रिसग जिणेसर पय पणमेवी, सरसति सामिणि मनि समरेवी,
नमवि निरंतर गुरुचलणा॥

भरह नरिदह तणुं चरित्तो, जं जुगी वसहांवलय वंदीतो,
बार बरिस बिहुं बंधवहं॥

हुं हिव पभणिसु रासह छंदिहि, तं जनमनहर मन आणंदिहि,
भाविहि भवीयण ! संभळेउ॥

जंबुदीवि उवझाउरि नयरो, घणि कणि कंचणि रयणिहि पवरो,
अवर पवर किरि अमर परो॥

करइ राज तहिं रिसह जिणेसर, पावतिमिर भयहरण दिणेसर,
तेजि तरणि कर तहि तपइ ए॥

नामि सुनंद सुमंगल देवि, राय रिसहेसर राणि बे वि,
रूव रेहि रति प्रीति जित॥

बिवि बेटी जनमी सुनंदन, तेह जि तिहूयण मन-आनंदन,
भरह सुमंगळ-देवि तणु॥

देवि सुनंदन नंदन बाहूबलि, भंजइ भिउड महाभड भूयबलि,
अवर कुमर वर धीर धर॥

पूरब लाख तेणि तेयासी, राजतणीं परि पुहवि पयासी,
जुगि जुग मारग दाखीउ ए॥

उवझापुरि भरहेसर थापीय, तक्षशिला बाहुबलि आपीय,
अवर अठाणुं वर नयर॥

दान दियइ जिणवर संवत्सर, विसयविरत्त वहइ संजमभर,
सुर असुर नरि सेवीउ ए॥

परमताळपुरि केवलनाणुं, तस ऊपन्नू प्रगट प्रमाणूं,
जाण हवुं भरहेसरह॥

तिणि दिणि आउधसालहं चक्को, आवीय अरीयण पड़िय ध्रसको,
भरह विमासइ गहगहीउ॥

धनु धनु हुं धर-मंडलि राउ, आज पढम जिणवर मुझ नाऊ,
केवललच्छि अलंकीयउ॥

पहिलु ताय-पाय पणमेसो, राजरिद्धि राणिम-फल लेसो,
चक्करयण तव अणुसरउं॥

वस्तु


चलीय गयवर, चलीय गयवर, गडीय गज्जंत,
हूं पत्तउ रोसभरि, हिणहिणंत हय थट्ट हल्लीय।
रह भय भरि टलटलीय मेरु, सेसु मणि मउड खिल्लीय।
सिउं मरुदेविहिं संचरीय, कुंजरी चडिउ नरिंद।
समोसरणि सुरवरि सहिय, वंदिय पढम जिणंद॥

पढम जिणवर, पढम जिणवर-पाय पणमेवि,
आणंदिहिं उच्छव करीय, चक्करयण वलिवलिय पुज्जइ।
गडयडंत गजकेसरीय, गरुय नद्दि गजमेह गज्जइ।
बहिरीय अंबर तूर-रवि, वलिउ नीसाणे घाउ।
रोमंचिय रिउरायवरि, सिरि भरहेसर राउ॥

ठवणि


प्रहि उगमि पूरवदिसिहिं, पहिलउं चालीय चक्क तु।
धूजीय धरयल थरहर ए, चलीय कुलाचल-चक्क तु॥

पूठि पीयाणुं तउ दियए, भूयबलि भरह नरिंद तु।
पिडि पंचायण परदलहं, इलियलि अवर सुरिंद तु॥

वज्जीय समहरि संचरीय, सेनापति सामंत तु।
मिलीय महाधर मंडलीय, गाढिम गुण गज्जंत तु॥

गडयडंतु गयवर गुडीय, जंगम जिम गिरिशृंग तु।
सुंडा-दंड चिर चालवइं, वेलइं अंगिहिं अंग तु॥

गंजइं फिरि फिरि गिरि सिहरि, भंजइं तरुवर डालि तु।
अकस-वसि आवइं नहीं य, करइं अपार अणालि तु॥

हीसइं हसमिसि हणहणइं ए, तरवर तार तोषार तु।
खूंदउं खुरलइं खेडवीय, मन मानइं असुवार तु॥

पाखर पंखि कि पंखरू य, ऊडाऊडिहि जाइ तु।
हुंफइं तलफइं ससइं धसइं, जडइं जकीरीय धाइं तु॥

फिरइं फेकारइं फोरणइं, फुड फेणाउलि फार तु।
तरणि तुरंगम सम तुलइं, तेजीय तरल ततार तु॥

धडहडंत धर द्रमद्रमीय, रह रूंधइं रहवाट तु।
रव-भरि गणइं न गिरि गहण, थिर थोमइं रहथाट तु॥

चमरचिंध धज लगलहइं ए, मिल्हइं मयगल माग तु।
वेगि वहंता तीहं तणइं ए, पायल न लहइं लाग तु॥

दडवंदत दह दिसि दुसह ए, पसरीय पायक्क-चक्क तु।
अंगोअंगिइं अंगमइं, अरीयणि असणि अणंत तु॥

ताकइं तलपइं तालि मिलिइं, हणि हणि हणि पमणंत तु।
आगलि कोइ न अछइ मलु ए, जे साहमु जूझंत तउ॥

दिसि दिसि दारक संचरीय, वेसर वहइं अपार तु।
संष न लाभइं सेन-तणीं, कोइ न लहइं सुधि सार तु॥

बंधव बंधवि नवि मिलइं, न बेटा मिलइं न बाप तु।
सामि न सेवक सारवइं, आपिहिं आप विआप तु॥

