पात्र
मां
बेटी (बींदणी)
नायण
वर (बींद)
ठाकर
राजपूत
चारण (बारण जी)
माजन
भूरजी धाड़ेत व वांरा साथी धाड़ेत
जुहारजी
पिरोत जी
बोळाऊ – ठाकर रौ पोतौ, बरात रौ रखवाळौ।
(स्थान – ब्याव रौ घर, बखत – रात री)
(आगै-आगै बींद बींदणी छेड़ा छेड़ी बांधिया चालै अर वांरै लारै लुगायां ओळूं गावती आवै। अेकण कानी सूं नायण नै कुम्हारी सुगन कळस में लीली डाळ नै पत्ता घालियोड़ी आवै। ढोली ढोलकी नै सारंगी बजावता हुवा आगै-आगै रस्तौ बतावता नै मंगळ गावता चालै)
'आज तौ हरियाळौ बनड़ौ मैं देख्यो म्हारी माई।
मैं देख्यो म्हारी माई।
पाघ मोत्यां री सोवै, सेवरौ सुरंगौ लागै।
दुपटो जरी रौ कांधै केसरिया सुरंगौ बागौ।
आज तौ हरियाळौ बनड़ौ मैं देख्यो म्हारी माई।'
(ढोलियां रै रुकतां ही लुगायां करूण सुर में ओळूं गावै)
'थूं तौ छोड़ साईना रौ साथ कोयलड़ी सिध चाली।
अे थारौ इतरौ बाबौसा रौ लाड, छोड़ नै बाई सिध चाली।
अे थारा भूवाजी मंगळ गावसी, थारा माजीसा उगैरला ओळ।
कोयलड़ी सिध चाली।
अे आयौ सगां रौ सूवटा अे लेग्यो टोळी मांय सूं टाळ,
कोयलड़ी सिध चाली।
अे आडा बनखंड डूंगरा, अे उतरैला बाला सुजाण,
कोयलड़ी सिध चाली।
अे हिवड़ा समंदर ऊपरा, अे आवैला बोल उदाण,
कोयलड़ी सिध चाली।'
(नायण अर कुम्हारी रै सुगन कळस में मां नाणौ न्हाकै)
नायण अर कुम्हारी – सदा भवानी दाहिणी, सनमुख रहै गुणेस, पांच देव रच्छा करै, बिरमा बिस्नु महेस।
(अेक-अेक करनै सारी लुगायां बीनणी सूं मिळै नै मां माथै हात फेर न आसीस देवै।)
मां – बेटी, थूं म्हारा हिवड़ा री कोर। आज थारा सूं अळग बिळग होती म्हारा हिया में उफाण आवै है। जिण लाडली नै जनम सूं आज तांई आंख्या ओट नहीं कीवी जिण री थोड़ी सी पीड़ में रातूं दिन म्हारौ जीव कळपतौ, जिण रौ गुलाब रा फूल सो खिल्यौ मुखड़ौ देखनै म्हारा हिवड़ा री कळी खिली रैवती। घर रा आंगण में सोवण चिड़कली रा ज्यूं जिण रै हंसता खेलता फिरण सूं म्हारा हिवड़ा में गीतां रा दरियाव बैण लागता, आज उणी बाई री बिदाई सोच सोच’र म्हारौ हियौ फाटण लागौ है। रो मत बाई, थारौ सुवाग अखी रैवै। म्हैं घणी राजी खुसी थनै थारै सुरंगै सासरै करूं हूं।
बेटी – मां, म्हैं तौ जाऊं हूं पण म्हारै व्हालै नान्है भाई नै अब कुण रमावसी। लुक छिप’र वो माटी खावसी जद उण नै कुण पालसी। म्हारी प्यारी ढूली मोवनी रौ ब्याव अब होवै नहीं। म्हैं तौ उण रै फेरा रौ सारौ सराजाम कर लियौ हौ। मां! थूं दुख क्यूं करै, म्हनै पाछी बेगी बुलाइजै। आपणै आंगण में तुलछी माता रौ थाणौ है जिण नै म्हैं रोज सींचती, धूप दीप करती, जिण रौ ब्याव लारलै बरस म्हैं धूम-धाम सूं साळग रामजी सूं कर्यौ, उण बाई थारै नेम सूं सींचसी। देख इण में फरक पड़ै नहीं।
