पात्र

कामरान – हुमायूं रौ भाई
हुमायूं – दिल्ली रौ बादसा
मुबारक बेग – कामरान रौ वजीर
बखतावर सिंघ – कामरान रौ सेनापति
अमजद अली – हुमायूं रौ वजीर
(दूत, सिरदार, खजानची, दूजा दरबारी वगैरा)


पैलौ-दरसाव

(सीमा प्रान्त रौ अेक गांव। बागी कामरान री फौजां रौ पड़ाव। दरबार बीच कामरान ऊंचै आसण पर बिराजमान। सगळा ही सभासद बैठा बात बिचारै। परभात री रोसनी डेरै में उजास फैलावै।)

मुबारक – हजूर! कोई उपाय निजर नीं आवै।

खजानची – हजूर! खजानौ भी दिन-दिन घटतौ जावै।

बखतावर – गरीब परवर! सेना भी निरबळ पड़ती जावै। जरूर कोई बगावत माचैली जे उणनै सन्तोस नीं दियौ गयौ तौ।

कामरान – सिरदारां! जरा बात बिचारौ। इण काबूल– कन्धार रै परगनै में कद तक मूंडौ लुकोवां? सरणागत हुवा परायै घर कद तक टुकड़ा तोड़ां? किण घड़ी तक बन-बन भटकां, चूल्है री राख छाणां? (अधिर व्है नै) के म्हारै भाग में बरबादी ई लिखी है? दर-दर री ठोकरां खाणौ ई नसीब हुवौ है? म्हारी छाती क्यूं नीं फाटै, जद आखी दुनिया बात बणावै कै आज बाबर री औलाद...? (गळौ भर आवै)

मुबारक – धीरज धारण करावौ। धीरज धारण करावौ, हजूर!

कामरान – धीरज री बात छोडौ, वजीर साब! अब कामरान संग रा साथीड़ां रा दुख दरद नीं देख पावै। खजानौ घटतौ जावै, सेना में चैन नीं लखावै, तौ धिरकार म्हारौ जीवण! अेक म्हारै सुख सुवाद रै खातर आप सगळा ही कस्ट उठायौ। हुमायूं री फौजां रा जुलम सैह्या। दर-दर ठोकरां खाई। अेक पळ भी सुख सूं नीं बितायौ। अब आप सगळा ही घरै जावौ.. अर म्हनै म्हारै भाग भरोसै छोड जावौ। (निसांसां भरै)

सगळा – (अेक अवाज सूं) नीं हौ सकै, हजूर! आ’ नीं हौ सकै!

(कामरान री आंख्यां जळ भर आवै अर चुपचाप सीस उठा’र आभै नै अवेखै। इणी टैम दूत प्रवेस करै।)

दूत – (सलाम करतां) मुबारक हुवै, हजूर! सुभ समचार लेयनै आयौ हूं।

कामरान – (ओझकै) हैं– हैं! सुभ समचार! अभागै कामरान रै खातर किण बात रौ सुभ समचार है? (आसण पर सुध संभाळ बैठै, अर आखी सभा कान लगाय नै दूत री बात सुणै।)

दूत – गरीबपरवर! दिल्ली माथै शेरशाह पठाण री सेना चढ आयी अर हुमायूं थार री मरू भोम में सरणागत हुवौ।

कामरान – हैं! है! मुगल सेना बरबाद हुई? हुमायूं री हार हुई? तौ.. ! (चिन्ता करै।)

मुबारक – हजूर! अबै चिन्ता किण बात री है? हुमायूं री हार ई हजूर री जीत है।

कामरान – वजीर साब! म्हारौ भी खानदानी खून उबाळ खावै, अेक पठाण रौ छोरौ जद बाबर रै कुळ पर कळंक लगावै। (दांत भीचै)

मुबारक – कसूर माफ हुवै, हजूर! आप हुमायूं बादशा रै प्रति बागी हौ, अर बागी कदैई हमदर्द नीं हुवै, हजूर!

कामरान – (संभल) हां-हां हुमायूं भाई नी, बैरी है, वजीर साब। दूत! भळै भी कोई समचार है?

दूत – हां, गरीबपरवर! गक्खर-नवाब भी बागी हुवौ है, हजूर नै उणरी दोस्ती मुबारक हुवै।

कामरान – खूब! खूब! अेक सूं दो हुवा। कामरान दोस्ती निभाणी खूब जाणै।

मुबारक – हजूर! हुकम हुवै तौ तड़कै ही सरहद पर हमलौ करां। मुगलां रा मुकाम लूटां।

कामरान – (हंस नै) हां-हां, सेनापती! लस्कर मांडौ। खजानौ भरौ अर कूच करौ।

(पड़दौ पड़ै)

दूजौ-दरसाव

(पड़दै रै पाछै समर भोम रा बाजा बाजै। कामरान वीर भेस में, अेक सिला खण्ड पर बिराजमान! वीर भेस में ही वजीर मुबारक बेग रो प्रवेस।)

मुबारक – (सलाम करतां थकां) बादशा हजूर री खिदमत में सुभ समचार लै नै हाजर हूं।

कामरान – अबै सुभ समचार किण बात रौ है? वजीर साब! मन में किण बात री उमंग है?