गयवडि चडीउ चक्कधरो, पिडि पयंड भूयदंड तु।
चालीय चिहुं दिसि चलचलीय, दिइं देसाहिब दंड तु॥

वज्जीय समहरि द्रमद्रमीय, घण-निनाद नीसाण तु।
संकीय सुरवरि सग्गि सवे, अवरहं कमण प्रमाण तु॥

ढाक ढूक त्रंबक तणइं ए, गाजीय गयण निहाण तु।
खट खंडह खंडाहिवहं, चालतु चमकीय भाण तु॥

भेरीय रव भर तिहुं भूयणि सहित किमइं न माइ तु।
कंपीय पय भरि शेष रहिउ, विण साहीउ न जाइ तु॥

सिर डोलावइ धरणिहिं ए, टूंक टोल शिरिशृंग तु।
सायर सयल वि झलझलीय, गहलीय गंग तुरंग तु॥

खर रवि पूंदीय मेहरवि, महियलि मेहंधार तु।
उजूआलइ आउध तणइं, चालइं रायखंधार तु॥

मंडिय मंडलवइ न मुहे, ससि न कवइं सामंत तु।
राउत राउतवट रहीय, मनि मूंझइं मतिवंत तु॥

कटक न कवणिहि भर तणुं, भाजइ भेडि भडंत तु।
रेलइं रयणायर जमले, राणोराणि नमंत तु॥

साठि सहस संवच्छरहं, भरहस भरह खंड तु।
समरंगणि साधइ सधर, वरतइ आण अखंड तु॥

वार वारिस नमि विनमि, भड भिडीय मनावीय आण तु।
आवाठी तडि गंग तणइ, पामइ नवह निहाण तु॥

छत्रीस सहस मउडध सिउं, चऊद रयण संपत्त तु।
आविउ गंग भोगवीय, एक सहस वरसाउ तु॥

तउ तिहिं आउधसाल, आवइ आउधराउ नवि।
तिणि खिणि मणि भूपाल, भरह भयह लोलावडओ॥

बाहिरि बहूय अणालि, अलूआरीय अहनिसि करइ ए।
अति उतपात अकालि, दाणव दल वरि दापवइ ए॥

मतिसागर किणि काजि, चक्क तन पुरि परवेस करइ।
तइं जि अम्हारइ राजि, धोरीय धर धरीउ धरहं॥

देव कि थंभीउ एय, कवणि कि दानव मानविहिं।
एउ आखि न मुझ भेउ, वयरीय वार न लाईइ ए॥

बोलइ मंत्रिमयंक, सांभलि सामीय चक्कधरो।
अवर नहीं कोइ वंकु, चक्करयण रहवा तणउ॥

संकीय सुरवर सामि, भरहेसर तूंय भूय भवणे।
नासइं ति सुणीय नामि, दानव मानव कहि कवणि॥

नवि मानइं तूंय आण, बाहूबलि बिहुं बाहुबले।
वीरह वयर विनाणु, विसमा विहडइं वीरवरो॥

तीणि कारणि नरदेव, चक्क न आवइ नीय नयरे।
विण बंधव तूंय सेव, सहू कोइ सामीय साचवइ ए॥

तं ति सुणीय तीणइ तालि, ऊठीउ राउ सरोसभरे।
भमइ चडावीय भालि, पभणइ मोडवि मूंछि मुहे॥

जु न मानइ मझ आण, कवण सु कहीइ बाहुबले।
लीलहं लेसु ए राण, भंजउं भुज भारिहिं भिड़ीय॥

स मतिसागर मंति, वलि वसुहाहिव वीनवइ।
नवि मनि कीजइ खंति, बंधव सिउं कहि कवण वलो॥

दूत पठावीयइ देव, पहिलउं वात जणावीइ ए।
जु नवि आवइ देव, तु नरवर कटकई करउ ॥

तं मनि मानीय राउ, वेगि सुवेगहं आइसइ ए।
जईय सुनंदाजाउ, आण मनावे आपणीय॥

जां रथ जोत्रीय जाइ, सु जि आएसिहिं नरवरहं।
फिरि फिरि साहमु थाउ, वाम तुरीय वाहणि तणउ॥

काजलकाल बिराल, आवीय आडिहिं ऊतरइ ए।
जिमणउ जम विकराल, खरु खु-रव ऊछलीय॥

सूकीय बाउल डालि, देवि बइठीय सुर करइ ए।
झंपीय झाल मझालि, घूक पोकारइ दाहिणओ॥

जिमणइं गमइं विषादि, फिरीय शिव फे करइ ए।
डावीय डगलइ सादि, भयरव भैरव रवु करइ ए॥

वड जखनइं कालीयार, एकऊ बेढुं ऊतरइ ए।
नींजलीउ अंगार, संचरतां साहमु हुइ ए॥

काल भुयंगम काल, दंतीय दंसण दाखवइ ए।
आज अखूटउ काल, खूटउ रहि रहि इम भणइ ए॥

जाइ जाणी दूत, जीवह जोखि आंगमइ ए।
जेम भमंतउ भूत, गिणइ न गिरि गुह वण गइण॥

तईड नेसमि वेस, न गिणइ नइ दह नींझरण।
लंघीय देस असेस, गाम नयर पुर पाटणह॥

वाहरि बहूय आराम, सुरवर नइ तां नीझरण।
मणि तोरण अभिराम, रेहइ धवलीय धवलहरो॥

पोयणपुर दीसंति, दूत सुवेग सु गहगहीउ।
व्यवहारीया वसंति, धणि कणि कंचणि मणि पवरो॥

धरणि तरणि ताडंक, जेम तुंग त्रिगढुं लहइ ए।
एह कि अभिनव लंक, सिरि कोसीमां कणयमय॥

पोढा पोलि पगार, पाडा पार न पीमाइं ए।
संख न सीहदूंयार, दीसइं देउल दह दिसिइं॥

पेखवि पुरह प्रवेसु, दूत पहूतउ रायहरे।
सिउं प्रतिहार प्रवेसु, पामीय नरवर पय नमइ ए॥

