एक मूंग कीया द्वै फाड़ी। देखि तमासौ टेकी जाड़ी॥
बीचि अंकूर बिरह का फांसा। साजन ले ले द्यौड़्या कांसा॥
जीवत बैठा वोला वोली। भात परोस्यौ पोलापोली॥
दे दे चौका बात चलाई। मति को काहूं भींटै भाई॥
भेद भजै तौ हरि कथा, नहिंतर गाया गीत।
सूता था सुणि जागिया, मन जु भया भै भीत॥
भींट्यां भाव रहै नहिं आगै। बाद बिरोध बिखै दुख लागै॥
मूंड हलायां सहपति जाई। अणहूंती अलबधि घर आई॥
लाजा ले करि माखी खाजै। बरग बिगुचै अरु बंस लाजै॥
जे खाइ तौ जूवा हारै। ऊठि जाइ तौ पणि झख मारै॥
यहु गुण बाभण बाणिया, जाणैं उतिम लोग।
रामस्नेही क्यूं रहै, रटै जु राम बिवोग॥
जब लग जाति न छाडै केड़ौ। आई धाड़ि पहूंतौ पेड़ौ॥
गांठि टटोली झोली चूंथी। नांव कपूरी पाखां खूथी॥
मन छूटण कूं भारी लोचै। गाफिल पड़ियो जो लै पोचै॥
सूरौ होइ तौ खड़ग संभालै। पड़तौ आभ भुजा दे टालै॥
बूड़ा गुण मैं देह धरि, पायौ नहीं निधान।
मूंड़ि चढाया मोटली, ऊंचा यहु अभियान॥
ऊंचा नीचा जब लग कहिये। तूटै तागि जोग जे लहिये॥
जब लग जोग न आवै गहणी। तब लग फिरि फिरि फोकट कहणी॥
फोकट नाचै फोकट गावै। फोकट देस दुनी समझावै॥
समझावणिसी जापैं होई। तिहिं क्यूं कुल की गांठ न खोई॥
कुल की डगर बुहारतां, काठै रहि गयौ राम।
ते बसि सहसी बापड़ा, जम की धूमांधाम॥
मार सही मूंठार निमाणा। साच न सूझै सुख स्यूं काणा॥
बार बिचालै रोही रोहा। न्याइ पुकारै हरि सूं द्रोहा॥
चोर मिहालू का कहि रोवै। नैण भरै अरु पाछौ जोवै॥
पेट सवारथ गलका खाधा। मुणिस पराया घर मैं बाधा॥
बोलण नैं ठाहर नहीं, साध हूंण नैं साखि।
पाणी बहि मुलतान गयौ, नीच न जाण्यौ राखि॥
आणि अपूठौ बांधै पारौ। नीर बिना नाहीं निसतारौ॥
हरखि हिलोलि पसी भरि पीवै। प्रेम बिना क्यूं जोगी जीवै॥
तिरण बुडण की यहु मति खोटी। काल मरै क्यूं लाठी छोटी॥
फोर फार करि चोट न फावै। मुगध न पूजै मुरड़ी चावै॥
जाकै हिरदै भै भरम, दुरमति दीरध रोग।
रामसनेही बाहिरा, बादि बिगुचैं लोग॥
जे को जाणि बिगूचै कोई। निहचै राम कहैगा सोई॥
निहिचा पछैं आघौ पाछौ। बिन बिसवास स्वांग जिनि काछौ॥
तू जिनि जानैं याही धोधा। फीटा आप काहि परमोधा॥
सीखी साखि सुणावै पोथा। भीतरि भेद नहीं सर थोथा॥
लालच ही की या दुनी, लालच ही का खेल।
पूरणगति पासै रही, अंधा याही हेल॥
रीता रूंड घघू सैं गहला। बाहरि ऊजल भीतरि मैला॥
जे को पग की पासी काटै। जाणि बूझि फकटौ क्यूं ठाटै॥
जे नर जनम जनम का ऊंणा। खाइ अभोगा तिनसा सूना॥
ग्यान उजाला जिनकौ सूधा। तिन बिख स्यूं करि लीया दूधा॥
माधौ मिश्री मेल्हि करि, विख स्यूं लावै हेत।
ल्हैला लाटता, जिनका निरफल खेत॥
जे को चित दे किरख कमावै। नेड़ौ छाड़ि दूरि कत धावै॥
दूरि जाहिं ते दीसैं भूला। अजहूं नींद नेत नहिं खूला॥
यहु ऊंघण का नाहीं पहरा। सकहुत हारि जाहुगे सहारा॥
अबकैं जे कण हाथि न पड़िया। बिरधि गई अंकुर पणि झड़िया॥
नेपै न आई बीजगौ, हाली नैं यहु हाणि।
छाडि कपट सेयौ नहीं, सकतौ सारंगप्राणि॥
सोच पोच स्यूं सेवै काचा। सतगुर मिलै न बसि व्है बाचा॥
जे बाणी बसि कीयौ चाहै। तौ प्रेम प्रीति ले पंजर गाहै॥
नैणनि हाव तिदावणि फेरै। सीस नवाइ सु गही करि घेरै॥
इहिं आकार बिचारै आपौ। जहीं ठैरासि तहीं ठै थापौ॥
गाडै मेढगला सई, बारह घालै बाथ।
माथै फड़कौ नाखि दे, धोरी थांभै हाथ॥
करि सूरातण साधै खेती। धन धीरज की भानै छैती॥
तौ करतार परम हितकारी। सो निज नाह तजै क्यूं नारी॥
सखी सुहाग स्याम कौ लोड़ै। तौ जग मरजाद तिणां ज्यूं तोड़ै॥
यहु संसार रैणि का सुपिना। बिन भगवंत नहीं को अपना॥
निसबासुरि पिव पिव करै, चात्रिक की सी चाड।
बर बादल दामणि बधू, तब या लहसी लाड॥
इहिं घटि घटा क्रिपा करि बूठौ। तन की ताप गई ते तूठौ॥
आनंद मैं आसूं वोल्हरिया। स्वांति सुधा डर डाबर भरिया॥
ध्यान धार छूटी आकासा। बोरड़ि बूंद बराबरि प्यासा॥
बाव बिकार न बाजै गाढौ। इहिं पद अरथ अनूपम काढौ॥
आरति सूं आठूं पहर, सदिकै करूं सरीर।
अब हरदास न बीसरै, रसना रमिता बीर॥