मां - महारी भोळी चिड़कली! अब थूं यां बातां री चिन्ता मत कर। सावण री तीज माथै थनै बेगी ही बुलावसां। थारै वास्तै अच्चा गैणा घड़वासूं। पौसाकां बणवासूं। थारा सासरा में थूं सरब सुखी रै’जै। आ’ई म्हारी सीख है। (माथा माथै हाथ फेर नै दोनूं जणियां गळै लागै।)
मां – (जवाईं सूं) कंवर जी, आप घणा सुजाण हौ, म्हारी घर री लाल, म्हारी आंख्या रौ तारौ आप रै सुपरत करूं हूं। म्हारी धरोहर नै संभाळ’र राखजौ। श्री परमातमा राज नै घणा सुखी राखै।
वर – माजी सा, राज री आज्ञा सिरप माथै। (हाथ जोड़’र नमस्कार करै, दोनूं रथ कानीं जावै।)
(लारलौ पड़दौ उठै। तळाव रै कनै रथ ऊभौ दीसै जिणमें बींद-बींदणी बैठा है। लुगायां बीनणी रै माथै हाथ फेरै नै रथ रवानै हुवै। पड़दौ पड़ै।)
दूजौ दरसाव
(गांव रौ बेरौ जिण माथै रंग बिरंगा कपड़ा पैर्या पणिहार्यां पाणी भरै। अेक कानीं ठाकर री कोटड़ी है जिणरी पौळ मांयै मांचा माथै बैठा ठाकर होकौ गुड़गुड़ावै है। दूजा मांचा माथै अेक अध बूढ़ौ राजपूत बैठौ है जिणरै हाथ में अेक ढेरियो है। ऊंट री जट कातै है। उण रै कनै अेक चारण भी बैठौ है।)
ठाकर – अरै आज रौ जमानौ भी कोई जमानौ है? रजपूताई तौ जमां में ही रयी नहीं। सिंह सगळा गीदड़ा हुवण लाग गया।
राजपूत – ठाकरां राज, आ’तौ मती कौ। संसार में भला भली छै। पिरथी निछतरी हुई कोनीं। राज रै कानां डूंगजी जुहारजी री वीरता रा परवाड़ा पड़्या कोनी?
चारण - जावण दौ उणां री बात, कंईं रख्यौ है। आ भी कोई सूरवीरता है? रजपूताई लूट खसोट’र चोरी रौ धन मारणै में नहीं है। काम पड़्यां रणखेत में धारा तीरथ लेय नै जीव छोडै, तिण रौ नाम रजपूत। बैरियां रौ घड़ मोड़ै, देस री रिच्छा करै, संत री पैज पाळै गरीबां री ओट आवै, मिन्दर देवतां री आण राखै, प्राणा रै’तां वचन परमांण राखै, सौ तौ रजपूत बाकी झख मारणौ रजपूती नहीं बाजै।
अेह बिरद रजपूत प्रथम मुख झूठ न बोलै।
अेह बिरद रजपूत पर त्रिय काछ न खोलै।
अेह बिरद रजपूत आथ बांटै कर जोरै।
अेह बिरद रजपूत अेक लाखां बिच ओरै।
जमराण पांय पाछा धरै, देख मतौ अवधूत रौ।
करतार हाथ दीधी करद, अेह बिरद रजपूत रौ।