चउकीय माणिक थंभ, माहि वईठउ बाहुबले।
रूपिहिं जिसीय रंभ, चमरहारि चालइं चमर॥

मंडिय मणिमय दंड, मेघाडंबर सिरि धरिय।
जस पयडे भूयदंडि, जयवंती जयसिरि वसइं ए॥

जिम उदियाचलि सूर, तिम सिरि सोहइ मणिमुकुटो।
कसतुरीय कुसुम कपूर, कुचूंवरि महमहइ ए॥

झलकइ ए कुंडल कानि, रवि शशि मंडीय किरि अवर।
गंगाजल गजदानि, गाढिम गुण गज गुडअडइं ए॥

उरवरि मोतीय हार, वीरवलय करि झलहलइ ए।
तवल अंगि सिणगार, खलक ए टोडर वामइ ए॥

पहिरणि जादर चीर, कंकोलइ करिमाल करे।
गुरूउ गुणि गंभीर, दीठउ अवर कि चक्कधर॥

रंजिउ चित्ति सु दूत, देखीय राणिम तसु तणीय।
धन रिसहेसपूत, जयवंतु जुगि बाहुबले॥

बाहुबलि पूछेइ कुवण, काजि तुम्हि आवीया ए।
दूत भणइ निज काजि, भरहेसरि अम्हि पाठव्या ए॥

वस्तु


राउ जंपइ, राउ जंपइ, सुणि न सुणि दूत,
भरहखंड भूमीसरहं, भरह राउ अम्ह सहोयर।
सवाकोडि कुमरिहिं सहीय, सूरकुमर तहिं अवर नरवर।
मंति महाधर मंडलिय, अंतेउरि परिवारि।
सामंतह सीमाड सह, कहि न कुसल सविवार॥

दूत पभणइ, दूत पभणइ, बाहुबलि राउ,
भरहेसर चक्कधर, कहि न कवणि दूहवणह किज्जइ।
जिहु लहु बंधव तूंय, सरिस गडयडंत गज भीम गज्जइ।
जइ अंधारइ रवि किरण, भड भंजइ वर वीर।
तु भरहेसर समर भरि, जिप्पइ माहरी धीर॥

ठवणि


वेगि सुवेग सु बुल्लइ, संभलि बाहूबलि।
राउत कोइ तुह तुल्लइ, ईणिइं अछइ रवितलि॥

जां तव बंधव भरह नरिंदो, जसु भुइं कंपइं सग्गि सुरिंदो।
जीणइं जीतां भरह छ खंड, म्लेच्छ मनाव्या आण अखंड॥

भडि भडंत न भूयबलि भाजइ, गडयडंतु गढि गाढिम गाजइ।
सहस बतीस मउडाधा राय, तूंय बंधव सवि सेवइं पाय॥

चऊद रयण घरि नवइं निहाण, संख न गयघड जसु केकाण।
हूंय हवडां पाटह अभिषेको, तूंय नवि आवीय कवण विवेको॥

विण बंधव सवि संपय ऊणो, जिम विण लवण रसोइ अलूणी।
तुम्ह दंसण उतकंठिउ राउ, नितु नितु वाट जोइ तुह भाउ॥

वडउ सहोयर अनइं वड वीर, देव ज प्रणमइं साहस धीर।
एक सीह अनइं पाखरीउ, भरहेसर नइं तइं परवरीउ॥

तु बाहुबलि जंपइ, कहि वयण म काचुं।
भरहेसर भय कंपइ, जं जग तुं साचुं॥

समरंगणि तिणि सिउं कुण काछइ, जीह बंधव मइं सरिसउ पाछइ।
जावंत जंबुदीवि तसु आण, तां अम्ह कहीइ कवण ए राण॥

जिम जिम सु जि गढ गाढिम गाढउ, हय गय रह वरि करीय सनाढु।
तस अरधासण आपइ इंदो, तिम तिम अम्ह मनि परमाणंदो॥

जु न आव्या अभिषेकह वार, तु तिणि अम्ह नवि कीधा सार।
वडउ राउ अम्ह वडउ जि भाई, जहिं भावइ तिहां मिलिसिउं जाई॥

अम्ह ओलगनी वाट न जोई, भड भरहेसर विकर न होइ।
मझ बंधव नवि फीटइ कीमइ, लोभीया लोक भणइ लख ईम्हई॥

चालि म लाइसि वार, बंधव भेटीजइ।
चूकि भ चींति विचार, मूंय वयण सुलीजइ॥

वयण अम्हारुं तूय मनि मानि, भरह नरेसर गणि गजदानि।
संतूठउ दिइ कंचण भार, गयघड तेजीय तुरल तुषार॥

गाम नयर पुर पाटण आपइ, देसाहिव थिर थोभीय थापइ।
देय अदेय नं देतु विमासइ, सगपणि कह नवि किंपि विणासइ॥

