पात्र

काकौ – गांव रौ अेक भलौ डोकरौ
रामानंद – जमींदार
रामसिंघ – अेक राजपूत
दयाळू (सूदखोर) – अेक बो’रौ
हणवंत – अेक जाट
हरीराम, भोळौ, पार्वस, अब्दुल, बसंती, पारबती, गवरी व दूजा गांववाळा



अब्दुल – गवरी! थूं ईं कानी आजा। म्हैं थारै वास्तै चोखी जगां रूध राखी है। थूं कित्तौ’क सूत कात्यौ आज?

गवरी – हाल तौ चार पूणी काती है। कंईं करूं औ चंदण म्हांसूं माथा फोड़ी करबौ करै; काम ई नीं करण देवै। चा’वै कै म्हैं वींरै कनै बैठी रैवूं पण म्हनै वींरी सौबत नीं सुवावै।
(गवरी रै नैड़ी आवण री आवाज)

अब्दुल – क्यूं? थूं वींरै कनै क्यूं नीं बैसै?

गवरी – नहीं अब्दुल भाई! वो काका रौ हुकम नीं मानै नै आठ पौर कूड़ौ बोलै। सयाणा मिनखां रौ कैणौ है कै काळिया कनै गोरियौ बैठै, जद रंग नीं तौ लक्खण तौ आवै ई आवै। (रुक’र) अरै! काकौ आवै। (पगां री अवाज)

काकौ – अरौ टाबरां! थे हाल तांईं मांयनै नीं गया? जावौ मांयनै। देखौ कोनी कैड़ी डांफर चालै है। गवरी! औ म्हारो चरखौ ठिकाणै मेल दै, बेटा। (गवरी रै ऊठण री नै चालण री अवाज। हरीराम हांफतौ-हांफतौ आवै।)

काकौ – अरै हरिया! सूखै पत्तै ज्यूं क्यूं धूजै है रे?

हरीराम – काका! काका! गांव में राड़ हूयगी! राड़ लाय ज्यूं बधगी है। दोनूं कानी सूं तरवारां नै बंदूकां निसरगी है!

काकौ – (हाथ ऊंचा कर’र) या खुदा! थूं सगळां पर रैम कर! हरिया, सयाणा, गैलां नै गैला कैवै पण अठै सयाणा भी गैला हुवा फिरै है। छोटी-छोटी बातां सारू खून-खराबी करण नै उतर जावै।

हरीराम – राड़ री जड़ है अै दोनूं कुजीव; अेक औ सूदखोर, जिकौ जाटां नै भड़कावै, अर अेक वो’ ठाकर रामसिंघ अै दोनूं काचर रा बीज है!

काकौ – जो जिसा बोसी, वो उसा पासी। हालौ।

हरीराम – लो, अै गैला-गोधा अठीनै ईज आ रैया है।
(भीड़ रै आवण री आवाज। घणां-जणां री बोलियां सुणीजै)

रामसिंघ – म्हैं थनै जान सूं नीं मारूं तौ म्हारौ नाम रामसिंघ नीं। म्हनै रजपूताणी रौ जायोड़ौ मत जाणजै!

हणवंत – म्हैं थारी बोटी-बोटी चीलटियां नै नीं नुचवादूं तौ म्हनै जाटणी रौ दूध चूंघियोड़ौ मत जाणजै।

सूदखोर – अरै ईं जबानी जमा-खरच में के राख्यौ है? थूं तौ आपणै रमानंद रौ हुकम मान’र करदे वारा न्यारा!

रामसिंघ – ओ, जाटणी रा जायोड़ा!

सूदखोर – देखै के है, हणवंत! टकै-पइसै री चिंता कीजै मती। हाइकोरट तांईं लड़सूं, पण थूं इयै तीसमारखां रौ पाणी उतारदै।

रामसिंघ – सेरसिंघ! पन्नेसिंघ! जालमसिंघ! टूट पड़ौ। देखौ कंईं हौ!



(दोनां रै आगै बदणा री नै भिड़ण री अवाज। जणैईज काकै री भारी आवाज गूंजै।)

काकौ – रुकौ! म्हैं कैवूं रुकौ! बावळा नीं बणौ। (सरणाटौ) म्हैं थां लोगां री लीला देख चुकौ हूं। बात में लूण न लक्खण, पण त्यारी खून खराबी री। चुल्लू भर पाणी में डूब मरौ।

रामसिंघ – काका, थे बीच में मत ना आवौ।

हणवंत – काका, आज ईंनै आपरै मन री काढ़ण दै।

काकौ – छिः छिः छिः कंईं बात है?

हणवंत – काका, इणै म्हारै खेत रौ पाणी रोक्यौ है। इणै म्हारै नाळै रौ पाणी काट्यौ है।

काकौ – पण इण में खून-खराबै री नौबत किंयां आयगी? न्याव अर कुन्याव रै वास्तै कोट-कचैड़ी पड़्या है, पंचायत पड़ी है, फेरूं थे न्याव नै आपणै हाथ में किंयां ले रैया हौ?

हणवंत – औ रामसिंघ, ठाकर रै हाथ रौ झुंझणियौ है। वो मरजी आवै ज्यूं ई नै बजा देवै।

काकौ – जो धतूरा बावैला वीं नै मतीरा नीं मिळैला। जो आपणी बुध सूं नीं सोचैला, वो अेक दिन दूजै री ढाळ बण’र आपणौ ईज नास करैला। राड़ पाणी री ईज है?

