पात्र
मल्लिनाथनाथ (मालाजी) – मेहवै रा रावळ
कुम्भौ – मालाजी रौ पोतौ
जगमाल – मालाजी रौ पाटवी कंवर
धड़सी – जगमाल रौ मामौ
जैतमल – अेक सामंत
मांडण – ऊमरकोट रौ सोढौ राजा
रायसीं – मांडण रौ कंवर
कंवराणी – मांडण री बेटी, कुम्भै री बहू।
हेमौ – माला रौ विद्रोही सिरदार, धाड़ेती
(धाड़ायती, चारण, सामंत, सवार, रूपौ मैणौ वगैरा)
समै – वि.स. 1400 रै अेड़ै-नेड़ै।
पैलौ-दरसाव
(मेहवा नगर में मल्लिनाथनाथ रौ महल। अेक पिलंग पर मल्लिनाथनाथ तकियै रै साहरै बैठा है। मूंडा माथै धौळी दाडी। ना’र जैड़ौ रौबीलौ चैरौ पण बीमारी रै कारण कीं मुरझायोड़ौ। पिलंग रै कनै अेक पीकदानी पड़ी है। रै रै नै खांसता जावै। सामनै भाई भतीजा सामंत सिरदार बैठा है। पिलंग रै कनै सिराणै कानी जगमाल नै पगांतिया कानी कुंभौ बैठौ है।)
मल्लिनाथ – रावतां! म्हारा दिन हमें नैड़ा आया। अवस्था नै रोग म्हारौ सरीर तोड़ चुका है। (सांस भरीज जावै। अटकता-अटकता नै खांसता-खांसता बोलै।) अठीनै राजरी जौ हालत अेकलै हेमै बिगाड़ राखी है, वा थां सूं छानी नहीं। राज री रिच्छा रौ कीं उपाव सोचौ।
चारण – ठाकरां! अेक तौ औ राव मल्लिनाथनाथ है जका बाप रौ खोसीजियोड़ौ राज पाछौ लियौ नै मेहवा में आपरी दवाई फेरी, नै अेक आप सिरदार हौ जकां रै रैतां थांरौ ईज अेक विद्रोही चाकर हेमौ सारै राज में ऊधम मचा राखियौ है नै आप लोग वींनै बस में नहीं कर सकौ! इण राज री रिच्छा रै साथै आपरी मान-मरजाद रौ सवाल भी जुड़ियोड़ौ है।
“सीह न बाजौ ठाकरां, दीन गुजारौ दीह।
हाथळ पाड़ै हाथियां, सो भड़ वाजै सीह॥”
धड़सी – बारठ जी! हेमा नै पकड़णरी कोसिस करण में तौ म्हांई कसर राखी नीं पण वो तौ म्हां पूगां जितै गांवां नै लूट खसोट नै घुंघरोट रा भाकरां में जाय लुकै। वां भाकरां मऊं उणनै काडणौ सैल काम नी है। कंवर जगमालजी नै म्हैं केई बार लारौ कर देखियौ पण की फळ नीं निकळियौ।
जगमाल – म्हैं अेक कानीं सूं भाकरां में लारौ करता घुसां तौ वो दूजी कानीं निकळै नै उठीरा गांव लूट लै। म्हारै कनै इत्ता रजपूत कठै?
जैतमल – हेमा जैड़ा रजपूत नै अेक घोड़ा री खातर नाराज करनै जगमालजी समझदारी रौ काम नीं कियौ।
मल्लिनाथ – भाई जैतमल! हमैं बीती बात रौ पछतावो करण सूं कीं सार निकळै नहीं। हमैं तौ हेमौ आपांरौ चाकर नीं, दुस्मण है। उण नै किण तरै ताबै करणौ, वा बात सोचौ। (खांसै)
चारण – ठाकरां! आज हेमा रै डर सूं गांव रा गांव उजड़ ग्या है। 140 गांवां में आज उणरी धाक सूं धूंवौ तक नीं निकळै। सारी रइया भाग नै जैसलमेर जाय बसी है। राजपूत री तलवार रै रैतां राज उजड़ जावै तौ उण रजपूती में धूड़ है!
“खाटी कुळ री खोवणा, नेपै घर घर नींद।
रसा कंवारी रावतां, बरती को ही बींद॥”
जैतमल – बारठजी! आकरा घणा बोलौ। (गुस्सै व्है)
धड़सी – (हंसनै) कैणौ सोरौ है, करणौ दोरौ।
मल्लिनाथ – ठाकरां! बारठजी झूठ तौ नीं कै रैया है? नाराज व्हैणौ धरम नहीं। म्हनै डर है कै हाल तौ हेमौ कांकड़ कनला गांवां में ईज लूट पाट कर रैयौ है पण म्हारै आंख मींचियां पछै तौ वो सीधौ मेहवा माथै आवैला। मेहवा री रिच्छा रौ जिम्मौ कुण राजपूत लेवण नै त्यार है? जो हुवै, वो औ बीड़ौ उठाय लै। (अेक चौकी माथै पड़ी तासळी उठाय नै बारठजी नै देवै। उण में पान रौ बीड़ौ पड़ियौ है। बारठजी बीड़ौ सभा रै बीच में धरै। सारा जणा चुप-चाप देखै।)
मल्लिनाथ – है कोई राजपूत जकौ हेमा रौ माथौ बाढ लावै? (सब चुप)
मल्लिनाथ – (फीकी हंसी हंसनै) कोई नहीं! कोई नहीं! (गंभीर हूय’र) हे भगवान! औ दिन भी म्हनै देखणौ हौ! अब तौ झटपट बुलावौ, भेज, म्हारा नाथ!
कूंभौ – सिरदारां! बूढ़ा बडेरां री इण सभा में म्हैं बाळक पंचायत करणी नहीं चावतौ हौ जिण सूं चुप बैठौ हौ पण देखूं हूं कै आज माथौ देण री बेळा राजपूत भी बिचार करणनै बैठ गया है! औ कंईं रासौ है, ठाकरां? बोलौ कनीं? खैड़ रा घोड़ा, रजपूती री मरजाद नै रावळजी रौ हुकम है! पछै जिझक किण बात री है?
सामंत – कुंभाजी! आप हाल तांई नानाणा में मींढां री लड़ायां ईज देखी है। घुंघरोट रा भाकर नै हेमा रौ सामनौ करणौ कोई कबड्डी रौ खेल कोनीं है।
चारण – सही फरमावौ सिरदारां! जाण बूझनै सिंघ री मांद में पग धरणौ रजपूतां रौ काम नहीं है, नादानां रौ काम है।
“सादूळौ निबळौ हुवौ, टूट गया नख दंत।
हुंआ हुंआ जंबक रड़ै, फैल करै मैमंत॥”
कुंभौ – बारठजी! अैड़ी बाणी मत काढौ। सिंघ बूढो हुवौ तौ उणरौ सावक हाल जीवतौ है। इण मैमंतै हेमै रा दांत उपाड़ण री हीमत उण में है।
सामंत – तौ जरै उठा लिरावौ बीड़ौ। आप भी तौ पाटवी कंवरां रा बेटा हौ!
कुंभौ – (उभौ हूय’र) आपरी आ’ई मरजी है तौ आ’ई सही। औ बीड़ौ हूं उठाऊं हूं। (बीड़ौ उठावै) बाबाजी! इत्ता दिन तौ हेमौ बिगाड़ कियौ सो कियौ, पण हमैं अगर वो बिगाड़ करैला तौ हूं उणरौ इग्यारै गुणौ पाछौ भरूंला।
मल्लिनाथ – (बैठा हूय’र) छबास कुंभा, छबास! (आंख्यां में तेज चमकण लागै) म्हनै पूरौ भरोसौ हौ कै हेमा माथै बीड़ौ थूं ईज उठावैला। बींजा, म्हारी तलवार ला (बींजौ अेक थाळ में तलवार नै कटारी लावै। रावळजी आपरै हाथ सूं कुंभा री कमर में तलवार बांध नै कटारी उणनै देवै। कुंभौ घुटणा टेक नै कटारी लेवै।)
चारण – धिन है, कुंभाजी थांनै! थां रजपूती री आन राखली।
“घोड़ां घर ढाळां पटळ, भालां थंभ बणाय।
जे ठाकर भोगै जमीं, और किसौ अपणाय॥”
जैतमल – (कनै बैठा सामंत नै) टाबरपणा रा जोस में बीड़ौ उठायौ तौ है पण..
सामंत – पण कंईं, जैतमलजी! आ मालाजी री कटारी कुंभाजी नानैणै रा मींढा माथै चलाई।
धड़सी – टाबर है, राजी हूण दो यां नै ई।
कुंभो – रावतां! आज आप म्हारी हंसी उडा रैया हौ पण याद राखौ कै वीरता सरीर रौ मोटापौ देखनै वास को करै नीं।
“आव न देखौ वीर री, परखौ मन रौ चाव।
धाव करै मैमंत सिर, सीहण जायौ साव॥”
(पड़दौ पड़ै)
दूजौ-दरसाव
(घुंघरोट रा भाकरां में हेमौ नै उणरा साथी बैठा है। भाला ऊभा करियोड़ा है नै माथै ढाळां टंकियोड़ी है। हेमौ अेक मोटा टोळ माथै बैठौ है नै सामनै उणरा धाड़ायती बैठा चिलमां पी रैया है।)
पैलौ धाड़ायती – औ कुंभौ तौ माटौ जबरौ निकळियौ।
दूजौ धाड़ायती – हां, देखौ नीं इत्ता दिन व्है ग्या भाकरां में लुकता फिरां हां। बारै निकळणौ ई मुस्किल कर दियौ है।
तीजौ धाड़ायती – हेमाजी! यूं कित्ता’क दिन चालैला? बैठा-बैठा म्हारा तौ हाथ पग ई अकड़ीजण लाग ग्या! (आळस मोड़ै)
हेमौ – भाई! तौ म्हारा हाथ कींयां को कुळै नीं पण करां तौ कंईं? कुंभौ तौ भाकर रै बारै निकळण रा सारा मारग रोक राख्या है।
पैलौ धाड़ायती – हां, सा। भाकर बारला गांव-गांव में चौकी बैठाय दी है नै गांव वाळां में खुद घूम-घूम’र धाड़ायत्यां रौ सामणौ करणै रौ जोस भर दियौ है। गांव-गांव में हथियार बांट दिया है।
दूजौ धाड़ायती – हां, कै तौ आपां नै देखतां ई गांववाळा जीव लेयनै भाग जावता हा नै कै हमै बेटा भाला नै तीर-कबाण लेयनै सामणौ करै।
तीजौ धाड़ायती – अरै गांव वाळां नै तौ फेर ई को धारां नीं पण कुंभौ नै उणरा चाळी-पच्चा रजपूत तौ पागड़ां सूं पग ई नीचौ को धरै नीं। समचौ मिळतां ई बार’र चाढै।
हेमौ – कैवणौ पड़ैला कै रंग है कुंभा नै! हाल कंईं तौ उमर है! सिरफ 16 बरस रौ है पण धिन है उण सोळंकण री कूख नै जिण अैड़ौ रतन पैदा कियौ। जगमाल रा मरमठ तौ म्हैं गाळ दिया पण कुंभा री बुद्धी रै आगै तौ माथौ नवावणौ ईज पड़ै।
तीजौ धाड़ायती – पण हमैं करणौ कंईं? वा सोचौ। कोई मारग बैता बाणियां नै या जान-बरात नै लूट्यां सूं तौ आपां रौ काम चालै नहीं।
हेमौ – वा तो म्हैं करणी भी नीं चावूं। म्हैं तौ बाट आ’ देखूं हूं कै कद कुंभौ मेहवा सूं बारै जावै नै कदै आपां मेहवा माथै धावौ बोलां।
दूजौ धाड़ायती – मालाजी नै गुजरियां नै आज दो बरस तौ हूगा, पण अैड़ौ मौकौ ई नीं आयौ। वो तौ घोड़ा कसियां ईज ऊभौ रै’।
हेमौ – (मारग कानीं देखनै) औ कुण? रूपौ मैणौ आवै दीसै है, देखां कंई समचार लायौ है?
(रूपौ आय नै मुजरौ करै)
हेमौ – कंईं समचार लायौ, रूपा?
रूपौ – समचार तौ सखरा ईज लायौ हूं, धणियां! ऊमरकोट रा धणी सोढा राव मांडण आपरी बेटी रौ नारेळ कुंभा वास्तै मेहवी भेजियौ सो कुंभै सगपण मंजूर कियौ।
हेमौ – (खुस व्हैनै) ब्याव कद रौ तै रैयौ?
रूपो – पैलां तौ कुंभै कैवायौ कै हमार ब्याव नीं करूं क्यूं कै म्हैं मेहवौ छोडनै बारै जाऊं नहीं पण जद रावजी कैवायौ कै पचास कोस म्हे आजावां नै पचास कोस आप आजावौ तौ कुंभा जी मान ग्या सो अबै ब्याव हुवण में जेज नीं।
हेमौ – तौ रूपा! थूं पाछौ जा अर कुंभा रै मेहवा सूं निकळतां ई म्हनै समचौ दै (धाड़ायत्यां नै)। थां लोग भी सब त्यार रैवौ दोयां-च्यारां मेहवा माथै धावौ बोलणौ है।
धाड़ायती – (सारा ई ऊभा व्हैर) जो हुकम।
(पड़दौ पड़ै)
तीजौ-दरसाव
(धोरां में बस्यौड़ै अेक गांव रौ वेरौ। बड़ला री छायां में अेक पींजस पड़ियौ है। आघा सूं ढोल अर थाळी री अवाज रै साथै लुगायां रै गीत-केसरियौ बनड़ौ जीतियौ– री मीठी-मीठी आवाज आ रैयी है। सामणै जगमाल, धड़सी, राव मांडण अर उण रौ बेटौ रायसीं बैठा है। दारू री मनवारां चाल रैयी है। संख री आवाज रै साथै मसाल लियां खवास आवै।)
खवास – घणी खम्मा अन्नदाता! कंवरजी परणीज उतरिया है।
जगमाल – घणी खुसी हुयी। (कनै थाळ में पड़ियौ सिरोपाव खवास नै देवै। अेक चाकर थाळ मांयलौ पेचौ खवासजी रै माथै बांधै। खवास जावै)।
धड़सीजी – चालौ हमैं आपां भी चालण री त्यारी करां।
मांडण – यूं कंईं ताकीद करावौ हुकम? थोड़ा तौ बिराजौ। सीखां तो हुवण दिरावौ।
धड़सी – रावजी! ठैरां जैड़ी बखत नीं है! म्हां अठै हां नै मेहवौ सूनौ है। पूरौ छाती माथै हाथ है!
मांडण – तौ कंवरजी नै तौ रवाना कर ईज रया हां। पींजस त्यार है। आप सिरदार तौ थोड़ा बिराजौ। ऊमकोट पधारौ। अठै जंगळ में आप री कीं मान मनवार भी नीं कर सकियां हां।
जगमाल – रजपूतां रा ब्याव तौ यूं ईज है रावजी! बखत फोरौ है जिण सूं माफी चावां हां। (ऊभा हुवै अर जावै। सिरफ रायसीं रैह जावै)
मांडण – रायसीं! थूं बींद-बींदणी रै बिदाई रौ सराजाम कर। म्हैं रावळजी नै डायजौ सम्हळाय दूं। (जावै)
रायसीं – आप पधारौ। अठै रौ सारौ इंतजाम म्हैं कर लूं ला। (ढोल थाळी री अवाज रै साथै बींद-बींदणी अर लुगायां मंच पर आवै मोरियौ गावणौ मांडै। बींदणी मां बैनां वगैरा सूं मिळ नै पींजस में जाय बैठै। कुंभा नै रायसीं कैवै। कनै चारण भी ऊभौ है।)
रायसीं – बैनोई जी! आपरी कीं खातर नीं कर सकिया। कदैई बखत काड’र ऊमरकोट पधारजौ।
कुंभौ – आप म्हनै बैन परणाय’र म्हारी इज्जत बदाई, आ’ कीं कम खातर है? हमै म्हांनै जल्दी सीख दिरावौ। (सामनै सवार आवतौ देख’र) औ कुंण? कोई सवार आयौ दीसै है। कीं दाळ में काळौ है। (सवार आय’र मुजरौ करै।)
सवार – घणी खम्मा अन्नदाता।
कुंभौ – कंईं समंचार, है?
सवार – हुकम! हेमौ मेहवै कानीं कूच करण रै इरादै सूं भाकरां रै बारै आयौ है।
कुंभौ – (उतावळौ हूय’र) कठैक तक पूगौ है?
सवार – हाल घाटां रै कनै ई है। अठां सूं कोई 39-40 कोस रै आंतरै।
कुंभौ – म्हारौ घोड़ौ लाव! रायसीं जी! बस, हमै म्हैं सीख करूं।
रायसीं – म्हैं भी आप रै सागै चालूंला। अठीरा मारगां रौ म्हनै पूरौ ध्यान है। पण बैनोईजी! अेक वार लाडी रौ मूंडौ तौ देख लिरावौ! (कुंभौ तलवार सूं पीजस रौ पड़दौ आघौ करनै बींदणी रौ मूंडौ देखै।)
कुंभौ – वा! वा! कंईं रूप है! जाणै चंदरमा ईं धरती पर उतर आयौ है। घणौ सुख हूसी। सोढण! आज सुहाग रात री बेळा म्हैं सैजां रौ सुख छोड’र रण में जाऊं हूं। मां जलम-भोम हेलौ मार्यौ है। उण नै अणसुणौ कीकर कर दूं? थूं राजपूत री बेटी है। म्हारा ईं जुलम नै काठी छाती कर सैह लीजे।
अेक सहेली – कंवरजी! आज री रात तौ ठैर जावता। (बींदणी रै गळै लाग’र)
“छूटता हथळेव रै, धव चढियौ लै खाग।
हाय! दुहागण करगई, हेली! रात सुहाग॥” (सिसकै)
चारण – आ रोवण री बखत नीं है रावताणियां!
खाग-धणी जूंझार धव, नहं पामै सब कोय।
सदा दुहागण, सुहड़-धण, सदा सुहागण होय॥
कुंभौ – परजा रौ दुख मेटणौ राजा रौ पैलौ धरम है। म्हैं रुक नीं सकूं। परजा री तबाही करण वाळै हेमा रौ माथौ बाढ’र वो ई थांनै मूंडौ दिखाई में दूंला। थे दुख मत करजौ।
कंवराणी – (बारै आय’र पगां री धूड़ माथै लगावै) दुख कैंरौ नाथ? रावतां री बेटियां बजर रौ काळजौ लै नै जलमिया करै। (डबडबाई आंख्यां सूं) म्हनै आप जैड़ौ जूंझार धणी मिळियौ, म्हारा मोटा भाग है। हेमा रौ लोही ई हमै म्हारी मांग रौ सिंदूर बणैला। आप सिधावौ। भगवान आप नै फतैह देवै।
(कुंभौ नै रायसीं जावै। कंवराणी मां सूं चिपट नै सिसकण लागै।)
चारण –
“सापंण जाया चीटला, सीहण जाया साव।
राणी जाया नहं रुकै, कुळौवाट सुभाव॥”
(पड़दौ पड़ै)
चौथौ-दरसाव
(घुंघरोट रै भाकरां री अेक घाटी में हेमौ नै उणरा तीन साथी। परभात री बेळा। च्यारूं जणा सोगरा, गुळ नै कांदां रौ सिरावण कर रैया है। अेकण कानीं खीरा चमक रैया है ज्यां माथै लोग सोगरा सेकिया है। अेक खेजड़ी पर पाणी री दीवड़ी लटकै है। ढाल तलवार, तीर कबाण नै भाला ठिकाणैसर पड़िया है।)
हेमौ – झटपट सदियै-सदियै निकळ चाल अठा सूं। आज सिंझ्या पैला मेहवै पूगणौ है।
पैलौ धाड़ायती – हां, हेमाजी! जेझ की नै कुंभौ पूगौ, आ’ नक्की समझजौ।
दूजौ धाड़ायती – हाल कालै तौ परणियौ है, अेक रात तौ सासरै ठैरैला ईज। राव मांडण कुंभा नै बैगै ऊं बेगौ छोडैला तौ आज रात रा सीखां दूजी दिन नै कालै परभात रा रवानै करसी।
हेमौ – आपां नै इण भरोसै नीं बैठौ रैहणौ है। कुंभौ परणीजण नै तौ गयौ है पण मन वींरौ मेहवा में फसियोड़ौ है। वींनै ठा’ पड़गी कै आपां भाकर छोड नै बारै आयगा हां तौ वो हथळेवौ छोड नै भागै जैड़ौ जूझार है।
पैलो धाड़ायती – आ’ बात खरी। वो बाप दांई बेपरवा नै आळसी कौ है नीं।
(हेमौ ऊठ नै दीवड़ी सूं पाणी पीवै। इत्तै में आधी थकी धूड़ उडती देख नै वींरा तीनूं साथी ऊभा हुजावै।)
दूजौ धाड़ायती – (मारग कानीं देख नै) साथ आयौ! हुसियार!
(च्यारूं जणा झट-पट ढाल, तलवार, तीर, कबाण वगैरा लेनै त्यार व्है जावै। कुंभौ नै रायसीं घोड़ां माथै आवै।)
हेमौ – वा! कुंभा वा! थूं म्हारौ लारौ तौ कियौ। पण कुंभा दूजां नै बीच में न्हाकण सूं कंईं मतलब? आपां दोनूं ई लड़ां।
(कुम्भौ घोड़ा सूं उतर जावै नै हेमा कानीं बदै।)
रायसीं – कुंभाजी! आप क्यूं तकलीफ करौ? म्हैं हमार म्हारा तीरां सूं यां सारां नै कबूतर व्है ज्यूं बींध काडूं। (आडौ फिरै)
कुंभौ – थांनै रावळ मल्लिनाथनाथजी री आण है जे म्हनै रोकियौ तौ। (आगै बद जावै)
हेमौ – (जवारड़ा करनै) कंवरजी! थे छोटा हौ, इण वास्तै पैला थे ईज वार करौ। थांरा सरीर में हाल लो’ लागौ नीं है।
कुंभा – राजपूत रौ कंईं छोटौ नै कंईं मोटौ? उमर में भलैई थां बडा हौ पण पग में थां सूं म्है मोटौ हूं। थां म्हारौ अन्न खायोड़ा हौ, म्हारा चाकर रैयौड़ा हौ जिण सूं बडो म्हैं हूं। थे करौ वार।
हेमौ – तौ जरैं सम्हळौ परा (उचक नै वार करै। कुम्भौ ढाल पर वार झेलै। थोड़ी देर दोन्यूं लड़ै नै आघा व्है जावै। हेमौ पाछौ झपट नै आवै नै अेक हाथ अैड़ौ मारै कै कुंभा रौ माथौ डावा कान कना सूं फाट जावै। कुंभौ तुरंत उचक नै जवाबी वार करै जिण सूं हेमा रौ खंवौ कट जावै। हेमौ ढेर हुजावै नै कुंभौ उण रा सरीर रै कनै पड़तौ ई उण रा काळजा में मल्लिनाथनाथजी री दियोड़ी कटारी भौंक देवै।)
कुंभौ – रायसीं! मेहवै जाय म्हारां ठाकरां नै कैयजौ कै कुंभौ कटारी नींढा माथै नहीं हेमा रै काळजा में चलाय’र मरियौ; अर हेमा रौ माथौ लेजाय’र थांरी बैन नै दीजौ कै आ’ थांरी मूंडौ देखाई भेजी है।
(मर जावै। रोसनी फोरी पड़ जावै। तीनूं धाड़ायती नै रायसीं दोनां री ल्हासां माथै वांरी तलवार धर नै वांरै कनै गरदन झुका नै ऊभ जावै। पड़दा रै लारा सूं आवाज आवै।)
चारण – (मांय सूं)–
“घणी बखांणू घाव, कुंभा थूं भागै कमळ।
हेमौ जिण हाथां, भुई पड़ियौ भख छैजही॥”
(पड़दौ पड़ै)