जा ण राउ ओलगिउं जाणइ, माणण हार विरोषिइं मारइ।
प्रतिपन्नउं प्रगट प्रतिपालइ, प्रारथिउ नवि घडी विमरालइ॥

तिणि सिउं देव न कीजइ ताडउ, सु जि मनाविइ मांड म आडउ।
हुं हितकारणि कहुं सुजाण, कूडूं कहूं तु भरहेसर आण॥

वस्तु


राइ जंपइ, राउ जंपइ, सुणि न सुणि दूत,
त विहि लहीउ भालहलि, तं जि लोय भवि भविहि पामइ।
ईमइ नीसत नर ति (नि) गुण, उत्तमांग जण जणह नामइ।
बंभ पुरंदर सुर असुर, तीहं न लंघइ कोइ।
लब्भइ अधिक न ऊण पणि, भरहेसर कुण होइ॥

ठवणि


नेसि निवेसि देसि घरि मंदिरि, जलि थलि जंगलि गिरि गुह कंदरि।
दिसि दिसि देसि देसि दीपंतरि, लहीउं लाभइ जुगि सचराचरि॥

अरिरि दूत सुणि देवन दानव, महिमंडलि मंडल वैमानव।
कोइ न लंघइ लहीया लीह, लाभइ अधिक न उछा दीह॥

धण कण कंचण नवइ निहाण, गय घड तेजीय तरल केकाण।
सिर सरवस सपतंग गमीजइ, तोइ नीसत्त पणइ न नमीजइ॥

दूत भणइ एहु भाई, पुन्निहिं पामीजइ।
पइ लागीजइ भाई, अम्ह कहीउं कीजइ॥

अवर अठाणूं जु जई पहिलूं, मिलसिउं तु तुझ मिलिउं न सयलुं।
कहि विलंब कुण कारणि कीजइ, माम म नीगमि वार वलीजइ॥

वार वरापह करसण फलीजइ, ईणि कारणि जई वहिला मिलीइ।
जोइ न मन सिउं वात विमासी, आगइ वारूअ वात विणासी॥

मिलिउ न किहां कटक मेलावइ, तउ भरहेसर तइं तेडावइ।
जाण रखे कोइ झूझ करेसिइ, सहू कोइ भरह जि हियडइ धरेसिइ॥

गाजतां गाढिम गज भीम, तें सवि देसह लीधा सीम।
भरह अछइ भाई भोळावउ, तउ तिणि सिउं न करीजइ दावउ॥

वस्तु


तव सु जंपइ, तव सु जंपइ, बाहुबलि राउ;
अप्पह बाह भजां न बल, परह आस कहइ कवण कीजइ।
सु जि मूरख अजाण पुण, अवर देखि बरवयइ ति गज्जइ।
हुं एकल्लउ समर भरि, भड़ भरहेसर घाइ।
भंजउं भुजबलि रे भिड़िय, भाह न भेडि न थाइ॥

जइ रिसहेसर केरा पूत, अवर जि अम्ह सहोयर दूत।
ते मनि मान न मेल्हइं कीमइं, आलईयाण म झंखिसि ईम्हइ॥

परह आस किणि कारणि कीजइ, साहस सइंवर सिद्धि वरीजइ।
हीउं अनइ हाथ हत्थीयार, एह जि वीर तणउ परिवार॥

जइ कीरि सीह सीयालइं खाजइ, तु बाहुबलि भूयबलि भाजइ।
जु गाइं वाघिणि खाई जइ, अरे दूत तु भरह जि जीपइ॥

जु नवि मन्नसि आण, बरबहं बाहूबलि।
लेसिइ तु तूं प्राण, भरहेसर भूयबलि॥

जस छन्नवइ कोडि छइं पायक, कोडि बहुत्तरि फरकइं फारक।
नर नरवर कुण पामइ पारो, ससी न सकीइ सेनाभारो॥

जीवंता विहि सहू संपाडइ, जु तुडि चडिसि तु पवाड़इ।
गिरि कंदरि अरि छपिउ न छूटइ, तूं बाहुबलि मरि म अखूटइ॥

गय गद्दह हय हड जिम अंतर, सीह सीयाळ जिसिउ पटंतर।
भरहेसर अन्नइ तूंय विहरउ, छूटिसि किम्हइ करंत न निहरू॥

सरवसु सुंपि मनावि न भाई, कहि कुणि कूडी कुमति विलाई।
मूंझि म मूरख मरि म गमार, पय पणमीय करि करि न समार॥

गढ गंजिउ भड़ भंजिउ प्राणी, तइं हिव सारइ प्राण विनाणि।
अरे दूत बोली नवि जाण, तुंह आव्या जमह प्राण॥

कहि रे भरहेसर कुण कहीइ, मइं सिउं रणि सुरि असुरि न रहीइ।
जे चक्किइं चक्रवृत्ति विचार, अम्ह नगरि कूंभार अपार॥

आपणि गंगातीरि रमंता, धसमस धूंधळि पड़ीय धमंता।
तइं ऊलाळीय गयणि पडंतउ, करुणा करीय वली झालंतउ॥

ते परि कांइ गमार वीसार, जु तुडि चडिसि तु जाणिसि सार।
जउ मउडुधा मउड़ ऊतारउं, रूहिरु रिल्लि जु न हय गय तारउं॥

जउ न मारउं भरहेसर राउ, तउ लाजइ रिसहेसर ताउ।
भड़ भरहेसर जई जणावे, हय गय रह वर वेगि चलावे॥