ठाकर – हां इसी रजपुताई तौ राठौड़ अमरसिंह आगरै रै किलै वेढ़ में दिखाई, कै मेवाड़ी राणै परताप सतधरम री पाळना करी, कै कमधज दुर्गादास जी पातसाही घड़रा ने’स निकाळ्या जद कीवी।
बारठजी – सांची कही सिरदारां। सांची रजपूती दिन-दिन अलोप होती जावै है। सूरवीरता तौ इण कळजुग में बड़ली ठाकरां जबरी कीधी।
दळ मिलसी दिखणाद रा, तोपां पड़सी ताव।
(आ) बड़ली मिळसी जा दिनां, घलसी मो सिर घाव।
सेल बंदूक तीर खग साधन, अस चढ़णो रमणो आखेट।
इतरी बात हाथ जद आवै, नर नरनाह कहावै नेट।
पायक सांच साम ध्रम बरतै, रिधि खरचै द्रढ़ काछ रहै।
सो रजपूत सही सरसातां, लाखां ही बातां सुजस लहै।
ठाकर – पण बारठजी, इसा रजपूत आज दिन आंख फाड़यांई देस में दीसै नहीं।
बारठजी – खरी बात है ठाकरां। आज कल रै रजपूत नाम दारी सिंह रा परवाड़ा सुणौ–
माईतां तणौ सदा मानीतौ, घणौ अनीतौ रहै घर।
बरसां तीस बतीस वोळियां, आवै दत्त राजा अगर।
फूटी अकल न्हाख पग-फाड़ा, गाडौ हालै नीठ गह।
ओढ बरंग पाघड़ौ ऊंधौ, तुररा री और ई तरह।
सात्रव हंसै साजनां सालै, पसू समान मूरखौ पूर।
घाट कुघाट मूंछ बळ घालै, हालै राजा तणी हजूर।
ठाकर – बौत खरी कही बारठजी, पण म्हारलौ बडोड़ौ हीरू, खींवौ भलो रजपूत हौ। उण री सूरवीरता री जद कदैई याद आ जावै तौ छाती नऊ-नऊ ताळ कूदबा लाग जावै। बेटा खींवां सूं म्हारौ जमारौ सुधर ग्यौ। (याद कर नै आंसूं गिरावै) गदर रै जमानै धाड़ेत्यां आपणी कांकड़ रै गांव में माजना री बस्ती पर धाड़ौ कीन्हौ, जद खींवौ 16 बरसां री उमर में हौ। सुणतां पांण म्हारौ सेर तलवार लै जाय बाज्यौ। इसौ घमसांण मचायौ कै पचास धाड़ेत्यां री मूंड़ी मूंडक्या खेत री। जोधौ काम आयौ, पण श्री नारायणजी रै आगै रजपुताणी रौ दूध परमांण कियौ।
बारठजी–
बिन माथै बाढै दळां पौढै करज उतार।
तिण सूरां रौ नाम ले, भड़ बांधै तलवार।
बेटा जायां कवण गुण, अवगुण कवण धियेण।
जो ऊभां धर आंपणी, गंजीजै अवरेण।
(ठाकर बारठजी नै अमल धामै नै बारठजी मान सूं लेवै। इतै में मुकळावा वाळा बेरा माथै आय ठैरै। जिनावरां नै दाणा पाणी करावै नै चिलमां भरै। अेक जणौ ठाकरां कनै आवै।)
माजन – (ठाकर सूं) जै रुघनाथजी री, ठाकर सा।
ठाकर – जै रुघनाथजी, बोलौ, साहजी। कठा सूं आवणौ हुयौ? आगै कठै जावौला? मेह पाणी किसाक है, रिजक किसौक चालै है? राजी तौ हौ? बैठौ, अमल पाणी करौ।
माजन – (हथाळी में रिपियौ धर नै निजर करै) सिरदारां रै चाकरी निजर है। (कीं सोच नै निजर लेवता हुआ) आछौ, श्री परमात्मा जी सहाय करसी। कोई तकलीफ होवै और म्हारा डील सूं मदत बण पड़ै, तौ संकोच मती कीजौ।
