व्रतु लेउ विदुरि गयउ वन माहि कन्ह वली द्वारावती जाइ
बिहुं पखि चालइ दल सामही बिहुं पखि आवइ भड गहगही॥

जरासिंध नऊ आविउ दूउ कालकुमरु जई लग्गइ मूउ
वणिजारा नी बात सांभली जरासिंधु आवइ तुम्ह भणी॥

उत्सव माहे उत्सवु एहु सबिहुं वयरी आव्यो छेहु
धर्मराय ना पणमीय पांय एतइ शल्यु सुं परि दल जाइ॥

‘करण रहइ दिउ गुमाजणी’ वइसि वात तिणि जातइ भणी
पांचि पंचाले लिउ सनाहु आविउ घडूउ कूंयरु अबाहु॥

इंदचंडु अनु चंदापीडु चित्रंगदु अन्नइ मणिचुडु
आविउ उत्तरू अनु वइराह मिलिउ वाग पंडव नउ धाहु॥

कऊरव नइ दलि गुरू गंगेऊ कृपु दुरयोधनु शल्यु मिलेऊ
शकुनि दुसासणु जयदथु पुत्रु गरूऊ भूरिश्रवा भगदत्तु॥

मिलीऊ जरासिंधु जादववइरि सह लगऊ अस हूइ सइरि
दुरयोधनु अति मत्सरि चडीऊ जाई जरासिंध पाएं पडीऊ॥

‘मुझ रहइ पहिलऊ दिउ अगेवाणु पंडव कन्ह दलऊ जिम माणु
इहां सेनानी गंगेउ प्रह विहसी जुडिला दल बेउ॥

दल मिलीया कलगलीय सुहड गयवर गलगलीया
धर ध्रसकीय सलवलीय सेस सगिरिवर टलटलीया।

रणवणीया सवि संख तूर अंबरु आकपीउ
हय गयवर खुरि खणीय रेणु ऊडीउ जगुझपीउ।

पंडइ बंध चलवलइ चिंघ सीगिणु गुण साधइ
गइ वरि गइ वरू तुरंगि तुरंगु राऊत रण रूघइं।

भिडइ सहड रडवडइ सीस धड नड जिम नच्चइ
हसइं घुसइ ऊससइ वीर मेगल जिम मच्चइ।

गयधडगुड गडमडत धीर धयवड धर पाडइ
हसमसता सामंत सरसु सरसेलि दिखाडइं।

सऊ सऊ रायह दिवसि दिवसि गंगेऊ विणासइ
तऊ आठमइ दिवसि कन्हु मन माहिं विमासइ।

मेल्हीऊ शल्लिहिं सकति कूंअरु ऊतरु रणू पाडीऊ
ताम सिखंडीय तणीय बुद्धि तऊ कान्हि दिखाडीऊ।

अरजुनु पूठि सिखंडीयाह वइसी सर मकइ
पडीऊ पीयामह समर माहि किम अरजुनु चूकइ।

त्रिगवी सरू रहावीयऊ सरि गंगा आणी
कऊतिगु दाखीऊ कऊरवाह पीऊ पायु पाणी।

इग्यारमइ दिवसि दोणि ऊठवणी कीजइ
आजु अपडवु कइ अदोणू इम मनिं चींतीजइ।

काहल कलयल ढक्क बूक त्रंबक नीसाणा
तउ मेल्हीऊ भगदत्ति राइ गजु करीऊ सढाणा।

चूरइ रहवइ नरकरोडि दंतूसलि डारइ
अरजुन पाखइ पडकटकु हणंतु कुणु वारइ।

दाणव दलि जिम दडवडतु दंती देखी नइ
घायऊ अरजुनु धसमसतू वयरी मूंकी नइ।

दिणि आथमतइ हणिऊ हाथि हरि पंडव हरखीया
दिणि तेरमइ चक्रव्यूहु गऊ कऊरवि मांडीय।

अर्जुनु गिऊ वनि झूझिवा तिणि अभिवनु पइसइ
मारीऊ जयदथि करीऊ झूझु तऊ अरजुनु रूसइ।

करीऊ प्रतिज्ञा चडीऊ झूमि जयदथु रणि पाडइ
भूरिश्रवा नऊ तीण समइ सरि बाहु विडारइ।

सत्यकु छेदिऊ बलिंहिं सीसू तसु दिणि चऊदमइ
रीतिहिं झूझइ विसम झूझि गुरू पडइ कीमइ।

कूडऊं बोलइ धरमपूतू हथीयार छडावइ
छेदिउ मस्तकु धृष्टद्युमनि क्रमु सिउ न करावइ।

बार पहर तऊ चडीऊ रोसि गुरनंदणु झूझइ
रणि पाडिऊ भगदत्तु राऊ कऊरव दल मंझइ।

करि करवालु जु करीऊ करणू समहरि रणू मांडइ
फारक पायक तूरंग नाग नवि कोई छंडइ।

धूलि मिलीय झलमलीय सयल दिसि दिणयरू छाईऊ
गयणे दुंदुहि दमद्रमीय सूरवरिंजसु गाईऊ।

पाडइ चिंध कबंध बंध धरमंडलि रोलइ
बाणि बिनाणि किवणि केवि अरीयण धंधोलइ।

कूंडु करीऊ गोविंदि देवि रथु धरणिहिं खूतऊ
मारीऊ अरजुनि करणू कूडि रणि अणझूझतऊ।

शल्यु शकुनि वेऊं हणीय वेगि नकूलि सहदेविं
सरवरमाहि कढावीयऊ दुरयोधनु दैविं।

राइ सनाहु समोपीयऊ भीमिहिं सूं भिडेऊ
गदापहारिं हणीय जांघ मनि सालु सूं फेडिऊ।

रूठऊ राम मनाविवा जा पंडव जाइ
कृपु कृतवर्म आसवामता त्रिन्हइ धाइ।

पाछपीलि पापी करइ कूडु दीधऊ रतिवऊ
निहणीय पंच पंचाल बाल अनु राखसि जाऊ।

सीसू शिखंडी तणऊ तामु छेदीऊ छलु साधीऊ
पाप पराभव नइ प्रवेसि गतिमागु विंराधीऊ।

कन्हडि बोधीऊ सूयण लोकु सहु सोगु निंवारीउ
पहुतुं सहूइनीय नयरिं परीयणि परिंवारीय।

                 ॥ वस्तु ॥

दाधु दिन्हऊ दाधु दिन्हऊ कन्ह ऊवएसिं
तहिं अरजुणिं मिंल्हिंऊ आगिणेय सरू अगिं ऊट्ठीय
बहु दुक्खु मणिं चिंतवीय पंडसेन घण नयणिं वुट्ठीय
कन्हडु सहूउ परीठवीऊ कूणबिं निंवारी रोसु
हथिणाउरपुरि आवीया अति आणदिऊ लोकू॥

स्रोत
  • पोथी : आदिकाल की प्रमाणिक रचनाएं ,
  • सिरजक : शालिभद्र सूरि ,
  • संपादक : गणपति चंद्र गुप्त ,
  • प्रकाशक : नेशनल पब्लिकेशन हाउस, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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