वस्तु


दूत जंपइ, दूत जंपइ, सुणि न सुणि राउ;
तेह दिवस परि म न गिणसि, गंगतीरि खिल्लंत जिणि दिणि।
चल्लंतइं दल भारि जसु, सेससीस सलसलह फणिमणि।
ईमई याण स मानि रणि, भरहेसर छइ दूरि।
आपांपूं वेढिउं गणे, कालि ऊगंतइं सूरि॥

दूत चल्लिउ, दूत चल्लिउ, कहीय इम जाम;
मंतीसरि चिंतविउ, तु पसाउ दूतह दिवारइ।
अवर अठाणूं कुमर वर, वाइ सोइ पहतु पचारइ।
तेह न मनिउ आविउ, वलि भरहेसरि पासि।
अखई य सामिय संधिबळ, बंधवसिउं म विमासि॥

ठवणि


तउ कीपिहिं कलकलीउ काल के य कलानल,
कंकोरइ कोरंवीयउ करमाल महाबल।
कालह कलयणि कलगलंत मउडाधा मिलीया,
कलह तणइ कारणि कराल कोपिहिं परजालीया॥

हऊउ कोलाहउ गहगहाटि गयणंगणि गज्जिय,
संचरिया सामंत सुहड़ सामहणीय सज्जीय।
गड़यडंत गय गडीय गेलि गिरिवर सिर ढालइं,
गूगलीया गुलणइ चलंत करिय ऊलालइं॥

जुड़इं भिड़इं भड़हडइं खेदि खड़खड़इं खड़ाखडि,
धाणीय धूणीय धोसवइं दंतूसलि दोत (तडा) डि।
खुरतलि खोणि खणंति खेदि तेजीय दरवरिया,
समइं धसइं धसमसइं सादि पय सइं पाखरिया॥

कंधग्गल केकाण कवी करड़इं कडीयाली,
रणमइं रवि रण वखर सखर घण घाघरीयाला।
सींचाणा वरि सरइं फिरइं सेलइं फोकारइं,
ऊडइं आडइं अंगि रंगि असवार विचारइं॥

धसि धामइं धड़हडइं धरणि रथि सारथि गाढा।
जड़ीय जोध जड़जोड जरद सन्नाहि सनाढा।
पसरिय पायल पूर कि पुण रळीय रयणार।
लोह लहर वरवीर वयर वहवटिइं अवायर॥

रणणीय रवि रण तूर तार त्रंबक त्रहत्रहीया,
ढाक ढूक ढम ढमीय ढोल राउत रहरहीया।
नेच नीसाण निनादि नींझरण निरंभीय,
रणभेरी भुंकारि भारि भूयबलिहिं वियंभीय॥

चल चमाल करिमाल कुंत कड़तल कोदंड,
झलकइ साबल सबल सेल हल मसल पयंड।
सीगिणि गुण टंकार सहित बाणावलि ताणइं,
परशु उलालइं करि धरइं भाला ऊलालइं॥

तीरीय तोमर भिंडमाल डबतर कसबंध,
सांगि सकति तरुआरि छुरीय अनु नागतिबंध,
हय खर रवि ऊछलीय खेह छाईय रविमंडल,
धर धूजइ कलकलीय कोल कोपिउ काहड्डल॥

टलटलीया गिरिटंक टोल खेचर खळभळीया,
कडडीय कूरम कंधसंधि सायर झळहळीया।
कडडीय कूरम कंधसंधि सायर घलहळीया।
चल्लीय समहरि सेससीसु सलसलीय न सक्कइ,
कंचणगिरि कंधार भारि कमकमीय कसक्कइ॥

कंपीय किंनर कोड़ि पड़ीय, हरगण हड़हडीया,
संकिय सुरवर सग्गि सयल दाणव दड़वड़ीया।
अतिप्रलंब लहकइं प्रलंब चलविंध चिहुं दिसि,
संचरीया सामंत सीस सीकिरिहिं कसाकसि॥

जोईय भरह नरिंद कटक मूंछइ बल घल्लइं,
कुण बाहूबलि जे उ बरव मइं सिउं बल बुल्लइ।
जइ गिरि कंदरि विचरि वीर पइसंतु न छूटइ,
जइ थली जंगलि जाइ किम्हइ तु मरइ अखूटइ॥

गज साहणि संचरीय महुणर बेढिय पोयणपुर।
वाजीय बूंब न बहकीयउ बाहूबलि नरवर।
तसु मंतीसरि भरह राउ संभाळीउ साचुं,
ए अविमांसिउं कीउं काइं आज जि तइं काचुं॥

बंधउ सिउं नरवीर कांइं इम अंतर देखइ,
लहु बंधव नीय जीव जेम कहि कांइं न लेखइ।
तउ मनि चिंतइ राय किसिउं एय कोइ पराठीउ,
ओसरि उवनि वीर राउ रहीउ अवाठीउ॥

गय आगळीया गळगळंत दीजइं हय लास,
हुइं हसमस भरहराय केरा आवास।
एकि निरंतर वहइं नीर एकि ईंधण आणइं,
एक आळसिउं परतणुं पांगु आणिउं तृण ताणइं॥

एकि ऊतारा करीय तुरीय तलसारे बांधइं,
इकि भरडइं केकाण खाण इकि चारे रांधइं।
इकि झीलीय नय नीरि तीरि तेतीय बोलावइं,
एकि वारू असवार सार साहण वेलावइं॥

एकि आकुलीया तापि तरल तडि चडीय झंपावइं,
एकि गूडर साबाण सुहड़ चउरा दिवरावइं।
सारीय सामि सनामि आदिजिण पूज पयासइं,
कसतूरिय कुंकुम कपूरि चंदनि वनवासइं॥