माजन – सिरदारां, अठै सीं कोस दस रै आंतरै धुपटौ नांव महारौ गांव है। जात रौ मेसरी वैस हूं। टाबर रौ मुकळावौ करण नै मारवाड़ रै रईवास गांव गयौ हौ। अब मुकळावौ लेय नै बावड़्यौ हूं। आगै दस को धरती उजाड़ पड़ै अर रस्तै चलता मुसाफरां सूं सुणी है कै उजाड़ में रातीवासै धाड़ै रौ डर पूरौ है इण वास्तै राज री सरण आयौ हूं। राज रौ कोई रजपूत बोळाऊ साथै कर दो तौ रस्तै रो डर मिटै।
ठाकर – (गैरै विचार में पड़ नै) साहजी, आपरो कैणौ दुरस्त है, पण..।
माजन – महाराज, आप रजपूत हौ। खित्रवट री ओट री आसा लगाय राज रै कनै आयौ हूं। राज री प्रतिपाळ नहीं करसी, तौ दूसरौ कुण करसी।
ठाकर – बीजौ तौ सोच नहीं, पण सोच जमानै रौ है। बखत घणौ पोचौ आय ग्यौ। रजपूताई री परख नै कांण रही नीं पण तन रैवतां साहजी, थारौ आंटौ तौ निकाळसूं। रातवासै बींद बींदणी सारै साथ सूं म्हारी कोटड़ी में बासौ करौ, तड़काऊ बिदा कर देसां।
माजन – हुकम राज रौ।
तीजौ दरसाव
(मारवाड़ रै जंगळ रौ रास्तौ। आघा सूं खेतां री रुखाळी करणवाळा री अवाज आवै जो ‘काबरिया काबरिया’ करनै पंछियां नै गोफण सूं उडावै है। इण मारग माथै मुकलावा वाळा रौ रथ जा रयौ है नै उण रै आगै ठाकर रौ 16-17 बरस रौ पोतौ बोळाऊ बण नै चाल रयौ है। सामां भूरजी-जुहारजी डकैतां री धाड़ मिळै। वे रथ नै रोकै।)
धाड़ैत - थाम ल्यौ, कुण है? थाम ल्यौ। अेक पांऊंडौ आगै चालोला तौ डील रा दो टुकड़ा कर दांला।
माजन – भाई, थे कुण हौ? किण मतलब सूं आडा फिरौ हौ? गरीब बाणियौ टाबर रौ मुकलावौ कर नै गांव जाऊं हूं थारौ बुरौ भलौ कियौ नहीं, फेर क्यूं रोकौ हो?
भूरजी – म्हे धाड़ैत हां। धन माल सारौ दियां पिंड छूटसी। लुकाव छिपाव करसी तौ जान सूं मारयौ जासी। चूं चपड़ मतना करी। बींद बींदणी नै आघा उतार नै पिरोतजी माराज नै दूरां राख। उणां रै तन पर हाथ घाल नै रजपूताई नै कळंक लगावां नहीं।
बोळाऊ – रजपूताई रौ नांव लाजौ मती। रजपूतां रौ औ काम नहीं है। देस री रच्छा करणी, सतधरम री परतिग्या राखणी, दीन दुखियां रौ टाळौ करणौ, रजपूती रौ तौ ओ बिरद है।
जुहारजी – (हंसनै) भौळौ टाबर! अरै तौ कांई भूखां मरणौ राजपूत रौ धरम है? सिंह सिकार करनै पेट भरै, मांग नै घास नीं खावै। इण जमाना में रजपूती दिखावण रौ बखत गयौ। रिण खेत में वेठ करण रा औसर अलोप हुवा। धरती पगां सूं छूटी। धाड़ा नीं करां तौ कांई कुत्तां री मौत सिड़-सिड़ मरां?
पिरोतजी – आछी मत भिष्ट हुई रजपूतां! राव दुर्गादासजी और अनमी रांणै परताप रौ उत्तम छत्री कुळ इण तरै सूं माथै में धूड़ घालसी, अेड़ी आसा नीं ही। धरती तौ मोटा-मोटा राजवियां सूं छूटी, पण वां देस में धाड़ा डकैती चोरी करनै माजनौ नीं डूबोयौ। मेवाडौ राणौ चित्तौड़ सूं छूट्यौ, बरसां ताई जंगळा में भूखौ तिसायौ भटक्यौ पण आपरै सतधरम सूं डिग्यौ तौ नहीं? दुर्गादासजी सूं मारवाड़ छूटी, पण धाड़ा तौ नहीं मारया। धन्न है उणां रै मात पिता नै रजपूती नांव रा लाजणहारा! थानै लाज आवणी चाहिजै।
भूरजी – पिरोतजी, उपदेश उण नै सुणायौ चाहिजै जिणां नै उपदेस में लगन होवै। भूखौ पेट उपदेस सूं भरै नहीं। अब धनमाल छोड़’र सारा जणां आघा व्है जावौ, नहीं तौ अेक-अेक रौ माथौ बाढ नै धन लेसां। राजी खुसी सूं देदौ तौ थारी भलाई है।
(तलवार काड नै झपटै। दूजा धाड़ैती भी तलवारां काड रथ नै घेर लेवै।)
माजन – आछो भाई, परमातमा थौं देखसी। धन माल जीव सूं बतौ कोनीं। मिनख मतना मारौ, जो कुछ टूम छल्लौ म्हारै कनै है, सो आघौ लो।
बौळाऊ – बोला रौ सेठजी। धरती निछत्री हुई कोनी। म्है भी रजपूताणी रा चूंध्या है। सरीर रैवतां चोरां रौ कांई माजनौ जौ हाथ घालै। पैला म्हारौ डील पड़सी, पछै इणा रै और थारै मन में होवै सो करजौ। (तलवार खैंच नैं) पग मांडौ कायरां देखूं थारी रजपूताई कैड़ीक है।
जुहारजी – अरे कंवरा! क्यूं सूता बैठा मौत नै नैतौ देवौ हौ? ओ भोळापण छोड़ौ। हाल आखी ऊमर थांरै सामनै पड़ी है।
बोळाऊ – रजपूताणी रौ जायौ कई छोटौ नै कई मोटौ?
भोळा जाणौ भूलिया, बरसां आंठां बाळा।
अेक घराणै सीहणी, कंवर जणै सो काळ।
नागण जाया चीटला, सींहण जाया साव।
राणी जाया नहीं रुकै, सो कुळ वाट सुभाव।
(बोळाऊ वार करै। जुद्ध हुवै। दो अेक धाड़ायतिया नै मार नै बोळाऊ पड़ जावै।)
बोळाऊ – (तड़प नै मरतौ हुवौ) अरे कोई जीवतौ पाछो जाय बाबा सा नै कैजो कै थांरो व्हालौ गीगलौ छत्री धरम पाळतौ खेत रैयौ। धारा तीरथ ले नै रजपूत रौ जमारौ सुधारयौ। थे जीव रैतां म्हारा खून रौ बदळौ लीजौ। रजपूत कुळ रा कळंकी इणां चांडाळ चौरां रै लोही सूं म्हारी आत्मा रौ तिरपण कीजौ। हे राम.. (मर जावै)
चौथौ दरसाव
(ठाकर री कोटड़ी। बारठजी अर दूजा गांव वाळा बैठा बातां करै है।)
चारण – पिरथीनाथ! कळजुग में सतधरम रा राखणहार, अथाग बैरियां रा घड़ मोड़णहार, अटळ बचन रा निभावणहार, बलूजी चाम्पावत जिसा वीर थोड़ा हूसी–
बलू कहै गोपाळ रौ, सतियां हाथ सन्देस।
पतसाही घड़ मोड़ कर, आवां छां अमरेस॥
ठाकर – भली कैयी बारठजी! म्हारी आतमा नै घणा सुख रा देवणहार बलूजी चम्पावत रा परवाड़ा सुणावौ।
चारण – (बलूजी चम्पावत री कहाणी कैवै) राठौड़, गोपाळजी रै आठ बेटा। अेक-अेक सूं चढ़ता सूरवीर जोधा। पण बलूजी सारां सूं सिरै। बलूजी नागौर रा महाराव अमरसिंह जी राठौड़ री चाकरी में रैवै। रावजी नै मींढा राखण रौ घणौ सौक। मींढारी चराई में मोटा-मोटा ताजीमी सिरदार बारीबन्द जावै। अेक दिन बलूजी री बारी आई। तद कैयौ, ‘म्हारै ओ काम नहीं।’ सुणकर महाराव जी घणा खीज्या, नै माथा में सळवट घात नैं डोढ में बोल्या – ‘तौ पतासाही घड़ मोड़ नै मोड़ोला जद देखांला।’ बलूजी घणा रीसाणा व्हेनै उठा सूं बीर हुवा। जाती बयौ – ‘पतासाही घड़ मोड़ नै रजपूती परमांण करां जद जाणजौ।’ आयनै पातसाही फौज में घणा कुरब कायदा सूं रैया। अबै, देव संजोग सूं अर्जन गौड़ रा हाथ सूं महाराव जी रौ सरीर पड़्यौ, नै बादसी छळ करनै मिरतक सरीर री दुर्दशा करणी मांडी। ओ अखियात कानां भणक पड़तां पांण बलूजी बचन सांभळ नै चाल्या सो पातसाही फौजां नै चीरनै नागौर गढ मांय सूं रावजी रौ सरीर काढ़ लाया। यूं कळजुग में बचन परमांण किया।(इत्तै में आधा सूं माजन रोवतौ पीटतौ आवतौ दीसै।)
ठाकर – (माजन सूं) सेठ! थारौ ओ कांई हाल? साची-साची कै हुयौ कांई?
माजन – माराज, म्हारौ फूटौ भाग है। धनमाल तौ गयौ सो गयौ धाड़ेतियां रजपूती री कांण राखी नहीं। घणौई कैयौ, पण माजणां में धूड़ घाल्यां बिना नी रैया। कंवरजी पण हठ चढै ग्या, सो घणी वीरता सूं लड़नै काम आया। दो चार धाड़ेतियां नै मार्या नै पांच सात नै घायल किया। पछै श्रीराम सरण हुआ।
ठाकर – (घणै उछाव सूं ऊठ नै कड़कता हुआ) मजौ कर्यौ म्हारा बेटा! कुळ रौ नाम उजागर कियौ। धरम रै काम में धारा तीरथ लेय नै सातूं पीढ़ी रौ नाम राख्यौ। म्हारा लाल (आंख्यां में आंसूं आ जावै) थारै मरण रौ फिकर नहीं। इसी मौत देवता नै ई मिळै नहीं। पण सिंह रा बच्चा नै अेकलो देख’र मिळनै गादड़ा मार्यौ इण रौ घणौ अणेसौ है। (माथै रौ केसरिया साफौ उतार फैंकै अर मैलो-सो सफेद पोतियौ बांध लेवै।)
माजन – माराज! कंवरजी मरती बखत रौ अेक संदेसौ दियौ हो कै बाबोसा नै कैजौ– जीव रैता बदळौ लीजौ, रजपूत कुळ का कळंकी चोरां रै लोही सूं म्हारी आत्मा रौ तिरपण करजौ।
ठाकर – ठीक, अब आ’ई हूसी (ठाकर री आंख्यां में लोही उतर आवै नै रूंगटा ऊभा हौ जावै।)
ठाकर – ठैरजा म्हारा लाल! गादड़ा री नाक काट नै उण खून सूं थारी आतमा तिरपत करसूं। पाताळ लोक तांई तौ पापी चोरां नै छोडूं नीं। श्री परमेसर जी रै आगै रजपूती परतग्या है कै जद तांई महारै लाल रौ बदळौ नहीं चुकाय लेसूं अर माजन रौ धन माल पाछौ बाळनै उण नै नीं दिराय देसूं दत तांई कांसै बैठ नै जींमू नीं, सिर रौ पोतियौ नाखूं नीं (लोगां सूं) म्हारा इण भौ रा साथियां रजपुताई री बखत आई है। बालौ कंवर जी बुलावै है। क्षत्री वचन हुवै। व्है जाऔ तैयार (ढोल बाजै नै राजपूत केसरिया बानौ धार नै आय हाजर हुवै।)
ठाकर – (तलवार उठाय नै) आंटै री भांजणहार, रजपूती री राखणहार, देवी! दुर्गासरूप सिरोही! अब थारौ सरणौ लियौ है। बूढै रजपूत रै डूबता बचनां री थूं डूंगी है। (माथा माथै तुळसी दळ अर साळगराम री मूरत धरता हुवा) माता तुळसी अऱ पिता जगदीस, साळगराम! रजपूती री लाज आपरै हाथ है। औ बूढौ सरीर आपरै अरपण कियौ है। धरम रै काम में औ माटी रौ सरीर पड़सी, इण सूं बदनै रजपूत रै वास्तै सुभ औसर दूजौ कोनी।
(आगै आगै ठाकर चालै अर लारै बाकी रा राजपूत नै माजन जावै।)
सब – (सिंहनाद करै) हर-हर महादेव। (जावै)
पांचमौ दरसाव
(भूरजी जुहार जी डकेतां री छोटी सी गढ़ी रै सामै रौ मैदान। फाटक बन्द है। डकैत छिपनै बैठा है। ठाकर आपरै राजपूतां रै नै माजन रै साथै आवै।)
ठाकर – (ललकार नै) अरे राजपूती रा डूबावणहार कायरां! गीदड़ां री दांई खोह में छिप्यां सूं जान बचै नहीं। नीच चोरां चोरी करनै राजपूती नै खेल खावणहारां! मरद होवौ तौ बारै आवौ। लुगायां ज्यूं पड़दा में छिप्यां सूं प्राण नहीं बचैला। टाबर नै देख’र भली सूरवीरता लजाई। पचासौं मिळनै अेक बाळक री हत्या करी, भली छत्रीपणै में धूड़ घलाई। अब निकळौ बारै, नहीं तौ औ बूढौ सिंह किवाड़ां नै सूखा पान ज्यूं भांजनै, सातवै पाताळ सूं काढ-काढ नै थारां माथौ बाढसी।
(गढ़ी रौ फाटक खुल जावै, भूरजी अर जुहारजी कीं डकैता समेत सामा आवै।)
भूरजी – ठाकरां, राज रौ टाबर घणौ अचपळौ नै हठी हौ। आगौ-पाछौ बिचारियौ नीं नै म्हारा आदमियां रै माथै वार कियौ, तौ म्हानै भी बचाव करणौ पड़्यौ। उण म्हारा आदमियां रै माथै वार कियौ, तौ म्हानै भी बचाव करणौ पड़्यौ। उण म्हारा तीन-च्यार आदमी मार्या तौ म्हांनै भी घाव मेलणा पड़्यौ। इण में म्हांरौ सारौ नहीं और धाड़ौ करणौ तौ रजपूती रौ बानौ है। जिणां री धरती छूटी, उणां नै धाड़ा कर्यां ईज सरै। राजपूत नै मर जाणौ पण मांगणौ भलौ नहीं।
जुहार – ठाकरां, थारै म्हांरै झगड़ौ फकत माजन रै धनमाल रौ है सो सारौ माल पाछौ ले लौ। राड़ री जड़ ईज नहीं है तौ राड़ किसी? रही टाबर रै मरणा री बात, सो जाणबूझ’र तौ मार्यौ नहीं, उण म्हारा आदमी मार्या जद बदळै मे मर्यौ तौ इण में म्हारौ कांई दोस? (अेक साथी नै) जा भाई, माजन री लूट रौ सगळौ माल लिया।
ठाकर – अब दीन बचन सूं छुटकारौ होवै कोनीं। पापियां। थारै माथै राजपूत बाळक री हत्या रौ कळंक मंडियौ है सो खून रौ बदळौ खून सूं जासी। रजपूती धरम री मरजादा मेट नै अेक रजपूत री ओट आयौड़ा माजन नै लूटियौ सो थांरौ गधेड़ापण हुयौ। अब काळ आयौ देख’र कपट करनै भुलावा देवौ सो सारा बिरथा है। जदतांई म्हारा नै म्हारा भाईयां रो सरीर खड़ौ है। तद तांई जीव रै’तां हत्यारा चोरां सूं राजीपौ हुवै नीं। तलवार रौ बदळौ तलवार देसी। म्हे राजपूत हां। राजीपौ कर माजन रौ माल ले नै पाछा फिरां तौ सात पीढ़ी नै कळंक लागै। रजपूती रौ बचन प्रमाण रैवै नहीं। दुनिया माजनै में धूड़ घालै। फेर रणखेत सूं पाछौ पगफेरौ करणौ छत्री रौ धरम कोनीं। अब घणी बीतचीत, टाळमटूळ सीं मतळब नहीं। पग मांडौ चंडाळां।
(ठाकर लपक नै तलवार रौ वार करै। दोनूं कांनी रा जोधा भिड़ै। घणासाण जुद्ध हुवै। ठाकर रै हाथ सूं भूरजी नै जुहारजी दोनूं डकैत मार्या जावै।)
ठाकर – अब म्हारी आतमा तिरपत हुयी। लाल रौ बदळौ चूक्यौ। (माजन सूं) साहजी! लेलौ थांरौ धन माल। सारौ संभाळ कर लेलौ। श्री जगदंबा री किरपा सूं आज सरीर रै’तां बचन प्रमांण किया, इण रौ पूरौ संतोस है।
माजन – माराज! म्हैं बोलबा जोग तौ रह्यौ नहीं। म्हारा दुरभाग सूं राज री घणी हाण हुई। पण धिन्न है राज री राजपूती नै। धिन्न है सत धरम नै। कळजुग में इसै सत धरम रै पांण ई आसमान बिना थंभां खड़ौ है।
ठाकर – साहजी! जो श्री परमेसर जी नै मंजूर ही सो हुई। धन्नवाद तौ श्री नीरायणजी नै है, जिण म्हारा सत री लाज राखी। नहीं तौ म्हैं किण लायक हूं? अब सेठ जी आप बींद-बींदणी नै ले नै निसंक गांव पधारौ। चालौ म्हैं आपनै पुगाय दूं।
माजन – धिन्न है आपरी ठकरायत नै। राज रौ निरमळ जस जुग-जुगां तक अटळ रैसी।
ठाकर – म्हैं तौ पाका पीपळ रा रूंख दांई हम्मै घणा दिनां रौ नहीं पण इण बूढा पीपळ री छयां में घणा मुसाफरां सरण लीवी है। मन में अेक बात रौ संतोष है कै पिरथी में म्हारौ, म्हारा बेटा नै म्हारै पोतां रौ नाम परमाण रैसी।
चारण – माराज! संसार में सारी चीजां नासवान है। आज तक तौ म्हैं राज नै बीजा-बीजा रजपूतां री वीरता रौ बिरद नै परवाणा सुणावतौ पण आज सुरसती मात री किरपा सूं राज रा आंख्यां देख्या हाल बखाण करसूं।
ठाकर – भलां, बारठजी! धिन्न भाग म्हारा नै म्हारै कुटम रा जो म्हां कवेसरां री वाणी में अस्थान पायौ। हमैं कीं बात री इच्छा नहीं रयी। परमात्मा उठा लेवै तौ आछौ।
चारण – (दूहा सुणावै)
जिण मारग केहरि, बुवा, रज लागी तिरणांह।
वे खड़ ऊभा सूखसी, नहीं चरसी हिरणांह॥
अठै सुजस, प्रभुता उठै, अवसर मरियां आय।
मरणौ घर रै मांझियां, जम न नरक ले जाय॥
(सुणतां सुणतां सारां रौ जाणौ।)