हणवंत – करसां रै वास्तै तौ पाणी ईज परमेसर हुवै।

काकौ – जाणूं हूं, पण इण रै वास्तै तरवारां नै बन्दूकां ले’र मानखै नै लजावणौ, वीं परमेसर रै हिवड़ै नै दुखावणौ है। वो आंपां नै चोखा काम करण रै सारू जलम दियौ है। हणवंत! रामसिंघ! आंपां सैंग रा सैंग ई खातर संसार में नीं आया हां कै लोग आंपां पै थूकै। अपारै जीणै में जणै ईज भदरक है जद आंपां खुद नै छीजाय’र दूजै नै पणपावां, जद खुद री मौत सूं दूजै री जिंदगी बणा सकौ तौ जीवण सफल जाणौ।

हणवंत – काका! थारै सामै नीं बोल सकूं। सोची तौ अणूती ईज ही पंण थे जो भी कैदोला, म्हनै मंजूर हुवैला।

काकौ – अर रामसिंघ, थनै?

रामसिंघ – म्हैं किणी पंचायत-फंचायत नै नीं मानूं। म्हैं तौ औ पाणी लेवूंला ईज।

काकौ – आ हठधरभी कुनाव है। रामसिंघ, इतरौ विचार लीजै कै खोटै रौ फळ खोटौ ईज हुवै। थोड़ोक सोच, जद ईं गांव रा सगळा मिनख थारै बिरुध हुग्या तौ थनै कीं रस्तौ नीं सूझेला। लैणा रा दैणा पड़ जावैला अर कानून थनै...

रामानंद – रामसिंघ की कोनीं मानै। वो राम रौ बंसज है, मूंडै सूं जिकौ निसरग्यौ वो अबै पूरौ ईज हुवैला। (काकै री तरफ) काका! थूं या भोळा भाळा गांववाळां नै उल्लू बणाय सकै। इणां नै बडेरां री लीक सूं हटा सकै। सोवणा सपना में बिलमाय’र खेतां नै मसीनां सूं नास करा सकै, सैकारिता रै नाम सूंपरजा नै ठग सकै, पण म्हनै थांरी चालां नै..

हणवंत – (बीच में) चुप रौ ठाकरां! काकै रै सामै कोई अणूतौ बोल निसरियौ तौ ठीक नीं रैवैला।

रामानंद – सांची बात सूं किसोक चिड़कौ लाग्यौ।

हणवंत – सांची तौ म्हैं कैबूं; थूं वो ईज है नीं जिकै अेक दिन काळै धाड़ेती रै नांव सूं गांववाळां रा बळद चोरिया हा! थूं वो ईज है नीं, जिकै चौधरी बिजै चंद रै अठै धाड़ौ पड़ायौ।

रामानंद – (चिल्लाय नै) हणवंत!

हणवंत – सांची तौ अबै कैवूंला कै थूं गाय जैड़ी सीधी-सादी गवरी और पारबती रै बाप रा धन रै लोभ में..

रामानंद – हणवंत! जबान रै लगाम दै, नीं तौ छर्रे सूं चालणी कर दूंला!

हणवंत – मिरत्यूं रै बाद भी पाप पिंड कोनीं छोडै। छायां री तरियां लागोड़ा रैवै। पापी नै घड़ीक सुख संतोस सूं नीं रैण देवै। म्हैं थनै अेकर फेरूं कैवूंला-ठाकर सा, बीती नै बिसार दो। बिसार दो ढोलणियां री रमक-झोळां नै अर पातरियां री मैफलां नै। वै रात रा सुपना हुग्या है। तरकस सूं तीर, मूंडै सूं जबान अर गयोड़ा समै पुणै नीं आवै। ठाकर सा, अबै थे रियाया नै नीं सता सकौ।

काकौ – हणवंत, सांची कैवै है, रामानंद! सांचैई सैं बदळग्या है– जमानौ अर बखत! अबै आंपानै रिळमिळ रैणौ चाहिजै। प्रेम में ईज आंपां रै जीवण रौ सांचा सुख नै संतोस है। प्रेम ई दिनूगै रौ चानणौ अर रात री मधरी बयार है। प्रेम ई सगती अर रोटी है। अबै प्रेम नै ईज सगळां सूं मोटौ ईसर अर खुदा मान’र चालणौ चाहिजै।

रामानंद – बकबक बंद करदै! हालौ रामसिंह अबार, फेर देखसां। गांव में आच्छौ मात्मा परगट्यौ! सगळा नै साधू बणा’र ईज छोडसी। (सगळा फुसफुलाता हुवा जावै। थोड़ीक सांती)

काकौ – (गळगळै सुर में) प्राणी अेक बीजै सूं क्यूं नीं प्यार करै? क्यूं नीं हुळसावै? जद तांईं वो सांचौ सुख नीं पावै। (बिनती रौ सुर) खुदा! आपणै यां बन्दां माथै रैहम कर, इणां नै प्रेम रै पंथ सूं मत हटा। जिकी मंजळ म्हैं पौंचणौ चावूं, म्हनै उण मंजळ तांई पुगा दै।
(गवरी आवै)

गवरी – (हांपती) काका! काका!

काकौ – के हुयौ गवरी लाडौ!

गवरी – सुणौ काका, मां रोवती ई जा रैयी है!

काकौ – (अंचभै सूं) मां रोवती जावै?

गवरी – हां, काका, मांयलै ओरळियै में राम जाणै के बड़बड़ करती सुबका भरण लागी? पारबती भी घर में कोनीं। म्हैं अेकली आकळ बाकळ हूंगी!

काकौ – जा, थूं बेगी-बेगी थारी मावड़ नै अठै लि’या।

गवरी – अबार लाई। (जावै)

काकौ – आज दिनूगै-दिनूगै कीं रौ मूंडौ दीख्यौ कै अेक ऊपर अेक बला आवै है। कुण हुसी?
(पार्वस रौ प्रवेस)

पार्वस – म्हैं हूं काका, पार्वस। थामस जोन रौ बेटौ।

काकौ – आ लाडेसर! आ, आज कियां रस्तौ बिसरग्यौ?