पूज करीउ चक्ररयण राउ बइठउ भूं जाई,
वाजीय संख असंघ राउ आव्या सवि धाई।
मंडलवइ मउडुध भु (सु) हड़ जीमइं सामंतह,
सइं हत्थि दियइ तंबोल कयण कंकण झलकंतह॥

वस्तु


दूत चलीउ, दूत चलीउ, बाहुबलि पासि;
भणइ भूर नरवर निसुणि, भरह राउ पयसेव कीजइ।
भारिहिं भीम न कवणि रणि, एउ भिडंत भूय भारि भज्जइ।
जइ नवि मूरख एह तणीं, सिरवरि आण वहेसि।
सिउं परिकरिइं समर भरि, सहूइ सयरि सहेसि॥

राउ बुल्लइ, राउ बुल्लइ, सुणि न सुणि दूत;
ताय पाय पणमंतय, मुझ बंधव अति खरउ लज्जइ।
तु भरहेसर तसतणीय, कहि न कीम अम्हि सेव किज्जइ।
भारिइं भूयबलि जु न भिडउं, भुज भंजु भड़िवाउ।
तउ लज्जइ तिहूयण धणीं, सिरि रिसहेसर ताउ॥

ठवणि


चलीय दूत भरहेसरहं तेय वात जणावइ,
कोपानलि परजळीय वीर साहण पलणावइ।
लागी व लागि निनादि वादि आरति असवार,
बाहूबलि रणि रहिउ रोसि मांडिउ तिणि वार॥

ऊड कंडोरण रणंत सर वेसर फूटइं,
अंतराळि आवइं ई याण तीहं अंत अखूटइं।
राउत-राउति योध-योधि पायक-पायक्किहिं,
रहवर-रहवरि वीर-वीरि नायक-नायक्किइं॥

वेढिक विढइं विरामि सामि नामिहिं नरनारीया,
मारइं मुरडीय मूंछ मेच्छ मनि मच्छर भरीया।
ससइं हसइं धसमसइं वीरधड़ वड नरि नाचइं,
राखस री रा रव करंति रुहिरे सवि राचइं॥

चांपीय चुरइं नरकरोडि भूयबलि भय भिरडइं;
विण हथीयार कि वार एक दांतिहि दल करडइं।
चालइं चालि चम्माल चाल करमाल ति ताकइं,
पडइं चिघ झूझइं कबंध सिरि समहरि हाकइं॥

रुहिर रल्लि तहिं तरइं तुरंग गय गुडीय अमूंझइ,
राउत रण रसि रहित बुद्धि समरंगणि सूझइं।
पहिलइ दिणि इम झूझ हवुं सेनह मुखमंडण,
संध्या समइ ति वारणुं ए करइं भट विहुं रण॥

तउं तहिं वीजए दिणि सुविहाणि, ऊठीउ एक जि अनलवेगो,
सडवड समरहे वरसए बाणि, छयल सुत छलीयए छावडु ए।
अरीयण अंगमइ अंगोअंगि, राउतो रामति रणि रमइं ए,
लडसड लाडउ चडीय चउरंगि, आरेयणि सयंवर वरइं ए॥

छंद त्रोटक


वर वरइं सयंवर वीर, आरेणि साहस धीर।
मंडलीय मिलिया जान, हय हीस मंगल गान।
हय हीस मंगल गानि गाजीय, गयण गिरि गुह गुमगुमइं,
धमधमीय धायइं धारधा वलि, धीर वीर विहंडए,
सामंत समहरि, सभु न लहइं, मंडलीक न मंडए॥

धउल


मंडए माथए महीयलि राउ, गाढिम गय घड टोलवए,
पिडि पर परवत प्राय, भडधड नरवए नाचवइ ए।
काल कंकोलए करि करमाल, झाझए झुझिहिं झलहलइए,
भांजए भड घड जिम जम जाल, पंचायण गिरि गडगडए॥

त्रोटक


गडयडइं गजदलि सीहु, आरेणि अकल अवीह।
धसमसीय हयदल धाइं, भडहडइं भय भडिवाइ।
भडहडइं भय भडवाइ भुयबलि, भरीय हुइ जिम भींभरी,
तहिं चंद्रचूडह पुत्र परबलि, अपिउ नरवर नर नरतरि।
वसमतीय नंदण वीर विसमूं, सेल सर म दिखाडए,
रहु रहु रे हणि हणि भणंतू, अपड पायक पाडए॥

चिंतवईय सुहडह राउ, जो अई उपूटउं आउ।
हिव मरण एह जि सीम, रंजईअ चक्रवृत्ति जीम॥
रंजवईय चक्रवृति जीम इम, भणि चकु मुट्ठिहिं खडखली,
संचरिउ सूरउ सूरमंडलि, चकु पुहचइ तहिं वली।
खडखडीउ नंदण चंद्रचूडह, चंद्रमंडल मोहए,
झलहलीय झालि झमालि तुट्ठिहिं, चक्क तहिं तहिं रोहए॥

धउल


रोहीउ राउत जाइ पातालि, विज्जाहर विज्जाबलिहिं,
चक्क पहूचए पूठि तीणि तालि, बोलए बलवीय सहसजखो।
रे रे रहि रहि कुपीउ राउ, जित्थु जाइसि तित्थु मारिवु ए,
तिहूयणि कोइ न अछइ अपाय, जय जोखिम जीणइ जीवीइ ए॥

