ।

सुण’र म्हांनै तो ताव सो चढ जावतौ। छुट्टी में आया तो ई बालूरामजी री पोशाळ त्यार। जीसा ई जबरा है—छुट्टियां में ई खेलवा नी देवै।

पोशाळ जावता तो कदैई छिपला ई खावता। कदैई बजार में जाय खाटी मीठी वट्टियां खावता। पकड़ीज जावता तद मार पड़ती।

उण दिनां गांव री छटा ई न्यारी ही। च्यारूंमेर झाड़ ई झाड़ नीला छम्म! झाड़कां बिचाळै मोरिया टहूका देवता। नीं कोई अड़कौ’र नीं कोई धड़कौ, कोई हाकौ नीं, कोई हूबौ, अेकदम शांत वातावरण, जाणै सुरग रौ टुकड़ौ।

रात थकां घरां में घरटियां मंड जावती, कूकड़ी बोलण लागतौ। उण शांत वातावण में घरटियां री घरर-घरर आवाज घणी मीठी लागती। बूढा वडेरा बेगा उठनै प्रभाती गावण लागता। अंधारै-अंधारै लोग निबटण नै जावता। दिन उगतां ई गायां रै तांडण री आवाज आवण लागती। टोगडिया बांऽऽ-बांऽऽ करता आप आपरी मांवां रै थणां सूं दूध पीवण लागता। झरड़ गरड़ करतां बिलोवणा होवण लागता। दूध रा घडा भर्‌योडा रावळै में आवता। उण वखत दूध माटी री हांडियां में गरम करीजतौ अर माटी री परातां में ठारीजतौ। ठरतै दूध री सुगंध अळगै सूं ई आवती। वा सुगंध आज सुपना होगी। दूध माथै इसी जाड़ी थर (मलाई) आवती जाणै दही जम्यौ। दूध ठरियां पछै जावण देय डालां नीणै राख देवता अर ऊपर मोटौ भाठी मेलता—कठै ई मिन्नी बाई नीं अरोग लेवै।

बिलोवणौ नित रोज होवतौ। टणकी माटी री गोळी में दही उरेय’र टणकी मथाणी सूं दो लुगायां आमी-सामी रैय’र बिलोवती। माखण रा थेबा उतरता जिण सूं पारोटियौ भरीज जावता। माखण ताईजतौ तद गरम ताजा घी री सुगंध टेट बारै बैठोड़ां नै आवती।

बिलोवणै री झरड़ मरड़ बद होवती के म्है बारै बैठोड़ा जाण लेवता माखण त्यार होयग्यौ है। झट दौड़ आपौ आप री कांसी री तासळियां लेय दादीसा कनै जाय’र गादी माथै बांदरां री गळाई बैठ जावता। बाजरी रौ ठंडौ सोगरौ अर माखण रौ लूंदां खावता जिकौ आणंद आवतौ वो जबान सूं कथीज सकै। वो स्वाद हाल तांई जीभ रै चैठोड़ौ है।

माखण खावणिया माखण खावता अर चूरमौ खावणिया माखण ताईजतौ जितरौ उडीकता। घी त्यार होवतां ई उण में सोगरौ चूरनै घणै आणंद सूं खावता। घी पुरसण री न्यारी-न्यारी वाड़ियां अर टीपरियां होवती। दादीसा आपरै हाथ सूं परूसता।

कोई नै कमती मिळतौ तो वो रीसणौ ई कल लेतौ। उणनै मनाईजतौ। इण भांत कलेवा सूं धुड्ड होयनै पाछा बारै आय जावता। हाथ धोवता तो ई निरीताळ ताजा घी री खुशबू हाथां में सूं जावती कोनीं। आज कठै वा सौरम? सगळी बातां जाणै सुपनौ होयगी। आज उण बातां नै याद कियां भटका आवै।

उण दिनां गांवड़ां में अनाज पीसण री चक्कियां रौ कठैई नाम निसाण ई नीं हौ। अनाज अर मसाला सै घरटियां-हमाम दस्तां में पीसीजता कूटीजता। दसेक बज्यां रसोड़ौं करण वाळी रसोड़ै में पूग जावती। रावळौ रसोड़ौ न्यारौ होवतौ सो वा रावळा रसोड़ा वाळी बाजती। आवतां ई कोठारी आटौ, दाळ, मसालौ तोलनै देय देवतौ। पछै हमाम दस्तां में मसालौ कूटीजतौ। आज ई उण कूटवा री लय कानां में गूंजै ठक!...

ठकाठक...ठक! “ठकाठक...अर जद मसालौ सफा कपड़जाण होय जावतौ तो हमामदस्तै में चैठोड़ै मसालै नै भेळौ करण सारू ठणठण! करनै चोट करीजती अर सगळौ मसालौ भेळौ होय जावतौ। पछै महीन छालणी सूं छाण’र पाछौ सिलाड़ियां माथै लोडीजतौ अर महीन बांटनै साग दाळ में काम में लिरीजतौ।

उण जमानै में सगळै घरां में दाळ-साग हांडियां में बणता। चमचै री ठौड़ लकड़ी रा डोईला काम में लिरीजता। उण दाळ साग री सौरम आज ई नाक में बस्योड़ी है। स्वाद तो पछै क्यूं पूछौ उणरा आज तो भटका ई आवै। नीं तो वे ताजा कूट्योड़ा मसाला रह्या अर नीं अगरां मां जिसी रसोड़दारणां रही। सगळी बातां सुपना होयगी। अबै ई साग भाजी खावां ई हां पण वांरै मुकाबलै में बांटौ होवै ज्यूं लागै।

आगली डोकरियां अगरां मां, खोड़िया मां, बोखिया मां, रतनां मां, जीमण मां, वदी बाई अर सायरी सगळी जावती रही। अे जठै मसालौ कूटती, उठै भाठां माथै नित रै हमामदस्तां री चोट सूं खाडा पड़्योड़ा है, कांई ठा कितरी जणियां सागण ठौड़ बैठ नै मसाला कूटिया होसी। कूटतां-कूटतां कितरी दुनिया भर री बातां करी? कितरी बार बार आपसरी में लड़ी होसी? आज वे सगळी कोनीं पण भाठां माथै मंड्या हमासदस्तां रा निसाण आज ई मूंडै बोलै। अेक मीठी सी आवाज वा मांय सूं आज ई आवै— ‘वना जीमण त्यार है, अरोग लिरावौ।’

वे बूढी डोकरियां गई परी पण वांरौ लाड अर अपणायत आई ई याद आवै तद आंख्यां जळजळी होय जवै। वांरी कमी घमी महसूस होवै। खटली माथै बिराज्योड़ा दादी सा हाथ में लकड़ी लियां आज ई निजरां आगै फिरै। आज रूसीज्योड़ां नै कुण मनावै अर कनै बैठ रोटी जिमावै? ताजै तायोड़ै घी में कुण चूरमा करावै?

जठै कोई दिन बिलोवणां रा झप्पीड़ उडता। बीस-तीस लुगायां अर आ दमी हर वखत घर में लाधता। ब्याव रै ज्यूं चहल-पहल माची रैवती। हुंसी-खुशी, प्रेम अपणायत इत्याद सगळी बातां रौ साक्षी आज वो ई रावळौ सफा सूनौ पड़्यौ है। निरजन अर वीरान। जद कदैईं गांव जावूं फगत भावनावश उण ठौड़ां रौ चक्कर लगाय लूं। उण भींतां रौ परस कर अेहसास करलूं के अे वे सागण भींतां है। पछै निसासा नांख पाछौ आय जावूं।

बारली कानी मरदानौ दरीखानौ हौ जठै आठ दस बूढा-ठाडा ठाकरड़ा बैठा हर वखत होकौ गुड़गुडावता। कितरौ ठीमरपणौ कितरी शालीनता। बातां इण भांत विगतवार नेहचै सूं करता जाणै निजरां आगळ सिनेमा री रील चाल री। बीच बीच में दूहां अर कवित्त रा फटकारा लागता। वो इज दरीखानौ आज सूनौ पड़्यौ।

आज ई गांव बार बार आवणौ जावणौ पड़ै पण आज सूं 40-50 बरसां पैली दीठी बातां सै खतम हुयगी। नीं तो लोगां में अपणायत रही अर नीं अेक दूजै नै देख’र कोई राजी होवै। सगळा रात दिन भागता दौड़ात फिरै। कोई नै बात कण री ई फुरसत नीं। सगळां रै चेहरां माथै अेक अजब मायूसी सी छायोड़ी निगै आवै। कई बरस होयग्या कोई नै खुल’र हंसतौ ई नीं दीठौ। बैठकां जमती, ताश-चौपड़, वाघछाळी, चर-भर खेलीजती। वे सै बंद होयगी दूजी बात तो खैर छोड़ दो अबै तो परब तिंवार मनावण में कोई उमंग निंगै नीं आवै पैली होळी रौ तिंवार कितरी उमंग सूं मनाईजतौ। माह महीनौ लागतां ई चंग मंडीज जावता। रात-रात भर फाग गवीजता। लूहर लेवती लुगायां रै पगां रै घम्मीड़ां सू जमीं धूजण लागती। अबै वे बातां कठै?

जठै ओरण हा उठै री सगळी वनस्पती कटगी, नुंवी बस्तियां बसगी, फेक्ट्रियां खुलगी इमरत रै उनमान पाणी अबै जेहर होयग्यौ। आ कैयनै राजी भलांई हुवां के विकास होय रह्यौ है पण इणरै लारै कितरी चीजां रौ विनाश होयग्यौ।

गांव री जिकी साची आत्मा ही वा तो गांव वाळां विकास रै नाम माथै जमीं में दफणायदी। अबै तो लारै फगत कंकाळ बच्यौ है, वो ई कोई दिन खतम हुय जासी।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : नाहरसिंह जसोल ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मार्च 1988
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