पात्र

महाराणा प्रताप
अमरसिंघ
भील सरदार
सेरू (अेक भील)
भामासा
चार सिरदार


जगां – भाखरां रै बीच में
समै – परभात
खेलण री मियाद – बीस मिनट
साधन – तरवार, तीर-कबाण, सोनै चांदी सूं भरियोड़ी चार रख्खियां
सैटिंग – जंगळ नै भाखर

पैलो-दरसाव

(भाखरां रै बीच में महाराणा परताप मूंडौ उतार्‌यां बैठा है। पाखती बाळक अमरसिंघ बैठौ-बैठौ आंसू पाड़ै है।)

परताप – अमर..

अमर – दाता!

परताप – यूं आंसू क्यूं ढाळै बेटा?

अमर – काठी भूख लागी है दाता! अबै तौ भूख नीं सैयीजै।

परताप – चित्तौड़ रौ मेवाड़ी राजकंवर, यूं भूख सूं डरै?

अमर – नी दाता! म्हैं भूख सूं नीं डरूं पण..

परताप – कालै रात रा थारा बूसा अेक रोटी ढक नै राखी ही, वा कठै गई?

अमर – वा रोटी तौ मिनकौ लेग्यौ, दाता! म्हैं नै बूसा मिनका नै काढण री घणी कोसिस करी पण सेवट रोटी उठानै ले ईज गयौ।

परताप – (गम्भीर बणनै) हूं..!

अमर – हां, जरै ईज तौ हाल तक म्है भूखो हूं।

परताप – खैर, कीं बात नीं बेटा! कालै रात रा तौ रोटी खाईज ही कै?

अमर – हां दाता! कालै तो म्हैं आधी रोटी खाई ही।

परताप – जैड़ी इकलिंग जी री मरजी। थूं कालै आधी रोटी तौ खाई ही, पण म्हैं नै थारा बूसा कितरा दिनां रा भूखा हां। ठा है थनै?

अमर – हां दाता! म्हनै सैंग ठा है। आप चार दिनां रा भूखा हौ। (थोड़ी वार चुप रै’नै) दाता! आखती पाखती जाय नै सौदूं कठैई फळ फूल कै कंदमूळ मिळ जावै तौ?

परताप – जा बेटा, जा.. भाग भरोसै.. (अमर सिंघ जावै। परताप उदास मन, मूंडौ लटकायां विचार करता हुवै ज्यूं बैठा है। थोड़ीक वार पछै)

परताप – हे भगवान! कैड़ौ बिखौ न्हाखियौ है? टाबर भूखा मरै। औ म्हासूं कीकर देखीजै? (थोड़ी बार चुप रैवै) तुरकां रौ अबार सामनौ कर सकूं जकी जचै कोनी। जे म्हैं अठै ईज रैऊं तौ उणरा सिरदार म्हनै अठै जक नीं लेवण दै। किणी तरै सूं जे म्हैं अकबर रै राज री सींव सूं बारै निकळ जाऊं तौ थोड़ीक चैन मिळै नै जुद्ध रौ सावळ बिचार कर भी सकूं। पण..पण कठै जाऊं? (लिलाड़ माथै हाथ फेरै नै बिचार करै) अरै! हां, ठीक याद आयौ। सिंध नदी रै कांठै सिंधियां रै राज में जाऊं परौ।

(भील सरदार नै सेरू भील आवै)

सिरदार – जै हो मेवाड़ रा धणी री।

परताप – ओ! भील सिरदार! आवौ-आवौ।

सिरदार – महाराणा! आज आप किण बिचार में उळझियोड़ा बिराजिया हौ?

परताप – दूजौ कंईं बिचारूं?  अबै म्हारौ अठै घणौ ठैरणौ दोरौ ई है।

सिरदार – क्यूं? बस..हिम्मत हरा दिरावोला कंईं, महाराणा?

परताप – हिम्मत हारण रौ सवाल नहीं है, सिरदार! अठै रैयनै इण बखत मुगलां रो सामनौ कर सकूं, अैड़ी औकात अबार म्हारी नीं है।

सेरू – बात तौ साची फुरमावौ हौ, महाराणा।

परताप – नै फेर इण नैना सा बाळकिया नै दो-दो दिन तक भूखौ रैवणौ पड़ै।

सिरदार – आप भी तौ चार दिनां सूं कीं नीं अरोगिया हौ, अन्नदाता!

परताप – (बात टाळ नै) सिरदार! अैड़ी सुरगां जैड़ी जनमभोम छोड़तां म्हारौ हिवड़ौ फाटै। जिकी जनमभोम म्हारौ पाळन पोसण कियौ, जिणरी सुतंतरता रै खातर म्हैं इतरौ लड़ियौ, इतरा दुख भोगियो, उण जनमभोम नै अैड़ा दुखां में छोड़नै जावतां म्हारौ काळजौ टुकड़ा-टुकड़ा हुवै।

(आंसू टपकै।)

सिरदार – पण कियौ कंईं जावै, अन्नदाता! इण सिवाय कोई दूजौ उपाय भी तौ नीं दीसै।

सेरू – महाराणा! म्हैं आपनै अकेला नीं जावण दूं। म्हैं भी आपरै साथै चालूंला।

परताप – नीं बीरा, नीं। जे थूं म्हारै साथै चालैला परौ, तौ पछै अठारा संदेसा म्हनै कुण भेजैला?

सेरू – क्यूं? सिरदार तौ अठै है ईज।

परताप – भाई! माडाणी दुख क्यूं झेलै? थूं सिरदार रै साथै ईज रै, सिरदार नै मदद मिळैला।
सिरदार – अन्नदाता! म्हारै किणी तरै री मदद नी चाहिजै। औ आपरै साथै रै’ई तौ सा’रौ ईज लागैला।

सेरू – सिरदार ठीक कैवै, अन्नदाता।

परताप – वा जरैं, यूं ईज करौ कै औ म्हारै साथै चालै नै..

सिरदार – म्हैं अठै ईज रैऊं।

परताप – हां जनमभोम! मां, थनै छेल्ला परणाम! (हाथ जोड़ै) मां! थानै अैड़ा बिखा में छोडतां म्हारौ काळजौ चीरीजै है। पण कंईं करूं मां! थनै इण विपदा सूं छुटकारौ दिरावण रै खातर ईज जाऊं हूं। मां! थनै  बंदवू लाख-लाख परणाम!
(आंखियां मांय सूं आंसू री लड़िया बैवै।)

सेरू – (अेकदम, लिलाड़ माथै हाथ धरनै आघी आती चीज देखतौ व्है ज्यूं।) महाराणा!

सेरू – वो उठीनै आघौ थकौ कंईं घुड़सवार आवता व्है ज्यूं दीखै।

सिरदार – (देख नै) हां महाराणा, घोड़ौ अठिनै ईज सरपट आवतौ दीखै।

सेरू – अबै तौ असवार साव नेड़ौ आयग्यौ है।

परताप – अरै! अै तो भामासा है। सागै चार सिरदार भी है।

(भामासा चार सिरदारां रै साथै आवै। चारां रै खवां माथै चार भारी भरकम रख्खिया लटकै है।)

परताप – आवौ, भामासा! आवौ (भामासा हाथ जौड़ै।)

भामासा – घणी खमा, अन्नदाता! जै इकलिंग जी री! जै हौ मेवाड़ रा धणी री!

परताप – जै इकलिंग जी री! अबार इण बखत नै अठै कीकर आवणौ हुवौ साह जी?

भामासा –  आपरै चरणां में ईज हुवौ हूं, बाप जी!

परताप – बोलौ, बोलौ, म्हारै लायक..

भामासा – महाराणा! म्हैं सुणियौ है कै आप मेवाड़ छोड़ नै पधार रैया हौ। आ बात साची है कंईं?

परताप – हां भामासा! आ बात साव साची है। अबै म्हनै मेवाड़ रौ त्याग करणौ ईज पड़ैला।

भामासा – पण क्यूं? इण मेवाड़ री नाक जावै, महाराणा!

परताप – साह जी! आज तक म्हैं घणी ई हिम्मत राखी। अबै पण म्हारै कनै नीं तौ धन है नै नीं सिपाही..

भामासा – आपरै बिना मेवाड़ अनाथ व्है जावैला, अन्नदाता!

परताप – भामासा! उण अकबर नै तौ बापा रावळ रै वंस री इज्जत लेवण सूं मतळब है। थांनै इण में कंईं? थैं तो आणंद सूं रौ’।

भामासा – कैड़ी कड़वी बात फुरमायी, अन्नदाता। रूंख री जड़ काटियां पछै डाळ साबती रैवै? आप तौ यूं दुख भौग नै फिरता फिरौ नै म्है आणंद री बंसरी बजावां? औ’ आछौ लागै? म्है कि’या मुंडा सूं सुख भोगां?

परताप – पण इण में अेतराज कंईं है, भामासा?

भामासा – अेतराज? इण सूं मोटौ अेतराज फेर कंईं हू सकै, कै मेवाड़ री आन, मान नै मरजादा रौ रूखाळौ घर छोड नै दर-दर भटकै, नै म्हे अठै तुरकां री पगतळियां चाट नै जिन्दगी बितावां?  अेड़ा जीवणा बिचै तौ मरणौ चोखौ। म्हारी अेक अरज मानौला, म्हारा धणी?

परताप – आ कंईं को साहजी? थांरी कोई बात म्हैं आज तक टाळी है?

भामासा – (रख्खियां धर नै) तौ महाराणा! औ’ धन आपरै चरणां में अरपण करूं। अंगेजौ।

परताप – आ कीकर हू सकै, दीवाणां? थांरी सेवा रै बदळै म्हारै हाथ सूं ईज दियोड़ौ धन इणीज हाथ सूं पाछौ लेऊं? आ नीं हू सकै।

भामासा – महाराणा! मेवाड़ री धरती आपरी अेकला री नहीं है, म्हारी भी जलमभोम है। ओ धन आप नैं नीं, जलमभोम नै अरपण करूं हूं। जनमभोम री मुगती नै रिच्छा रै खातर जे म्हारौ धन काम में नहीं आवै तौ अैड़ा धन नै राख नै म्हैं कंईं करूं? धूड़ बराबर है।

परताप – (आंख्यां गळगळी करता) भामासा! म्हारा व्हाला दीवाण..

भामासा – नीं महाराणा जी! आप अबै ना नीं कर सकौ। आप बचन दियौ है। यां रख्खियां में इतरौ धन है कै पच्चीस हजार सिपायां रौ खरचौ बा’रै बरस तक चाल सकै। आपनै लेवणौ ईज पड़ैला।

परताप – भामासा!  थे नीं मानौ। म्हनै औ धन साचमाच लेवणौ ईज पड़ैला। धिन है उण कोख नै जिणमें थे जलम लियौ। थांरौ ओ त्याग जगत में अमर रैवैला।

(ऊभा हुय’र बांथ भर नै भेंटै)

भामासा – इणनै आप त्याग कौ अन्नदाता? हरगिज नहीं। औ त्याग बिलकुल नीं है। अैड़ौ कपूत नै नीच इण संसार में कुण हुवैला जिकौ मां जलमभोम री रिच्छा रै खातर–मुगती रै खातर भी धन नीं देवै नै दौलत नै सेंठी करनै राखै?

परताप – (गळगळा व्हे नै) म्हारै कनै कीं नीं है; दो बोल भी नीं है। किण बिध थांरै गुणां रौ बखाण करूं?

भामासा – म्हारा मालक! अबै पाछा मुड़ौ नै म्हारी मां री बेड़ियां तोड़ण रा सरतन करावौ।

सिरदार – महाराज! पाछा मुड़ौ! भामासा रा इण त्याग सूं मेवाड़ जीत नै दिखावौ।

सगळा – धिन है भामासा! थांरी छाती नै धिन है!

सिरदार – महाराणा! जठै तक भारत री धरती माथै अैड़ा नर-रतन ऊभा पगां है, उठै तक आपांणी सुतन्तरता सामी कोई करड़ी निजर सूं देख भी नीं सकै।

परताप – खरी बात है।

सगळा – धिन है देस-भगत भामासा नै! धिन है त्यागी भामासा!

(पड़दौ पड़ै)

  
स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी एकांकी ,
  • सिरजक : आज्ञाचंद भण्डारी ,
  • संपादक : गणपति चन्द्र भण्डारी ,
  • प्रकाशक : अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : चतुर्थ
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