त्रोटक


जीविवा छंडीय मोह, मनि मरणि मेल्हीय थोह,
समरीय तु तीणि ठामि, इकु आदि जिणवर सामि।
इकु आदि जिणवर समरीय, वज्जपंजर अणसरइ,
नरनरीउ पाखलि फिरीउ तस सिरु, चक्क लेई संचरइ।
पयकमल पुज्जइ भरह भूपति, बाहुबलि बल खलभलइ,
चक्रपाणि चमकीय चींति कलयलि, कलह कारणि किलगिलइ॥

धउल


कलगिलइ चक्रधर सेन संग्रामि, बोलए कवण सु बाहुबले,
तउ पोयणपुर केरउ सामि, बरवहं दीसए दस गणु ए।
कवण सो चक्क रे कवण सो जाख, कवण सु कहीइ ए भरह राउ।
सेन संहारीय सोधउं साप, आज मल्हावउं रिसहवंसो॥

चउपई


चंद्रचूड विज्जाहर राउ, तिणि वातइं मनि विहीय विसाउ।
हा कुलमंडण हा कुलवीर, हा समरंगणि साहसधीर॥

कहीइ कहि नइं किसिउं घणुं, कलु न लजाविउं तइं आपणउं।
तइं पुण भरह भलाविउ आप, भलु भणाविउ तिहूयणि बापु॥

सु जि बोलइ बाहूबलि पासि, देव म दोहिलुंईं हीइ विमांसि।
कहि कुण ऊपरि कीजइ रोसु, एह जि दैवहं दीजइ दोसु॥

सामीय विसमु करम विपाउ, कोइ न छूटइ रंक न राउ।
कोइ न भांजइ लिहिया लीह, पामह अधिक न ओछा दीह॥

भंजउं भूयबलि भरह नरिंद, मइं सिउं रणि न रहइ सुरिंद।
इम भणि बरवीय बावन वीर, सेलइ समहरि साहस धीर॥

धसमस धीर धसइं धडहडइं, गाजइ गजदलि गिरि गडयडइं।
जसु भुइ भडहड हडइ भडक्क, दल दडवडइ जि चंड चडक्क॥

मारइ दारइ खल दल खणइ, हेड हणोहणि हयदल हणइ,
अनलवेग कुण कूखइं अछइ, इम पचारीय पाडइ पछइ॥

नरु निरुवइ नरनरइ निनादि, वीर विणासइ वादि विवादि।
तिन्नि मास एकल्लउ भिडइ, तउ पुण पूरउं चक्कह चडइ॥

चऊद कोड़ि विद्याधर सामि, तउ झूरइ रतनारी नामि।
दल दंदोलिउं दउढ वरीस, तउ चक्किइं तसु छेदीय सीस॥

रतनचूड विद्याधर धसइ, गंजइ गयघड हीयडइ हसइ।
पवनजय भड भरहु नरिंद, सु जि संहारीय हसइं सुरिंद॥

बहुलीक भरहेसरतणु, भड भांजणीय भिडीय घणु।
सुरसारि बाहूबलिजाउ, भडिउ तेण तहि फेडीय ठाउ॥

अमितकेत विद्याधर सार, जस पामीइ न पौरुष पार।
चल्लीय चक्रधर वाजइ अंगि, चूरिय चक्रिहिं चडिउ चउरंगि॥

समरबंध अनइ वीरह बंध, मिलीउ समहरि बिहुं सिउं बंध।
सात मास रहीया रण बेउ, गई गहगहीया अपछरा लेउ॥

सिरताली दुरीताली नामि, भिडइं महाभड बेउ संग्रामि।
आव्या बरवह बाथोबाथि, परभवि पुहता सरसा साथि॥

महेंद्रचूड रथचूड नरिंद, झूझइं हडहड हसइं सुरिंद।
हाकइं ताकइं तुलपइं तुलइं, आठि मासि जई जिमपुरि मिलइं॥

दंड लेई धसीउ युरदादि, भरतपूत नरनरइ निनादि।
गंजीउ बलि बाहूबलितणउ, वंस मल्हाविउ तीणि आपणु॥

सिंहरथ ऊठीउ हाकंत, अमितगति झंपिउ आवंत।
तिन्नि मास धड धूजिउं जास, भरह राउ मनि वसिउ वासु॥

अमिततेज प्रतपइ तहि तेजिं, सिउं सारंगिइं मिलिउ हेजि।
धाइं धीर हणइं बे बाणि, एक मासि नीवड़्या नीयाणि॥

कुंडरीक भरहेसरजाउ, जस भड भडत न पाछउ पाउ।
द्रठडीय दलि बाहूबलि राय, तउ पययंकइ प्रणमीय ताय॥

सूरिजसोम समर हाकंत, मिलिया तालि तोमर ताकंत।
पांच वरिस भर भेलीय घाइ, नीय नीय ठामि लिवारिआ राइ॥

इकि चूरइं इकि चंपइं पाय, एकि डारइं एकि मारइं घाइ।
झलझलंत झूझइ सेयंस, धनु धनु रिसहेसरनुं वंस॥

सकमारी भरहेसरजाउ, रण रसि रोपइ पहिलउ पाउ।
गिणइं न गांठइ गजदल हणइ, रणरसि धीर धणावइ धणइ॥

वीस कोडि विद्याधर मिली, ऊठिउ सुगति नाम किलिगिली।
सिवनंदनि सिउं मिलीउ तालि, बासठि दिवसि बिहुं जम जालि॥