मुबारक – हजूर! मुबारक हुवै! सेनापति दोआब जीत लियौ है।

कामरान – घणै हरख री बात है, बहादुर सेनापती सूं इसड़ीज आसा ही। म्हैं उणरै करतब री दाद दूं।

मुबारक – दोआब रौ सूबैदार भाग नीं पायौ अर सेनापती रै खांडै खेत हुवौ।

कामरान – जिण खांडै री धार सेनापती दोआब जीतियौ उणी खांडै री धार पंजाब जीतणौ है, सेनापती नै।

मुबारक – हां, हजूर। (सेनापती रौ प्रवेस)

बखतावर – (सिलाम करनै) हजूर री चाकरी में हाजर हूं। दोआब रौ इलाकौ आपनै नजर है।

कामरान – खूब! खूब! सेनापती जी। मौकै पर हाजर हुवा। मन मांगै, आपरी हातळ चूम लूं। सेनापती जी। और भी कोई समाचार है?

बखतावर – दोआब री लूट में खूब माल कब्जै हुवौ है। मुगलां रा मुकाम बरबाद हुवां है। सेना में घणौ उछाव है।

कामरान – (मन में संकै) पण दूत क्यूं नी आयौ, वजीर साब?

मुबारक – गैलै ही चालै, हजूर (दूर कठैई घुड़लौ हिणहिणावै। दूत रौ प्रवेस)

कामरान – घणी देर हुई, उडीकतां उडीकतां।

दूत – कसूर माफ हुवै, हजूर! अेकान्त मिळै तौ समचार सुणाऊं।

कामरान – (सेनापती सूं) सेनापती जी! जाऔ, आराम करौ। (वजीर नै देख’र) वजीर साब! आप फौजां री सम्भाळ करौ। उण रा दुख दरद सुणौ।

दोनीं – जो हुकम हजूर। (दोनां रौ प्रस्थान)

कामरान – (दूत सूं) कौ, भाई! किण बात री सूचना है?

दूत – नदी रै परली पार मुगल सेना रौ मुकाम है। मुगल सेना सराब में मस्त है। नदी पार कर आज रात ही हमलौ हुवणौ चहिजै।

कामरान – ठीक है।

(पड़दौ पड़ै)

तीजौ-दरसाव

(कामरान रौ बादशाही दरबार। कामरान राजसी ठाट-बाट सूं ऊंचै आसण पर बिराजमान। सगळा ही अमीर उमराव नित नेम मुजब बैठा है। सेनापती रौ प्रवेस।)

कामरान – सेनापतीजी? लड़ाई रा समचार है! है कोई नवी बात?

बखतावर – (आसण बैठतां थकां) परवरदिगार परमात्मा री रजा है। हजूर री सेना हर जगां कामयाब हुई है। हमै तौ दिल्ली भी दूर नीं लखावै। शेरशाह रै भौ सूं हुमायूं फारस भाग ग्यौ है, बीबी बच्चां नै अमरकौट रै सोढै राजा रै अठै छोड ग्यौ है।

कामरान – आज म्हारै मनड़ै री आसावां पूरी होती निजर आवै। आज जकी तरवार हुमायूं रै माथै पड़ी, तड़कै शेरशाह रै माथै भी पड़ैला। सेनापती जी! सेनापतीजी, म्हारौ खानदानी खून उबाळ खावै, जद कै अेक पठाण रौ छोरौ बाबर रै कुळ पर कळंक लगावै। हाय! हुमायूं रा कांन आज कीकर कड़वा बचन सुणै कै आज बाबर री ओलादां...! (मूंडा मा’थै उदासी छावै)

मुबारक – गुनौ माफ हुवै, हजूर! आप हुमायूं बादशा रै प्रति बागी हौ अर बागी कदेई हमदर्द नीं हुवै, हजूर!

कामरान – ठीक है, वजीर साब! बागी कदैई हमदर्द नीं हुवै, पण इन्सान भी नीं हुवै? (वजीर सिर झुका लेवै)

कामरान – (हंसनै) सरम खावण री बात नीं, वजीर साब! सीस उठावण री बात है। आप निज धरम री रिच्छा करी। मालक रै प्रति वाजिब फरज निभायौ। पण कामरान कोरौ पासाण खंड तौ नहीं है? उण रै हिवड़ै में भी ममता है, मौह, मिनख सुभाव रै मुजब कमजोरी भी है।

मुबारक – गुनौ माफ हुवै, हजूर! आप ठीक फरमावौ। पण म्हनै आज रौ दिन भलौ निजर नीं आवै। जरूर कोई असुभ.. (माथौ पकड़ लेवै)
(दूत रौ प्रवेस)

दूत – (घबरातौ सो) हजूर– हजूर! गजब व्है ग्यौ! गजब व्है ग्यौ! विस्वास घात हुवौ। गक्खर रौ नवाब साथ नीं दियौ अर आपणी सेना नै घाटी में घेर नै हमलौ कर दियौ।

कामरान – (उदास व्हैनै) हैं..! और कंईं हुवौ?

दूत – हजूर! शेरशाह रौ इन्तकाल हुवौ। दिल्ली मुगलां रै हाथ आयी। फारस रै बादशा सूं मदद लै नै हुमायूं सीधौ मुलतान पर चढ आयौ। आपणी आखी सैना बरबाद हुई।

कामरान – (कोप करतौ हुवौ) सेनापती! सेनापती! बाकी बची सेना त्यार करौ। कामरान अब काबुल कन्धार नीं जावै। करम करणौ मिनख रै हाथ है, फळ देणौ मालिक री मरजी पर है। आपां फळ री फिकर छोड नै करमपथ अपणावांला।

(पड़दौ पड़ै)

चोथौ-दरसाव

(दिल्ली रै बादशा हुमायूं रौ राज-दरबार। दरबार खास में हुमायूं ऊंचै सिंघासण पर बिराजमान है। अमीर उमराव नित नेम मुजब बैठा है।)

हुमायूं – कामरान री सेना बरबाद हुई अर कामरान जीवतौ ई मुगल सेना रै हाथां पड़्यौ। औ दरबार खास कामरान रै खातर बुलायौ गयौ है। अमजद अली!

अमजद – जी हजूर!

हुमायूं – जाऔ, कामरान नै दरबार में हाजर करौ।

अमजद – जो हुकम।

(वजीर रौ प्रस्थान। बन्दी रूप में कामरान रौ प्रवेस। कामरान रै हाथां में हथकड़ी है, पगां में बेड़ी। तन रा घाबा लीरो-लीर है। बदन पर लड़ाई रा घाव है।)

हुमायूं – सिरदारां! आज कामरान रौ फैसलौ करणौ है। आप सगळा ही बिचार करौ। कामरान नै किण भांत रौ डण्ड दियौ जावै? (कामरान नै देखै)

हुमायूं – कामरान? आप भी कोई बात कैणी चावौ?

कामरान – (सिर घुमाय नै) ना।

हुमायूं – इण मामलै में आप लोगां री कंईं राय है? (सभासद आपस में सल्ला करै।)

सगळा – (अेक साथै) कामरान नै फांसी कामरान नै फांसी!

हुमायूं – फांसी! हैं..! फांसी! उमरावां बात बिचारौ कामरान म्हारौ सगौ भाई है। म्हैं भाईपणै रै भाव नै भूल’र खून में हाथ किण बिध रंगूं?

अेक सिरदार – आप बादशा हौ, न्याय रै आसण पर बिराजमान हौ। आप इण भाईपणै रै भाव नै भूल बैठौ अर न्याव धर्म री रिच्छा करौ। सिद्धान्त री बात बिचारौ, हजूर!

हुमायूं – सिद्धान्त अर बैवार में फरक है। कैणौ सोरौ है अर करणौ दोरौ। म्हैं इण भाईपणै रै भाव नै किण बिध भूलूं?

दूजौ सिरदार – हजूर! परजा री मांग है, सिद्धान्त री रिच्छा हुवै।

हुमायूं – सिरदारां! बाबर नै दिया बचन नै भूल बैठूं?

सिरदार – तौ बाबर रा बचन न्याव री हत्या रौ हुकम करै?  न्याव आंधौ हुवै। वो बाप अर बेटा नै भी नीं देखै अब आप जल्दी फैसलौ करावौ।

हुमायूं – (निसांसां नाख’र) उमरावां! बादशा रौ जीवण भी परायौ है, कांटां री सैज, खांडै री धार! कामरान रौ कसूर माफ नीं व्है सकै। माफ नीं व्है सकै। तौ– तौ डण्ड रूप में कामरान री दोन्यूं आंख्यां काढ़ ली जावै! आज रात ईज हुकम री तामील हुवै।
(सिंघासण सूं ऊठ नै हुमायूं तेजी सूं मांय जावै! कामरान हंसै।)

(पड़दौ पड़ै)
स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी एकांकी ,
  • सिरजक : दामोदर प्रसाद ,
  • संपादक : गणपति चन्द्र भण्डारी ,
  • प्रकाशक : अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : चतुर्थ
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