साच तूं मेरा सांई, अवर दूजा कोई।

जिण्य उंमति उपाई, सिरजंणहारा सोई॥

साचां सेती संनमुखि, दुंमनां सेती दोई।

खालक सूं छांनै, कित रहियै छिप जाई॥

करता नै सूझे, सरब उपाई॥

किहंका मइया बावौ, कहंका बहंण भाई।

सब देखंता चाल्या, काहु की कुछि वसाई॥

हंसा उडि चाल्या, वेलड़ियां कुमळाई।

हंसा उडंण वारी, सुकरत साथि सखाई॥

इण सुगरै मोमिण, सत की पाळ बंधाई।

आवैलो खोजी, ल्यैलो खोज समाही॥

कोड़ि पांच पहुंता, झागी धारा जांही।

कोड़ि सात पहुंता, हरिचंद सूं सचियाई॥

कोड़ि नव पहुंता, अब बारां वारी आई।

साह सही सूं आयो, थळ सिरि एकळवाई॥

निरगुंण सरूप निरंजंण, अलख लखियो जाई।

दीन ताजदीन बोले, साह तेरी सरंणाई॥

स्रोत
  • पोथी : भारतीय साहित्य रा निरमाता : तेजोजी चारण ,
  • सिरजक : तेजोजी चारण ,
  • संपादक : कृष्णलाल बिश्नोई ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : द्वितीय
जुड़्योड़ा विसै