कोपि चडिउ चल्लिउ चक्रपाणि, मारउं वयरी बाणविनाणि।
मंडी रहिउ बाहूबलि राउ, भंजउं भणइ भरह भडिवाउ॥

बिहुं दलि वाजी रणि काहली, खलदल खोणि खे खलभली।
धूजइं धसकीय धड थरहरइं, वीर वीर सिउं सयंवर वरइं॥

ऊडीय खेह न सूझइ सूर, नवि जाणीय सवार असूर।
पडइं सुहड धड धायइं धसी, हणइं हणोहणि हाकइं हसी॥

गडडइं गयघड ढींचा ढलइं, सूनासमा तुरंग मल तुलइं।
वाजइं धणुही तणा धोकार, भाजइं भिड़त न भेडीगार॥

वहइं रुहिर-नइ सिरवर तरइं, री-रीयाट रणि राखस करइं।
हयदल हाकइं भरह नरिंद, तु साहसु लहइ सग्गि सुरिंद॥

भरहजाउ सरभु संग्रामि, गांजइ गजदल आगलि सामि।
तेर दिवस भड़ पड़ीउ घाइ, धूणी सीस बाहुबलि राइ॥

तीहं प्रति जंपइ सुरवर सार, देखी एवडु भड़संहार।
कांइं मरावउ तम्हि इम जीव, पडसिउ नरकि करंता रीव॥

गज ऊतारीय बंधव बेउ, मानिउं वयण सुरिंदह तेउ।
पइसइं मालाखाडइ बीर, गिरिवर-पाहिइं सबल शरीर॥

वचनझूझि भड़ भरहु न जिणइ, दृष्टिझूझि हारिउं कुणअणइ।
दंडिझूझि झड झंपीय पडइ, बाहु पासि पडिउ तड़फड़इ॥

गूडासमउ धरणि-मझारि, गिउ बाहूबलि मुष्टिप्रहारि।
भरह सबल तइं तीणइं घाइ, कंठसमासण भूमिहि जाइ॥

कुपीउ भरह छ-खंडह धणी, चक्र पठावइ भाई भणी।
पाखलि फिरी सु वलीउं जाम, करि बाहूबलि धरिउं ताम॥

बोलइ बाहुबलि बलवंत, लोहखंडि तउं गरवीउं हंत।
चक्रसरीसउ चूनउ करउं, सयलहं गोत्रह कुल संहरउं॥

तु भरहेसर चिंतइ चीति, मइं पुण लोपीय भाई-रीति।
जाणउं चक्र न गोत्री हणइ, माम महारी हिव कुण गिणइ॥

तु बोलइ बाहुबलि राउ, भाईय ! मनि म म धरसि विसाउ।
तइं जीतइं मइं हारउं भाइ, अम्ह शरण रिसहेसर-पाय॥

ठवणि


तउ तिहिं ए चिंतइ राउ, चडिउ संवेगिइं बाहुबले।
दूहविउ ए मइं वडु भाय, अविमांसिइं अविवेकवंति॥

धिग धिग ! ए एय संसार, धिग धिग ! राणिम राजरिद्दि।
एवडु ए जीवसंहार, कीधउ कुण विरोधवसि ?॥

कीजइ ए कहि कुण काजि, जउ पुण बंधव आवरइं ए।
काज न ए ईणइं राजि, घरि पुरि नयरि न मंदिरिहिं॥

सिरिवरि ए लोच करेइ, कासगि रहीउ बाहुबले।
अंसूउ ए अंखि भरेउ, तस पय पणमए भरह भडो॥

बांधव ए कांइ न बोल, ए अविमांसिउं मइं कीउं ए।
मेल्हिम ए भाई निटोल, ईणि भवि हुं हिव एकलु ए॥

कीजइ ए आजु पसाउ, छंडि न छंडि न छयल छलो।
हीयडइ ए म धरि विसाउ, भाई य अम्हे विरांसीया ए॥

मानई ए नवि मुनिराउ, मौन न मेल्हइ मन्नवीय।
मुक्कई ए नहु नीय माण, वरस दिवस निरसण रहीय॥

बंभीउ ए सुंदरि बेउ, आवीय बंधव बूझवइं ए।
ऊतरि ए माणगयंद, तु केवलिसिरि अणसरइ ए॥

ऊपनूं ए केवल नाण, तु विहरइ रिसहेस सिउं।
आवीउ ए भरह नरिंद, सिउं परगहि अवझापुरी ए॥

हरिखीया ए हीइ सुरिंद, आपण पइं उच्छव करइं ए।
वाजई ए ताल कंसाल, पडह पखाउज गमगमइं ए॥

आवई ए आयुधसाल, चक्क रयण तउ रंगभरे।
संख न ए जस केकाण, गयघड रहवर राणिमहं॥

दस दिसि ए वरतइं आण, भड भरहेसर गहगहइ ए।
‘रायह’ ए ‘गच्छ’ सिणगार, ‘वयरसेण सूरि’ पाटधरो॥

गुणगणहं ए तणु भंडार, ‘सालिभद्र सूरि’ जाणीइ ए।
कीधउं ए तीणि चरितु, भरहेनरेसर राउ छंदि ए॥

जो पढइ ए वसह वदीत, सो नरो नितु नव निहि लहइ ए।
संवत ए ‘वार’ ‘कएताल’ फागुण पंचमिइं एउ कीउ ए॥

स्रोत
  • पोथी : रास और रासान्वयी काव्य ,
  • सिरजक : शालिभद्र सूरि ,
  • संपादक : डॉ. दशरथ ओझा, डॉ. दशरथ शर्मा ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै