पात्र
जगदेव पंवार – धारानगरी रै राजा उदयादित्त रौ थाटवी कंवर
वीरमती – जगदेव री जोड़ायत नै कूंकटोडा रै राजा रामजी री बेटी
डूंगरसीं – पाटण नगरी रौ कोटवाळ
लालराज – डूंगरसीं रौ बेटौ– नसाबाज अर विभचारी
सिधराज जैसिंघ – पाटण रौ राजा
जामोती – पाटण री अेक मसूर वेस्या
राधा (छोरी) – जांमोती री डावड़ी
भीमजी – पाटण रौ सिपाही
पैलौ-दरसाव
(पाटण नगरी रै सैंसालिंग तळाव री पाळ माथै अेक रूंखड़ै रै नीचै जगदेव पंवार नै उणरी जोड़ायत वीरमती दोनूं जळपान करै। डावै पसवाड़ै घोड़ा बंधिया है। परभात-बेळा री ठंडी लै’र में सै’र री पिणहार्यां जळ भरण सारू आवती-जावती दीखै है।)
वीरमती – नाथ! तळाव तौ बडौ सुहावणौ है, देखौ तौ पंछीड़ा कितरी फू’टरी केळां करै है।
जगदेव – बा’ली! दिनड़ां री केळां है, कुण नीं करै? चानणौ करण रा दिन चार है। हूं म्हारी भुजा रै आपांण सूं नवौ रिजक खाट नै आंपणी केळ कुंपळ नै घणी सरसाऊंला।
वीरमती – नाथ! औ तौ आपरौ म्हनै धीजौ है। आवती बखत तीन महीनां रौ मारग छोड’र आठ दिन रौ अबखौ पथ लेणौ अर विकराळ बाघण रौ खातमौ अेकण तीर सूं करतां देख नै म्हारौ हियौ पतीजियौ कै सुणता जैड़ा ही सांम हौ।
जगदेव – बा’ली वीरमती! मनड़ै री मुळकवी बातां अमरबेलड़ी जैड़ी अंतस में मीठी लागै पण सांयतेक जे’ज करजै। जितरै हूं स्हैर में जायनै कंदोई सूं आंपणै खाणै रौ सामान लि’आऊं। नै’चै सूं दिन रा सिधराज जैसिंघ सूं मुजरौ करसां। जोगौ अर पारखू सिरदार सुणीजै है। मनभाई तौ अठै ई महीनौ मंडाय देसां नींतर मुलक आगै है ई।
वीरमती – घणी आछी, नाथ! बैगा पधारजौ। म्हारौ अेकली रौ जीव को लागै नीं।
जगदेव – भोळी, इण घड़ी आयौ देख।
(जगदेव घोड़ै सवार होय नगरी कानीं जावै नै वीरमती आपरै साजन नै निरखै। राधा आवै)
राधा – (मन में) ओ हौ! आ’ अैड़ी रूपाळी नार अठै कुण आई? साख्यात इंदर री परी कै पूनम रौ चांद है! जे आ म्हारै लपेटै में झिल जावै तौ लालराज जैड़ौ रसियौ म्हनै धन सूं न्याल कर देवै।
(नैड़ी आय नै परगट में) हां ओ बाई! थे कठारा हौ ओ? अठै अेकला कीकर बैठा हौ? दीसौ तौ भलै घर रा हौ।
वीरमती – बाई, म्हे तौ बै’ता बटाऊ हां। म्हारा घरधणी स्हैर में गया है। हमें आवता हुवैला। हूं अेकली कोनीं।
राधा – तौ ई आपरी गांम नांम तौ कीं हुवैला? कीं बतावौ ती सही।
वीरमती – धारानगरी सुणी है? उठै रा राजा उदियादित्त रा कंवर म्हारा धणी है। नांम म्हारौ वीरमती है। खावण कमावण नै नीसरिया हां। रजपूत रा बेटां हां, अंजळ ले जासी जठैई जावणौ है। थे कुण जात रा हौ, बाई?