पार्वस – डैडी रौ जुकाम जावै ई नीं। घणी ई दवाइयां लायनै दीनी पण असर नीं हुवै। उलटी धांसी बदगी। अबै थे कोई देसी दवा देवौ, काका!

काकौ – इंगरेजी दवाइयां सूं धाप नै देसी दवा कानी जोवौ। खैर, म्है तौ म्हारी फरज पूरौ करूंला ई। (अेक डब्बै में सूं दवा दे’र) आ’ दवा, तातै पाणी सूं दे दीजै। सुण थारै डेडी नै कैजै कै वै अबै दवा कम, अर गिरजै में भजन घणा करै।

पार्वस – चोखौ काका! पा लागी। (जावै। गवरी आवै)

गवरी – काका, मां बारणै ऊभी है।

काकौ – क्यूं? बीं नै मांयनै लिया।

गवरी – (हेलौ मारै) मां! मांयनै आजा। (बसंती रौ प्रवेस)

काकौ – भैण! क्यूं रोवै है? थारा डाबर नैण म्हां सूं नीं देख्या जावै।

गवरी - काका, मां गूंगी बणगी है। पारबती भी कुण जाणै कठै फरलंग हुगी है। म्हैं आज वीं रा लत्ता लैन्हांकूं।

बसंती – थारी चप्पर-चप्पर बंध हुवैला कै नहीं?

गवरी – फेरूं थूं हुळसावै क्यूं नीं?

काकौ – के बात है बसंती?

बसंती – (गवरी सूं) थूं जा। (गवरी जावै) काका, थे म्हारा धरम रा भाई हो। थारै बिना म्हैं सिंझ्या-दिनूगै चुल्हो नीं बांळ सकूं। म्हारौ हियौ कांप रैयौ है।

काकौ – बात के है? सांची-सांची कै न्हाक।

बसंती – काका, म्हनै पारबती रै मारै दुख लागै। पतौ नीं, पणघट री पिणिहारियां के ऊंधा सूंधा बोल बोलै, कै सुण’र काळजौ धुखण लाग जावै।

काकौ – लुगायां रै रांड-राड़ कै सिवा कै हुवै? दो भेळी हुई, कै गटरगूं-गटरगूं करण लागी! पण चोखौ मिनख, नीं तौ भूंडौ सुणै, नीं भूंडौ देखै नै नीं मूंडौ बोलै। वो आपरै हियै सूं हर चोखीं भूंडी बात री सच्चाई नै परखण रौ जतन करै। पारबती थारी खाली बेटी ईज नीं, आपणै गांव री लाज भी है।

बसंती – काका, गरीब री बेटी आपरै धरम रै सागै जीलै, आईज बड़ी बात है।

काकौ – भैण, म्हनै पारबती माथै बडौ भरोसौ है। चांद में दाग हू सकै पण उण में नीं। वा थारी बेटी है, वीं री रगां में थारौ रगत है, वो कदेई पाणी नीं हौ सकै। थूं चिंता-फिकर नै मार लट्ठ!

बसंती – काका! पारबती रै बाप री हित्या रै बाद म्हारौ मन घड़ी-घड़ी ऊंधी-सूंधी सोचतौ रैवै। अैड़ौ लागै कै कोई धाड़ेती म्हारै आंगण रै मोद अर हुळास ऊपर निजर जमायोड़ौ बैठौ है। वीं नै खोसण रौ जतन करै है। वो म्हारी लूमती-झूमती बगिया नै उजाड़णी चा’वै। (धीमी सुबक्यां)

काकौ – मिनख रै चायां के हुवै है? ईसर री हजारां आंख्यां आपणै चोखै कोजै काम नै देखै है। मिनख भूंडौ कर’र सुख नीं पावै। जो पाप उण किया कराया है, वे उण री आतमा री सगळी अवाजां ऊपर सवार होय’र बोलै। पचार नीं राख सकै कोई आपरै पाप नै! थारै धणी री जिण दुष्ट हित्या की है, वींनै अेक दिन कानून रै सामै समरपण करणौ ईज पड़सी। फेरूं लीली छतरी वाळौ कैनै ईज माफी नीं देवै। रौ मत भैण थारौ दरद ई थारी बेटी मांयें जोस भरियौ है, हिम्मत वख्सी है। देखै कोनी, कै वा रात गिणै ना दिन, तेली रै बळद ज्यूं मैनत में जुटी रैवै। बीं रै ईज खून-पसीनै सूं थारौ खेत हर बरस मोत्यां जैड़ा दाणां सूं लूमै, माथै तांईं सिट्टां सूं झूमै। थ्यावस राख। हिम्मत नै मती तोड़।

बसंती – काका! सुणीजै कै वा भोळै..

काकौ – हां वा' भोळै सूं प्यार करै अर प्यार करणौ कोई दोस कोनीं। रैयी इज्जत री बात सो थूं लांबी ताण सू’जा। अैड़ौ बिरथा बैम बिसवास थारै कनै ईज नीं फटकण दै। हां म्हैं भोळै सूं जरूर बातचीत करूंला, वीं नै कैवूंला कै वो पारवती सूं ब्याव करलै।
(किंवाड़ खड़कीजण रै सागै सूदखोर रौ थोथौ हंसणौ सुणीजै)

काकौ – कुण हुवैला?

सूदखोर – काका, आपरौ चाकर दयाळू गरीब करसां रै माथै सदां सुरंगी दया दरसावण वाळौ दयाळू राम!

काकौ – कियां पधारणी की?

सूदखोर – पधारणी? काका, थे भी कदैई म्हांसू मसखरी कर लेवौ। जीवती माखी गिटलौ। आ’ सगळा जाणै कै दयाळू कैंकैई क्यूं अर किण वास्तै जावै?

काकौ – ओ! इण में भी?

बसंती – (बीच में) हां, काका, अेक वार पारबती मांदी पड़गी ही, जद म्हैं यां कनां सूं बीस रिपिया उधार लिया हा।

सूदखोर – अबै बीस रा बढ’र तीस हुग्या है। बसन्ती भैण, पूत कमावै अेक पौर अर ब्याज कमावै आठूं पौर। बेगाबेगा दे दीजै नीं तौ बीस रा पूरा चाळीस हु जावैला। फेरूं भी देणै में ढील की तौ पूरौ नंबरी नोट!

काकौ – दयाळू! औ धन थूं किण रै वास्तै भेळौ करै? थारै ना आगै है ना पाछै। अेक अेकलौ छड़ौ है।

सूदखोर – काका, म्हैं सोचूं हूं कै अबार परणीजूंला, तौ घरै बींनणी पधारैला, बींनणी रै टाबर टींगर हुवैला, टाबर बडा होय’र मोटयार हुवैला, फेरूं वां सगळां नै परणावण रै वास्तै कळदार भांगौ! सोचौ थे, स्याणा हौ, म्हारा सैंग रिपिया खरच नीं हुजावैला? ना काका ना! म्हैं इण झमेलै में नीं पडूं। म्हनै म्हारा रिपिया ईज चहिजै! भज कळदारम… भज जावैला!

सूदखोर – (जोर सूं हंसै) काका! हूं इतौ भोळौ कोनीं। मरणै सूं पैला म्हारै धन नै अैड़ी जगां लुकानै जावूंला कै कीनै पतौ ईज नीं लागै अर उण पर काळौ नाग बण’र फुंकारूंला! (थोड़ोक रुक कर) काका, धन म्हारौ परमेसर है, सान्ती है, मुगती है। सुण पारबती री मां, बोवणी करावै? पैलड़ौ थारै अठैईज आयौ हूं?

बसंती – अबार म्हारै कनै रिपिया कठै? अब की फसल में आपरा सैंग रिपिया घर-बैठा पुगा दूंला।

सूदखोर – (हंस’र) थे तकलीफ मत कीजौ। म्है खुद ईज आ जावूंला। (थोड़ोक रुक’र) के बतावूं काका! म्हनै म्हारै दैणायत रै घर तकाजौ करणै में बौत मजौ आवै। (सुर बदळै) अर क्यूं नीं आवै? वो म्हारै सामैं हाथ जोड़’र गिड़गिड़ावै, आंसूड़ा टपकावै, पण अेकदम घड़ियाळी! कौल करै, पण कूड़ा! (थोड़ोक रुक’र) अर थे सुणौ तौ सरी, वो भोळै रौ बच्चौ, गांव में नुंवौ जुग लाणै री लांबी-लांबी बातां करै, पण पईसा रा दरसण नीं करावै! जद बाप नै आंगण में पसारियौ तद पांच सौ रिपिया नगद-जात लिया हा, हालतांई अेक फूटी कौडी भी नीं दी। ब्याज समेत सात सौ पचीस रिपिया हुग्या है।

काकौ – ब्याज भी थूं कुणसौ सांचौ जोड़ै? दयाळू! म्हैं थनै कित्ती बार कैयौ कै थूं थारा सैंग रिपिया देस रै नव निरमाण में लगा दै, पण थारै कानां पर जूं ई नीं रेंगै। थोड़ोक सोच, म्हारा भाई! आपणै देस री माटी नै सजावण नै घणैई धन री जरूरत है। जद वा सोळै सिणगार करनै अपांरै सामै आवैला तद माटी सोनौ हुजावैला। आपणां खेतां में सोनौ निपजैला!

सूदखोर – म्हनै माटी नै सोनौ नीं बणाणौ, काका! माटी आपरै सागै सोनै नै भी माटी बणा दैला! क्यूं पारबती री मां, म्हैं अबै कद आवूं? अबकी खाली हाथां नीं जावूंला। (थोड़ोक रुक’र) अर वो भोळौ है न, थारी लाडेसर बेटी रै सागै (ही ही हंसता है)

काकौ – चुप रै दयाळू!

सूदखोर – कैड़ी लागी काळजै माथै! थारौ चोटी-कटियौ चेलौ है नीं वो, वीं री निंदा थूं कियां सुणै? ना सुण! कानां में तेल न्हाकलै! अर हां, म्हैं थारै कैणै मुजब मुंडौ सीलूंला, पण सगळै गांव री जबानां रै ताळौ किंयां लागैला? आज ई दिनूगै मैं दोनूं जणांनै रेत माथै.. राम.. राम।

बसंती – दयाळू जी, थे चल्या जावौ!

काकौ – म्है अबार जा’र भोळै सूं ब्याव री बात कैसूं! थूं किणी बात री चिन्ता मती कर पारबती री मां!

सूदखोर – पण काका, पैला वीं नै म्हारा रिपिया चुकाणा पड़ैला। फेरूं ब्याव रचसी म्हैं उण सूं आ लिखा-पढी करी है कै पैलां म्हारा रिपिया देवैला, पछै फेरा खावैला!

बसंती – पण म्हैं कैवू हूं– थे अठै सूं बेगा पधारौ, साहूकार जी!

सूदखोर – म्हैं चल्यौ जावूंला थारी लाडेसर... (हंसतौ-हंसतौ जावै)

बसंती – काका, म्हारी ईज्जत कीकर बचैला? इण गांव में म्हारौ आपरै सिवा कुण है? आप ईज म्हारा माइत हौ! आप म्हारी चिंता मिटावौ।

काकौ – (दुख सूं) मिट जावैला, मिट जावैला। म्हैं थारी पारबती रा हाथ जरूर पीळा कराऊंला। जरूर कराऊं ला। थूं जा बेटी जा (बसंती जावै)

(झुंपड़ी में काकौ इणगी-उणगी घूमै। हळवौ-हळवौ पून तेज हुवै.. सागै अंधारौ हुजावै अर काकौ मांयनै जाय’र लालटेण लावै।)

काकौ – आज औ अणचीतौ तूफान किंयां? तूफान भी इत्तौ लांठौ कै म्हारी प्यारी बगिया री लैराती कंवळी-कंवळी कळियां भी दरद सूं धूजण लागगी है। (बकरी मैं..मैं.. करै) अरै! म्हारी बकरी बिटिया भी तूफान सूं ऊठगी है! ! क्यूं ऊठै लाडेसर! थोड़ीक देर में सैंग चल्या जावैला। (गाय रंभावै) म्हारी गाय मावड़ी भी रंभावण लागगी है। आवूं मां, अबार आयौ। थूं म्हारै जीवण री सांची साथण है। (मांयनै जा’र पूठौ आवै) तूफान! भ्हौत लांठौ तूफान! पण औ सैताण जिसौ डरावणौ अंधड़ भी थम जासी। देखै नी, उण पिच्छम री नागी काया न, इसौ लागै कै वीं रौ धूड़ भरियोड़ौ ओढ़णौ उडग्यौ हुवै? (संगीत) अरै! औ ओढ़णौ भेळौ हुवण लाग्यौ! (आडौ खड़कीजै) कुण हुवैला?

भोळौ – (मांयनै आ’र) औ तौ म्हैं हूं, भोळौ! (हळवां-हळवां अंधड़ थमै) काका, पा लागी!
काकौ – जीतौ रै बेटा! आ, बैठ।

भोळौ – काका, आज रै थोड़ैक अन्धड़ सामत मचादी, घणोई नुकसाण हुयौ हुवैला?

काकौ – जरूर! इण तुफान नै देख’र म्हनै मिनख रै हिये रै तूफाण री याद आजावै? अैड़ौ ईज तूफाण म्हैं आज पारबती री मायड़ रै हिवड़ै में देख्यौ। इतरौ भीसण तूफाण म्हैं धरती माथै नीं देख्यौ!

भोळौ – अैड़ौ के दुख हुग्यौ वीं नै?

काकौ – दुख? म्हारा लाडेसर! जियां बडै भाटै रै नीचै दब्योड़ै प्राणी नै दुख हुवै बियां अेक मोट्यार बेटी री मां नै हुवै है। देख! अन्धड़ थम ग्यौ। चांद ऊग ग्यौ म्हारी अेक बात थ्यावस सूं सुण, थूं पारबती सूं प्रेम करै?

भोळौ - ईं सवाल रौ के उत्तर दूं? म्हैं वीं नै भ्हौत चावूं हूं। म्है वीं प्रेम नै आखरां नै नीं ढाळ सकूं। वा अेक मून अनुभूती है, अेक आतमा रौ मून संगीत है।

काकौ – जद प्रेम कविता अर संगीत बणण लागै तौ उण में अेक मिछा जनमै, अेक नवी तड़प जागै। उण तड़प रौ नतीजौ मिळण में हुवणौ चाहिजै।

भोळौ – पारबती म्हारौ जीवण है! म्हारै बूकियां रौ बळ है! म्हारै होठां री हंसी अर म्हारी आंख्यां रौ चानणौ है!

काको – जणै ईज म्हैं कैवूं हूं कै आपरै प्राण नै आप सूं अळगौ नीं राखणौ! थूं पारवती सूं बेगौ बेगौ ब्याव करलै। इण ब्याव सूं मां रै हिवड़ै रौ भाटौ हट जासी अर थे दोनूं कड़ी बदनामी सूं बच जासौ।

भोळौ – आप ठीक फरमावौ हौ, पण ब्याव रै पछै मिनख री कित्ती जिम्मेदारी बद जावै है! अर थे जाणौ ईज हौ कै म्हनै सूदखोर रा घणा सारा रिपिया देणा है। जद तांई नीं परणीजूंला।

काकौ – औ कौल झूठौ है। अैड़ा वादां में लूण लखण नीं दीसै। जिण वादै सूं मिनख जात रौ आछौ हुवै, उण वादै नै ईज पाळणौ चाहिजै।

भोळौ – पण काका! म्है म्हारी परतिग्या नीं तोड़ सकूं। म्है पैली उणरा रिपिया चुकावूंला, फेरूं पारौ सागै फेरा खावूंला। आछौ काका म्हैं जावूं।

काकौ – अब अठै ईज सूयजा, बेटा!

भोळौ – नहीं, काका, चांद रै निकळियां सूं मारग आसाण हुयग्यौ; अर हां काका अपांरी नवीं सड़क घणखरीक बणगी है, तीन दिनां री और मैनत, पछै गांव अर सैर रौ भायलापण पूरौ पक्कौ हुजासी।

काकौ – हूं भगवान सूं अरदास करूं कै आ सड़क बिण बाधा रै पूरी हुजावै।

भोळौ – प्रणाम काका!
(संगीत)

काकौ – आ’ के परतिग्या है! भोळौ पारबती सूं ब्याव जदै ई करैला जद वो दयाळ रौ सगळौ करजौ चुका दैवैला। सगळौ करज! कठां सूं लाऊं इत्ता रिपिया? (सोचै) औ रिपिया रोजीना दो मनां रै बीच बण्योड़ा रैया है। (इत्तै में ‘आग-आग’ रौ हाकौ सुणीजै)

काकौ – आग! कैड़ी आग।
(हरीराम रौ आवणौ)

हरीराम – काका, गायां री घास री ढिगली में आग लागगी। म्हैं बरबाद हुग्या!

काकौ – कुण आग लगाई? कुण इसा नीच करम कर सकै?

हरीराम – दोसी भी हाथ लाग ग्यौ। वांनै लोग पकड़’र आपरै कनै लाय रैया है।

काकौ – कुण है इसौ बदमास जिकै किसाणां री सगती बळद अर उणांरी प्यारी मां गाय रै मूंडै सूं नीरौ झपटयौ?

हरीराम – जमींदार रौ भायलौ, रामसिंघ!
(हल्लौ-गुल्लौ बढ़ै अर केई आदमी मांयै आवै)

पैलो आदमी – इणनै मार-मार’र मुड़दौ बणाय दौ। इण नीच नै जीवतौ राख्यौ तौ गांव नै तैस- नैस कर देसी।

अेक लुगाई – हे राम! इण पापी नै आंधौ करदै। इण म्हारौ सुख अर संतोस लूट लियौ।

सब लोग – मारौ! मारौ! मारौ!

हरीराम – काका मियां।

कुछेक लोग – काका मियां! काका मियां! म्हे बरबाद हुग्या!

काकौ – पैली रामसिंह नै म्हारै सामै लावौ। हणवंत सारां नै कैयदै कै सांत हुजावै।
(रामसिंघ रौ आवणौ)

हणवंत – काका! आज हूं जमींदार रै घरै लाय लगाय छोड़ सूं। जलम भर हूं कैद में चाकी चलाऊं, पण इण मुलक रै दुसमण नै अबै जीवतौ छोडूं कोनी!

काकौ – हणवंत, आफत रै मांय जिकौ आदमी आपरौ धीरज अर ग्यान कोनीं छोडै, वो सांच रै मरम नै जाणै। वौ फेरूं कोई अैड़ौकाम कोनीं करै, जिण सूं दूसरां नै दुःख पौंचै। बोल, रामसिंघ! थूं औ क्यूं कर्‌यौ?

रामसिंघ – म्हैं? म्हैं औ कोनीं कर्‌यौ।

भोळौ – झूठौ बोलै है ठाकर! म्हैं थनै म्हारी आंख्यां सूं आगी लगातां देख्या है।

हणवंत – काका, औ वो ईज है जिकै अेक दिन गांव री पुळ नै उडाणी चा’यी। अेक दिन जमींदार रै भड़कावणै में आय’र इण अठै रै गरीब किसाणां नै सैकारिता रै उल्टै भड़काया हा अर जाती रै नांव माथै आप जिसै देवता नै नीच, कमीण अर स्वार्थी कैयौ! आज काका म्हनै छोड़ौ! हूं–

केई लोग – थूं अेकलौ नीं, म्हें सगळा इणनै मारसां। मारौ.. मारौ.. मारौ।
(चोट लागै)

काकौ – (चिरळाय’र) रूकौ! हूं कैवूं कै रूकौ! नीं तौ हूं म्हारौ माथौ अठैई फोड़’र जान दे दूंला! (सांती) दोसी नै यूं सजा देणी अन्याव है। संजा रै वास्तै कानून है। रामसिंघ, साच-साच बता थैं औ क्यूं कर्‌यौ?

रामसिंघ – काका! काका! हूं निरदोस हूं! म्हैं इसौ कोनीं कर्‌यौ!

काकौ – फेरूं कुण कर्‌यौ? ..हूं।

रामसिंघ – काका, हूं मसाळ लेय’र अवस आयौ, पण हूं थारी सौगन खावूं कै म्हैं आग कोनीं लगाई।

हणवंत – नाटक कित्तौ आछौ करै है! ठाकर पैली रजपूत रौ बाळक झूठ कोनीं बोलतौ।


रामसिंघ – हूं झूठ कोनीं बोलूं। हूं सौगन खाय’र कैवूं कै म्हैं आग कोनीं लगाई।
(जमींदार रौ आणौ)

रामानंद – कंईं बात है काका? अरै रामसिंघ! थूं इसौ नीच करम क्यूं कर्‌यौ? ठाकर हूय’र इत्तौ गिरग्यौ! गाय माता रौ भोजन खोस लियौ! छि..छि..!

रामसिंघ – रामानंद! थे ईज तौ म्हनै आग लगाणै रौ कैयौ, अबै खुद..

रामानंद – म्हैं? (हंस’र) आछौ, बौत आछौ! हूं थनै खूब जाणूं। आज दौपारै थूं के कैर्‌यौ हौ– हूं गांव नै बरबाद कर दूंला!’

रामसिंघ – काका, काका! इण ईज म्हनै आग लगावण रौ कैयौ।

काकौ – म्हैं अेक दिन केयौ हौ कै जिकौ आदमी आपरी अकल सूं काम नीं करै, वो अेक दिन दूंजा री ढाल बण’र आपरौ तैस-नैस करावै।

भोळौ – देखौ काका आ दूजी मसाळ अठै पड़ी ही। म्हैं इणनै कपड़ै में समेटी। इण माथै आंगळियां रा निसाण है। मालम हुवै कै अेक आदमी और हौ। बता रामसिंघ, वो कुण हौ?

रामसिंघ – म्हनै मालम कोनीं, भोळा! म्हूं इत्तौ अवस कैह सकूं कै आ’ आग म्हैं कोनीं लगाई। जमींदार म्हनै जरूर कैयौ। हूं आयौ, पण इसौ नीच करम करतां म्हारी आतमा कांपगी अर म्हैं

जमींदार – औ झूठ बोलै। औ बडौ कमीणौ है! औ म्हनै जाण बूझ’र बदनाम करावै। थनै गोळी सूं मार दूंला, समझ्यौ!

रामसिंघ – जमींदारां! अबै हूं समझ्यौ कै थारै कोई थांरौ कोनीं। ना कोई भायलौ, ना कोई थारै भाई। थांरै जे कोई है तौ वो स्वारथ है। पण हूं चुप कोनीं रै सकूं। काका! हूं आपरा पग पकड़’र कैवूं कै हूं बौत बडौ गुनैगार हूं। म्हैं गांव रै लोगां नै भ्हौत सताया। हूं बडौ पापी हूं अर इण रामानंद रै कैणै सूं म्हैं मोटा-मोटा पाप कर्‌या अर आज औ म्हनै मारण नै धमकावै? पण औ कमीण आ कोनी जाणै कै हूं अेक इसौ भेद जाणू हूं जिकौ..

रामानंद – रामसिंघ! हूं थारी जुबान काट दूंला! हूं चालूं–

हणवंत – थूं कोनीं जा सकै, जमींदार! भोळौ पुलिस नै लेवण ग्यौ हौ। म्हांनै भी ब्यान देणा है।

रामानंद – हूं ब्यान-व्यान कोनीं दूं।

काकौ – रामानंद जी, जद आप कोई गुनौ कोनीं कर्‌यौ तौ फेरूं क्यूं डरौ हौ?

रामसिंघ – इण गुनौ कोनीं कर्‌यौ? इण बो गुनौ कर्‌यौ है जिको महापाप है! काका इणै ईज पारबती रै बाप नै छुरै सूं मारियौ हौ!

जमींदार – क्यूं झूठ बोलै है? थूं बावळौ हुयग्यौ है! काका, इणरौ माथौ काम कोनीं देवै।

हणवंत – क्यूं कांपै है? लै, आ पुळिस आयगी।
(नालदार जूतां री आवाज)

काकौ – जमींदार! मरणै रै बाद भगवान री अदालत में जाणौ है। उण अदालत में अेक भी पाप, अेक भी गुनौ छिप कोनीं सकै। थूं विण गरीब नै मार’र दस पनरै हजार रिपिया जरूर मार लिया, पण थे मिनखपणै रै नांव माथै काळौ दाग लगा दियौ!

हणवंत – लै, पुळिस आयगी है काका!

काकौ – हवलदार साब! दोनां नै गिरफ्तार करलौ। अेक खून कर्‌यो अर अेक घास री ढिगली में लाय लगायी। आ’ स्सै कैवै।

रामानंद – म्हनै मती छुवौ! काकै री बकवास अर रामसिंघ रै कैवणै माथै म्हनै पकड़यौ तौ हूं..!

हवलदार – चुप रैह! सफाई खातर अदालत है। मानसिंघ!  आखी रात उठै पौरौ बैठायदौ। उठै कोई कैनै छुवै नीं।

काकौ – चालौ भाई, चालौ। जिकौ हुग्यौ बीं खातर रोवौ मत। हर वस्तू मिट’र नवौ रूप लेवै। आपां नै आ’ बिचारणी चाहिजै कै आपांरी अै जिनसां नवौ रूप लेवण सारू आपां सूं अलग हुई है।
(सै जावै, सिरफ काकौ रैवै)

काकौ - दिवलै री जोत मंदी पड़गी है। बुझण री त्यारी है। हमैं ईं में तेल घाल्यां भी कै हूसी! (संगीत) दिवलौ नवीं जोत मांगौ है। दूंला, थनै नवीं जोत भी दूंला। (हंसै। बसंती आवै)

बसंती – मांयै काकौ है?

काकौ – कुण? बसंती बेटी! कै’ बेटा, कंईं हाल-चाल है?

बसंती – आपरी दया सूं म्है मैं आछा हां। बस, अबै पारबती रौ ब्याव कर दौ। हूं वींरा हाथ पीळा देखणा चावूं। ना मालम क्यूं आ’ जंचै कै हूं वींनै बनड़ी रै भेस में देखण खातर ईज जीवूं हूं।

काकौ – थूं मत कै बेटी, हाल थनै बौत कुछ करणी है।

बसंती – नीं काका, हूं थांरा पग छूवूं। थे म्हारी बेटी रौ ब्याव.. (गळौ रुंध जावै; संगीत) थे जाणौ हौ कै पारबती रा बापू पांच बरस पाछै परदेस सूं पूठा आर्‌या हा। दस हजार रिपिया वां भूखा रैय’र भेळा करिया हा। विचारियो कै गवरी अर पारबती रौ ब्याव करसूं पण..

काकौ – पण कंई? जाणै है, जमींदार नै पुळस पकड़ लियौ है। वींनै जल्दी सजा हू जासी।

बसंती - सजा सूं कंईं हुसी? ना वै आसी अर ना रिपिया! काका, थे बापड़ै नै छुडावौ। बीं नै सजा देवण सूं..

काकौ – (संगीत) बेटी! म्हारी आछी बेटी! थूं कित्ती महान अर दयाळू है। कदैस! हूं इण नै छुडातौ कदैस! हूं कानून रै वां वाक्यां नै बदळ सकतौ जिकौ पत्थर माथै मांड्योड़ी लीक दांई नीं मिटण वाळा है अर मिनख रै भाग रौ फैसलौ करै है।

बसंती – बापू! थूं मिनख नीं देवता है! थूं नीं हुवतौ तौ म्हारौ कै हुवतौ!

काकौ – म्हूं कीं कोनी। भगवान अर खुदा रौ अेक निमत्त हूं- अेक इसारौ हूं।

बसंती – बस, थे म्हारी पारबती रा पीळा हाथ कराद्‌यौ। हूं सगळी उमर थांरी सेवा करसूं।

काकौ - इणरा हाथ जरूर पीळा हूसी।

बसंती – आप जद कैवौ हौ तौ वीं नै कुण टाळ सकै? आह! आज हूं निफिकरी हुयगी। आछौ काका; हूं जावूं। प्रणाम!

काकौ – जीवती रैह बेटा! जीवती रै! (कीं रुक’र) कुण, भोळौ? अरै इण दयाळू नै सागै क्यूं पकड़’र लायौ है?

सूदखोर – (मुळक’र) काका, थांरौ किंवाड़ सगळां रै वास्तै खुलौ है, हूं भोळै सूं फैसलौ करण आयौ हूं। म्हनै रिपियां री ज्यादा जरूरत है। मरणै सूं पैली हूं म्हारी सगळी रकम जमा करणी चावूं।

काकौ – दयाळ! थूं नीं बदळयौ! थारी आदत्त कुत्तै री पूंछ है; कित्ती दबाय राखौ पण रैसी टेडी री टेडी!

सूदखोर – काका, आप औ’ रिपिया देदौ तौ म्हूं बेफिकर हुय’र वांनै कई आछी जगां गाड़ दूं। म्हनै कैनै देवणौ सैन कोनी हुवै।

काकौ – दयाळू! भोळौ थारौ करज जरूर देसी। थे दोनूं बैठौ। म्हूं गाय बांध’र अबार आयौ। (सान्ती)

सूदखोर - देख भोळा, आ’ जगै है नीं, इणरै बदळै थारौ करजौ माफ कर सकूं! काकौ थनै प्यार करै अर थारी खुसी री खातर आ’ जगै तौ के आपरा प्राण भी दे सकै है।

भोळौ – दयाळू! हूं आखी उमर कंवारौ रै सकूं, पण काकै सूं उणरी आतमा नै कोनीं खोस सकूं। थूं नीं जाणै, इण जमीन रै कण-कण में काकै री जिनगी बस्योड़ी है। आ’ कुटिया! अै कळियां! औ फूल! अै पीपळ रा पेड़ अर अै बकरी रा बिचिया! आ’ गाय! नहीं-नहीं! दयाळू हूं इसौ कोनी कर सकूं। हूं काकै सूं आ’ जगां कोनी मांग सकूं। आ’ काकै री चै’कती दुनिया है! उण रै सपनां रौ संसार है!

सूदखोर –  वा जदै, बापड़ी पारबती री मां नै जैर खवायदै! वै औ सुण भी..

काकौ – दयाळू! थूं जा। थारौ करजौ बेगौ अदा कर दूंला। भोळा, थूं म्हारौ लाडलौ बेटौ है। जा पारौ नै कै अबै हूं नै थूं बेगा ई..।

सूदखोर – काकौ जिन्दाबाद! काकौ जिन्दाबाद! अबै म्हारा रिपिया आय जासी (जावतौ-जावतौ) काकौ जिन्दाबाद!

काकौ – बाप आपरै बेटै रौ घर के कीमत बसावै? सै चोखौ हुजासी। जा म्हनै छोड दै। हां, म्हनै छोड दै। हूं पूरौ अेकांत चावूं।
(संगीत) (काकै री आंख्यां डबडबावै। वो ऊठ’र अेक कागद लिखै। पाछै पढे।)

काकौ – (गळगळा सुर में) म्हारा बेटा भोळा! हूं थनै म्हारौ सैं देय’र जावूं। आघौ, भ्हौत आघौ! पण घबरावै मती, हूं थां लोगां सूं फंट’र घणा दिन कोनी रै सकूं। अेक दिन अवस आसूं। म्हारी आत्मा, म्हारी छोटीसी’क कुटिया, आ’ मैकती बगिया जिसी म्हारी दुनिया! हूं थनै म्हारी बेटी पारौ रै ब्याव री खुसी में भेंट करूं! थूं इण नै कन्यादान समझ’र इणनै बेच’र दयाळू रौ करजौ चूकतौ कर दीजै। इण दयाळू नै रिपिया देय’र म्हारी लारली मनसा पूरी कोनी करी तौ हूं साचै भ्हौत दुःख पावूंला। गांव वाळां नै म्हारा प्रणाम! साचै बेटा, आपरै गांव नै छोडती बेळा हिवड़ौ टूक-टूक हुवै, पण कंईं करूं, दयाळू रै करजै बिण पारौ और थारी जिनगी कोनी लैहलहा सकै। अर वा जिनगी कित्ती मोटी जिनगी है जिकी औरां में आपरी मैहक अर कांपणी भर सकै। वो दीयौ प्रबळ है जिकै री बाट सूं हजारां दिया और जळ सकै। हूं थांसू अरदास करूं हूं कै मैणत में बिसवास राखजै। मैणत थारी वा मुरली है जिकै रै संगीत में थांरौ गान सुरंगौ हुय जासी। अलविदाई म्हारा बेटा! (गंभीर संगीत)
(काका रै जावण री अवाज। गांव रा लोग लुगाई सुबक्यां भरता सुणीजै)

अेक आदमी – काकौ गयौ– रोजीनां रै खातर गयौ।

अेक लुगाई – (सिसकती अवाज में) अै देखौ उणरा खड़ाऊ! नै आ’ उणरी गीता नै आ’ उणरी कुराण!

बसंती – गीता नै कुराण दोनां नै अेकठा करणियौ अैड़ौ देवता फेरूं नीं आणौ है।

भोळौ – पारौ! ला, फूल तोड़’र लाई है वै काका री खड़ाऊ पर चढावां।
(फूल चढ़ावै)

पारौ – काका री खड़ाऊ रा निसाण अमिट है। औ आपां नै जुगां तांईं मिनखपणै रौ सनेस देंवता रैसी कै मिनख-मिनख सूं प्यार करै तौ वो देवता बण जावै।
(संगीत)
स्रोत
  • पोथी : राजस्थानी एकांकी ,
  • सिरजक : यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ ,
  • संपादक : गणपति चन्द्र भण्डारी ,
  • प्रकाशक : अरिहन्त प्रकाशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : चतुर्थ
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