ताड उपाडिउ घालीउ पाइ पूछीउ कुसलु युधिष्ठिरि राइ
भणइ दुरयोधनु ‘अतिअ सुखीया तुम्ह पाय जउ मइ पणमीया॥
घर ऊपरि दुरयोधनु चलइ एतइं जयद्रथ पाछउ वलइ
निउन्नीउ कूंती रहिउ सोइ अरजुनि आणी मंत्र रसोइ॥
लोचन वची कूड करेउ चालिउ पापी द्रूपदि लेउ
अर्जुनु भीमु भिड्या भड बेउ कटकु विणासिउ द्रूपदि लेउ॥
पांचे पाटे भद्रिउ भीमि भिडी ऊपाडी रीस
नवि मारिउ छइ माडी वयणि जिम नवि दीसइ राडी भयणि॥
एतइ नारदु रिषि आवेऊ दुर्योधन सुं मंत्रु करेउ
नगर माहि वज्जाविउ वडहू बोलिउ दूजणु इम पडवडहु॥
‘पंचह पंडव करइ विणासु तेह तणी हु पुरुं आस’
पूत्रु पुरोहित नउ इम भणइ ‘कृत्या नउ वरु छइ अम्ह तणइ॥
कृत्या पासि करावु कामु वयरी नुं हुं फेडउ ठामु’
कृत्या आवी घाई ‘सकल कइ मारु कइ करूं विकल’॥
नारदु पहुतइ सिख्या देवि पंडव बइठा ध्यानु धरेवि
एक पाइ दिणयर द्रेंठि हीयडइ मंत्रु पंच परमेठि॥
दिवस सात जा इण परि जाइ ता अच्चंबभू को रणवाइं
एतइ आविउ कटकु अपारु पंडव घाया लेई हथीयार॥
घोडइ घाली द्रूपदि देवि साटे मारइं कटकु मिलेवि
अरजुनि जामुं दलु निरदलु राय तणुं तां सूकउ गलु॥
कृत्रिम सरवरि पाणी पीइं पांचइ पुहवी तलि मूंछीयइ
सरवर पालिं द्रूपदि मिली एकि पुलिंदइ आणी वली॥
कृत्या राखसि तणीय जि सही भीलिं बाली ऊभी रही
मणि माला नुं पाया नीरू पांचइ हूया प्रकटसरीर॥
॥ वस्तु ॥
पंच पंडव पंच पंडव चित्ति चिंतति
कुणु नरवरू आवीऊ कुणिं तलावि विसनीरू निम्मिउ
कुणि द्रूपदि अपहरीय कुणि पुलिंदि, इम चित्ति विम्हिउ
अमरु एकु पयडउ हुउ बोलइ, ‘सांभलि णाह
ए माया सवि मइं करी कृत्या राखेवाह’॥
एतइं भोजनवेला हुई द्रूपदि देवि करइ रसवई
मासखमणपारणइ मुणिंद वेला पहुतउ वारि नरिंद॥
पंचइ पंडव पय पणमति अतिथिदानु ते मुनिवर दिंत
वाजी दुंदुहि अनु दुडदुडी अंबर हूती वाचा पडी॥
मत्स्यदेसि जाई नइ रमउ ए तेरमउ वरसु नीगमउ
ग्या वइराटह राय असथानि वेस विडव्या नीय अभिमानि॥
कक भट्टु वल्लवु सूआरू अरजुनु हुउ कीवाचारू
चउथउ नकुलु असधउ थाइ सहदे वारइ नरवइ गाइ॥
प्रथम पवाडइ कीचक मरइ बीजइ दक्षिणगोग्रहु करइ
त्रीजउ उत्तरगोग्रहु हूउ पंडवि वरसु इस परि गमिउ॥
अभिवनु उत्तरकूंयरि वरिउ आवी कृष्णि वीवाहु सुं करिउ
पहुतउ सहूइ कन्हडपुरि च्यारि कन्न चिंहु पंडव वरी॥
॥ वस्तु ॥
दूयभार्वि दूयभार्वि गयउ गोवालु
‘दुजोहण वयणु सुणि एक बारमह भणिउ किज्जई
निय अवधिं आवीया पडवाह बहु मानु दिज्जई
इंदपत्थु तिलपत्थु पुरु वारुणु किसी च्यारि
हस्तिनागपुरु पांचमुं आपीउ मत्सरु वारि’॥
भणइ कुरबु भणइ कुरबु ‘देव गोविंद
मह महीयलि वणि फिरिया एहु मनु पंडव न मानइ
भुइं लद्धी भूयबलिं एक चास हिव ए न पामइ
इक्क महिलीपंच जण तीहं मिलिउ तु पक्खि
ए उअहाणउ सच्चु किउ ‘कूडउ कूडा सक्खि’॥
कन्हु बोलइ कन्हु बोलइ ‘भीमवलु जोइ
विसखप्पर कीचका बंकु हिडुंबु कमीरु मारिउ
लहु बंबवि अर्जुनिं दुन्नि बार तुह जीउ ऊगारिउ
विदुरि कृपागुरिं द्रोणि मइं जउ न मिलइ ए राय
तउ जाणु नियकुल नुंहिव कउरव नु घरू जाइ’॥
पंडु पुच्छीउ पंडु पुच्छीउ विदुरि घरि कन्हु
रीसारुणु चल्लीयउ मग्गि मिलीउ सहूइ नावइ
‘दुरयोधनु दुट्ठमणु किम इव देव अरह सलि न आवइ
हिव एकु अम्ह मानु दियउ बिंहु पखउ तु छडि
कउरववस विणासिवा कांई कूंडु म माडि’॥
मानु दिन्हउं मानु दिन्हउं कन्ह गंगेय
एकंतु करि अखीउ कन्न गुझु कुंती पयासीउं
‘ईह सत्थि कांइ तुं मिलिउ जोइ जोइ तु मनि विमासीउ’
करणु भणइ ‘सच्चु कहउ पुणू छह एकु वि नाणू
दुरयोधन रहिं आपणा मइ कल्पा छइ प्राण’॥
भणइ कन्हडु भणइ कन्हडु ‘कन्न जाणेजि
नवि मानिउ तुम्हि हु एह वात अति हुई विरूई
अम मुझ घरि अविया पंडुपुत्र इह बात गरूई
दुरयोधनि हु पंडवह छट्ठज कीधउ तोइ
रथु खेडिसु अरजुन तणउ ज भावइ त होउ’॥