राधा – हूं तौ अठारै मा’जनां री छोकरी हूं। मिणियारा बजार में म्हारौ घर है। लो बाई, जाऊं। मोड़ौ घणौ हुवौ। घर रा गाळियां बोल’ई कठैई।
वीरमती – वा बा, जावौ। म्हैं ई थोड़ी आडी हु जाऊं। काठी थाकोड़ी हूं।
(वीरमती रक्खी रौ सा’रौ दे नै सू जावै। थोड़ी दूर माथै छोरी सिणकारी देयनै जांमोती वेस्या नै बुलावै)
जांमोती – कंईं बात है, राधा?
राधा – अरे बात कंईं है, बधाई दो, बधाई!
जांमोती – अरै मुड़दी! कीं बोल तौ सरी। कैणरी बधाई दूं थनै?
राधा – (वीरमती नै बताय नै) वा’ देखौ वा..’! कंवरजी नै राजी करणा है तौ इणनै फांसौ। कित्ता दिन व्हैग्या वा’ नै नवी बुलबुल मांगतां।
जांमोती – राधा! अैड़ी बात है जद तौ न्याल हौ जावां, पण कीं बता तौ सरी कै है कुण? नै इणारै साथै कुण है?
राधा – धारा नगरी री कंवराणी है। इणरौ धणी बाजार गयोड़ौ है। वो आवै जिण रै पैलां इणनै.. हां... (चुटकी बजाय नै उडावण रौ इसारौ करै)
जांमोती – ठीक! थूं रथ जुता। हमै आ म्हारा फन्दा सूं निकळ जावै जकौ तौ म्हैंई कच्ची गोळियां कोनी खेली है।
(राधा अेक कानीं जावै नै जांमोती वीरमती रै कनै जाय नै बोलै)
जांमोती – बीनणी हूयगा कंईं बा? (वीरमती हड़बड़ाय नै बैठी हौ जावै)
वीरमती – माफ कराइजौ, आपनै ओळखिया कोनी (अचंभै सुं देखै)
जांमोती – कठा सूं ओळखौ बा? जगदेव रै परणीजियां पछै म्हैं तौ कदैई पी’र आईज्यौ कोनी। म्हैं जगदेव री भूवा हूं (वीरमती ऊठ नै पगां लागै नै घूंघटौ काडै) चूड़ौ चूनड़ी अमर हौ बा’ला। हमार जगदेव मिलण नै आयौ जद म्हनै ठा’ पड़ी कै थै ई आया हौ। जरैं म्हैं उण सूं घणी नाराज हुई कै थांनै अठै क्यूं छोडिया नै उणी घड़ी रथ जुताय नै लेवण नै आई हूं। लौ चालौ अबै। जगदेव उठै बाट जोवतौ व्हैला। धिन घड़ी, धिन भाग! आज भतीजा नै भतीजा री ब’ऊ रौ मूंडौ देखियौ। (वीरमती ऊभी होय नै समान उठावै। जांमोती भी अेक दो चीजां उठावै नै दोनूं रथ कानीं जावै)
(पड़दौ पड़ै)
दूजौ-दरसाव
(जांमोती रै घर रौ बरंडौ, जिण रै लारै अेक सजियोड़ौ कमरौ है। अेकण कानीं सूं लालराज हाथ में प्यालौ लियां नै दूजा कानीं सूं जांमोती आवै।)
जांमोती – लालजी बना! गळै रौ हार बगसीस करौ जैड़ी चीज लायी हूं। भूतै न भवसते। देखी न देखोला, अैड़ी है।
लालराज – वाह अे जांमां। थारौ तौ नाम ई नसीलौ नै काम रसीलौ है। ओ लै हार! थूं राजी रैह (हार देवै नै जांमोती मुळकती हार ले लेवै)
जांमोती – तौ पधारौ इण रंग मै’ल में जिण नै वा रोसन कर रैयी है। सावचेती सूं पोटाय नै काम लीजौ। खास छत्राणी है।
लालराज – यां बातां री कांईं भोळावण देवै! माथै में रूं जितरा कबाड़ा कियोड़ा है। थनै कोई बात सिखावणी पड़ै है कंईं?
(जांमोती जावै नै लारलौ पड़दौ उठै। सजियोड़ा कमरा में वीरमती बैठी दीसै। लालराज वीरमती रै कनै जावै। वीरमती जगदेव री जगां दूसरौ मिनख देख लचकांणी पड़ मूंड़ौ फेर लै।)
लालराज – प्यारी! थारै मुखड़ै रौ चांद अठी कर। म्हारी मनड़ै री बळण सीतळ व्है ज्यूं।
वीरमती – (आंखियां काड नै) खबरदार! फेर बोलियौ तौ। अै साळियां वाळी कुगतां म्हनै को सुहावै नी, भलांईं थे भुआजी रा बेटा हुवौ। कठै है म्हारा नाथ? म्हारा भरतार? (बारै जावण लागै पण लालराज आडौ फिर जावै।)
लालराज – (नसै में) ओ हौ! थे तौ नखरा घणा करौ। अरै म्हारै जैड़ौ मिजाजी भंवर इण स्हैर भर में नीं है। न्याल कर देऊंला। बोलौ कंईं चहिजै? आ अमौल रतन जड़ियोड़ी मूंदड़ी.. (बींटी दिखावै)
वीरमती – अरै दुस्टी! थूं है कुण? बींटी बाळ चूल्है में। म्हारै चा’वना कोयनीं। कठै है म्हारा प्राणनाथ? बोल झटपट।
लालराज – अरै अकल री आगर! कुण थारा प्राणनाथ नै किणरी बात? हूं लालराज स्हैर कोटवाळजी रौ लाल हूं नै आ हवेली तौ जांमोती गणका री है। थनै कयौ कोनीं कंईं?
वीरमती – (घबराय नै) हे भगवान! तीन तिलोकी रा नाथ! औ’ कंईं चाळौ है? म्है कठै आय फसी? आज म्हारी लाज सांवरा! थारै हाथां है! अरै! हूं केड़ै धोखै में फंसगी (विलाप करै, फेर लालराज नै देख नै) अरे नीच! थूं अदीठ कर! थारौ काळ तौ नीं आयौ? थूं घणी भोळी गरीबणियां री इज्जत लूटी है। कोई असल छत्राणी मिळी नीं है, जिण सूं आवळ-कावळ बक रैयौ है।
(लालराज गळै में हाथ न्हाकण नै झूमै। इतरै में वीरमती गुस्सै में अंगार होय नै कटारी काडै अर पापी रै काळजा में आर-पार कर देवै। उण दुष्ट री देह लोही सूं लथपथ होय नै आंगण में पड़ जावै।)
वीरमती – (रीस में धूजती हुई) भगवान! आज तौ म्हारी लाज थूं ईज राखी। हमै इण दुष्ट री ल्हास रौ कंई करूं?
(अठी-उठी जोय नै बारी मांय सूं ल्हास नै नीचे फैंक देवै।)
जांमोती – (मांय सूं बोलै) अरै रसिया! हमैं तौ ऊठौ! ‘लागतौ सनेह इतरौ अबूं तौ क्यूं नीं भई–
‘म्है थनै पूछूं सायबा, प्रीत किता मण होय।
लागतड़ी लेखौ नहीं, तूट्यां टांक नै होय॥’
वीरमती – डावै कानी नीचौ देख! थारै कुणकइयै सूं कीड़ियां मूंडै में सनेह मांडियौ होसी।
जांमोती – (भीतर सूं) हैं..? राधा देख तौ बारी मांय सूं गळी कानीं!
राधा – (मांय सूं) हाय राम! बाईजी, आ रागसणी कंवर री हित्या कर दी।
जांमोती – हैं..! अरै दुस्टणी! थूं हित्या कर दी? ठाली भूली! हमैं आडौ खोल! थारी जनाकां में आकड़ौ नाकूं थारी में (आडौ भचैड़ै)
वीरमती – थारै कुणकइयै नै अठै बाळण नै मेलियौ हौ कंईं? करी जैड़ी पाय ली।
जांमोती – (मांय सूं) राम-राम! हमै हूं कंईं करूं रे! (आडौ भचैड़ै नै वीरमती कमरै नै उथळ पुथळ करण में लाग जावै।)
वीरमती – माथौ भांग, माथौ! थारा लखण ई अैड़ा है।
राधा – (मांय सूं) बाईजी! लोग कोटवाळ जी नै बुला लाया है।
जांमोती – (मांय सूं) हैं..? गजब व्हैग्यौ। हमै कंईं करूं? छिपूं भी तौ कठै?
डूंगरसी – (मांय सूं गुस्सै में भरी आवाज) बोल रांड, पातर! थूं म्हारै छोकरै री घात क्यूं करी? (चाबुक री अवाज)
जांमोती – (रोवती अवाज) कोटवाळ साब! आपरै कंवरजी नै हूं नी’ज मारिया। हित्या करणवाळी रागसणी इण कमरै रै मांयै बड़ियोड़ी है। कंईं ठा, कुण है? रातै लाल रै साथै आई ही।
डूंगरसी – (किंवाड भचीड़ नै) अरै आडौ खोल हत्यारण! कुण है थूं आंटायत पूरबलै जनम री?
वीरमती – आडौ हरगिज नीं खोलूं। इण पापवाड़ै में आय फंसी हूं। जठा तक म्हारौ घरधणी नीं आवै, अेक बात नीं मानूं।
डूंगरसी – (मांय सूं) कुण है थारौ घर धणी?
वीरमती – धारा नगरी रौ राजकंवर, कोटवाळां! म्हनै आ पातर धोखौ देय नै अठै लाय फंसाई। म्हैं म्हारी इज्जत बचावण नै आपरै कंवर री हित्या की है।
डूंगरसी – (मांय सूं) जांमोती! अै सारा कबाड़ा थारा ईज है। जवार सिंघ! रांड रा हाथ पग बांध नै बन्द कर दो कोटवाळी में। म्हैं राजाजी नै जाय इतला देऊं नै ना’र सिंघ! थूं जा, कंवर रै दाग रौ इंतजाम कर।
(पड़दौ पड़ै)
तीजौ-दरसाव
(वेस्या रै घर रौ मारग। जगदेव आवै।)
जगदेव – रथ रा चीला तौ तळाव सूं सीधा अठै आया है पण अठै किण नै पूछै कै वीरमती कठै है? भला रे किस्मत! घरै मांई मां रै दुख सूं छूट नै अठै आया तौ अठै ई बिखौ पड़ग्यौ। आत्मा री छिंयाडी रूपी वीरमती नै देख नै धीरज धरती पण उण रौ ही विजोग! भाग री बात! पण कैया करै है – ‘हीमत मरदां तौ मदत खुदा’। कोसीस तौ करूं, देखां। किणी नै पूछ देखूं। पण आ इत्ती भीड़ कठीनै जावै है?
जगदेव – (अेक आदमी नै आवतौ देख नै) जै माता जी री, ठाकरां!
सिपाही – जै माताजी री। कठै रैवणौ सिरदारां?
जगदेव – कंईं बतावां भाई! आभै न्हाकिया नै धरती झालिया कोनीं। आपरौ नाम ठाम?
सिपाही – म्हनै भीमौ कैवै है। राज रौ सिपाही हूं।
जगदेव – भीमजी! आज आ इतरी भीड़ कठै जावै है? हाकाइब, घणी दीसै।
भीमजी – अरै! सा, आज सै’र कोटवाळ रै छोकरै नै जांमोती पातर रै घरै किणी लुगाई कतल कर दियौ। कमरै में बड़ नै आगळ दे राखी है। फरियाद सूं राजाजी न्याव करण पधारै है। सो इण कारण मिनख ऊरड़ै है।
जगदेव – वेस्या रै घरै कोई लुगाई खून कर दियौ? (सोच नै) अरै कठैई म्हारी वीरमती तौ इण वेस्या रै चक्कर में नीं फंसगी है? जाऊं देखां (भीड़ कानीं जावै)।
(पड़दौ बदळै)
चोथौ-दरसाव
(वेस्या रै कमरै रौ बरामदौ। राजा, कोटवाळ नै बंधियोड़ी जांमोती आवै।)
कोटवाळ – औ’ई है, अन्नदाता! इण वेस्या रौ। इण कमरा मांय सूं कंवर नै कतल कर नै कोई नीचै न्हाक दियौ।
राजा – (जांमोती सूं) बोल! कोटवाळ रै छोकरै रौ खून कुण कियौ? थारै घर में खून हुवौ है सो, थारा भी इणमें हाथ तौ है ई।
जांमोती – खमा घणी, अन्नदाता! म्हारा हाथ बळ जावै जे म्हैं अेड़ौ पाप कियौ व्है तौ। कोटवाळजी रै कंवर तौ म्हनै घणा बा’ळा हा। आ’ बात सारी नगरी जाणै। वियां नै मारणवाळी तौ अेक असैंधी लुगाई है जो वां रै साथै रातै आई ही। वा’ इण कमरै में लुकियोड़ी है नै आडौ नीं खोलै। अन्नदाता! माहारो कीं गुनौ कोनी।
राजा – कोटवाळां, आडौ खुलाऔ।
कोटवाळ – कुण है बाला कमरै में? आडौ खोल। राजाजी पधारिया है।
वीरमती – (मांयै सूं) आडो नीं खुलैला। पैलां इण पातर रौ विस्वास कियौ जिणरौ औ फळ मिळियौ। हमैं सिवाय म्हारा पतिदेव रै और किणी रै कैयां सूं हरगिज आगळ नीं खोलूं।
राजा – बेटी! घबरा मत। बारै आव। हूं थांरौ न्याव कर सूं। हूं सिधराज जैसिंघ, पाटण रौ राजा हूं। थारी हकीगत अर ओळखांण बता। (जगदेव भी आ जावै)
वीरमती – (मांय सूं) आप गुजरात रा धणी हौ नै म्हारै पिता रै दांई हौ। म्हनै भरोसौ है कै आप म्हारौ न्याव करोला पण आप किरपा कर नै म्हारा धणी नै तेड़ावौ। वै स्हैर में म्हनै जोवता हुसी। हू कूं कटोड़ा रै राजा रामडी री बेटी हूं अर धारा नगरी रै थाटवी कंवर री जोड़ायत हूं। आ पातर म्हनै धोखै सूं जाळ में फसाय दी। पण म्हारी लाज भगवान राखी औ दुस्ट म्हारी ईजत लूटण ढूकौ जद म्है म्हारा पतिव्रत धरम रुखाळन सारू तंग आय नै पापी रौ खातमौ कियौ है। न्याव आपरै हाथ में है। किरपा करनै म्हारै पतिदेव नै तेड़ावौ।
जगदेव – वीरमती! म्हैं जगदेव बारै ऊभौ हूं। आडौ खोल नै पाटण रै धणी रा दरसण कर।
(राजा नै झुक नै मुजरौ करै)
राजा – ओ! थे जगदेव हौ? इतरा दिन बखाण तौ सुणता हा पण आज आ पुळ क्यूं?
जगदेव – मा’राज! सुख-दुख किणनै नीं सतावै? (आगळ खुलण री आवाज आवै।)
सिधराज – ठीक है, जोध! पैलां थारी जोड़ायत रा हाल पूछौ। पछै दूजी बातां करसा। (आडौ खोल वीरमती बारै आवै। राजा नै मुजरौ करनै जगदेव रा चरणा में पड़ै। जगदेव उठाय नै छाती सूं लगावै।)
राजा – धिन है कंवराणी थनै! कैया करै है कै धरती बीज को गमावै नीं, सो साव साची बात है। आज अैड़ी बिखमी बेळा में जद संसार री नारियां में दुराचार छाइजियोड़ौ है, उणां में वीरमती जैड़ी हीमतण पतिपरायण नै सीळवंती भी मौजूद है, आ’ घणी खुसी री बात है। जठा तक अेड़ी ऊजळी करणी री बालावां देस में जनमती रैवैला, आपणौ भारत देस संसार में सूरज री भांत चमकतौ रैसी। गुणवंती नारियां सूं देस रौ सही निलाण हुवै, नै बिगड़ियोड़ी सूं देस डूबै। आज सूं जगदेव नै वीरमती दोनूं ही कुळ रा दीवा अठै ही आणन्द सूं बिराजौ। नित री सौ मौहरां थारी पगार है। इण वेस्या रौ माल मतौ जब्त कर लौ नै इण रौ माथौ मूंड नै देस निकाळौ दे दौ।
वेस्या – दया, अन्नदाता! दया! हमैं कदैई म्हैं अैड़ा खोटा धंधा नीं करूं। (पग पकड़ै।)
राजा – राजा नहीं, नहीं। थूं घणां नै डूबाया है। हमकै ईज फसी है। म्हारा राज में थारै जैड़ी छिनाळ लुगायां रौ काम कौनीं।
अेक चारण – वीरमती री वीरता, सांचौ पती सनेह।
अै गुण ज्यां लग ओपसी, भारत मोद भरेह।
(पड़दौ पड़ै)