पात्र

अजैसीं दहियौ – जांगळू रौ राजा
केसौ – अजैसीं रौ पिरोहित
रायसीं सांखळो – जांगळू में बसियोड़ौ रूण रौ कंवर
जसकरण – रायसीं रौ कामदार
खवास – अजैसीं रौ सेवक

पैलौ-दरसाव

(केसै रौ घर! सिंझ्या वेळा केसौ गुस्सै में भरियोड़ौ अेकलौ आप रै चौबारै में घूमै है।)

केसौ – ठाकरां री मती मारी गई। बैरियां रै कान भरणै सूं म्हारी इज्जत बिगाड़ी। म्हारौ खुदतौ तळाव बुरायौ अर बिचारै ओडां नै कुटाया। ओडां रौ कांईं कसूर? कसूर म्हारौ हौ तौ सांमी मूंडै जबाव कर्‌यो हुवै। पण आ’ मार ओडां रै नहीं पड़ी है, म्हारै पड़ी है। (सिर हिलावै) कोट रै बारणै तळाव करायां कोट नै जोखूं है। अब देखां, कोट री जोखूं कुण मेटसी? दहियां रै कोट नै कुण राखसी? यां चुगलखोरां मऊं कुण-कुण आडौ आवसी? जे ई राज नै नहीं पाळटूं तौ म्हारौ नांव भी केसौ नहीं। म्हारौ माजणौ बिगाड़ कर अजैसीं किसौ सुख भोग सकै है?
(थोड़ी देर चुप रैवै।)

(खवास आवै)

खवास – गरूजी, पायै लागूं। आप नै सिरदारां याद कर्‌या है।

केसौ – (भाव बदळ कर अर गादी पर बैठ कर) राजी रैवौ। सिरदारां नै अरज करजै– आज म्हारौ जी राजी कोनीं। काल दिन हाजर हुसां।

खवास – माराज, म्हनै तौ जो हुकम हुऔ, सो अरज करी है। विंयां तौ जी म्हारौ किसौ राजी है? पण मालक रौ मालक कुण? आप तळाव खुदावण सूं पैली अरज कर लेवता तौ चर्चा री चीज नहीं बणती!

केसौ – इण मांय चर्चा कंईं है? तळाव भी राज रौ अर म्हे भी राज रा। सिरदारां की कर्‌यौ सो सोच’र ई कर्‌यौ है। म्हैं बात नै बिचारी कोनीं।

खवास – माराज, तळाव कोट रै नैड़ौ घणौ हौ। कोट री नींव में सील जावती।

केसौ – आ’ई तौ बात है, जिकी म्हारै ध्यान में कोनीं आई। कोट री नींव मजबूत है तौ आपां सगळां री नींव मजबूत है। ओडां रौ कंईं? कमीण जात है, कीं दिराय देवां। बस इतरै में ई राजी!

खवास – माराज, आप सही फुरमावौ हौ। बिचारां नै कीं दिराय दीजौ। तौ म्हें सिरदारां नै अरज करूं – गरूजी काल दिन हाजर हूसी।

केसौ – हां, हां, और कंईं?

(खवास जावै)

केसौ – (ऊभौ हू नै) अब सिरदार याद फरमावै है। म्हारौ काळजौ तौ काड लियौ, अब उणां नै जाय’र आसीस बखाणूं? औ’ खवास भी जबरौ घणौ है। म्हारै मन री बात लेवणी मांडी। पण अठै के टक्का काडै हौ? (थोड़ी देर चुप व्है नै) रायसीं सांखळौ रूण छोड’र जांगळू री धरती में बास बसायौ है। मोटौ सिरदार है, पण अठै बिखौ भुलावै है। रायसीं रै माथै अजैसीं रौ उपकार है। पण राज-लोभरै आगै कंईं उपकार अर कंईं अपकार? रायसीं पट सकै है। और कठैई निजर कोनीं पसरै। अब तौ रायसीं सूं मिळियां ई बात ढब बैठै तौ बैठै।

(पड़दौ पड़ै)

 

दूजौ-दरसाव

(रायसीं री कोटड़ी। आधी रात री बखत। केसौ जाय’र सूतोड़ै रायसीं नै जगावै।)

रायसीं – (नरमी सूं) आज गरूजी इण बखत कींयां किरपा करी? बिराजौ।

केसौ – (पिलंग पर बैठ कर) मिळियां नै घणा दिन हुवा; मन कर्‌यौ– रायसींजी सूं मिळां। पछै कंईं रात अर कंईं दिन।

रायसीं – आ’तौ गरू माराज री बडी किरपा है। म्हारौ आंगणौ पवित्र हुवौ। कीं सेवा फुरमावौ।

केसौ – सेवा कंईं? आपनै रूण छोडणी पड़ी, इण बात रौ म्हारै घणौ बिचार है। रजपूत री जात जमीं।

रायसीं – माराज, आप सार फुरमावौ हौ। पण करां कंईं? भाई दगौ तेवड़्यौ तौ घर छोडणौ पड़्यौ। राजा रै कुण भाई अर कुण बेटौ?

केसौ – आ’ई म्हारै में हुय रैयी है। म्हैं राजगरू हां पण म्हारौ तळाव खुदतौ अजैसींजी रुकवा दियौ अर ओडां नै कुटवाया। आप तौ सारी बात सुणी ई हुसी?

रायसीं – हां गरू माराज, सारी बात सुणी अर मन में दुख कर्‌यौ पण कंईं बणै? म्हारी भी डावड़ियां कूवै पर पाणी भरवा जावै अर दहियां रा कंवर भेळा होय’र वांनै हूं या परणीजूं, हूं या परणीजूं कैवै। औ भी कोई कंवरां रौ बरताव है? पण मन मार कर चुप बैठां हां। बिखै रा दिन है। वै दिन कोनी रैया तौ जाणां हां, कदैई औ दिन भी कोनीं रैसी।
(लांबी सांस लेवै)

केसौ – रायसींजी, नेठ नै तौ आप सिरदार हो। आप मन ओछौ मत करौ। म्हैं इसौ अकरम नहीं देख सकां। सही बात तौ आ है कै दहिया अब अनाचार पर उतर आया है।
(गरम हुवै)

रायसीं – नहीं गरू माराज, म्हैं तौ दहियां री धरती में बसा हां। अजैसींजी रौ म्हारै माथै घणौ उपकार है। म्हैं जबान सूं इसी बात क्यूं कर कैवां?

केसौ – रायसींजी, जद ई तौ म्हे कैवां हां– आप नैठ नै सिरदार हौ। जे अेक राजा अनाचार करै तौ दूसरौ राजा थरपणौ म्हारौ धरम है। म्हैं आप नै राजा बणावां, जांगळ री धरती रा धणी करां! आप म्हानै कौल बचन दिरावौ। आखर आ धरती सत पर टिकी है।

रायसीं – माराज, म्हैं तौ दहियां री सरण में हां। म्हारै तौ अजैसींजी बडी सी बात है।

केसौ – रायसींजी, आप दगौ मत ना कूंतौ। आपां दोनूं ई दहियां सूं दुखी हां। कदैई राजगरू रौ माजणौ गयौ सुण्यौ है कंईं हुसी? म्हारै मतै चालौ तौ आज ई जांगळूरी धरती आप नै दी।

रायसीं – माराज! म्हे तौ धरती रा रुखाळा हां। राज तौ आप रौ ई रैसी। आप हुकम करौ सो म्हारै सिर माथै। पण काम करड़ौ घणौ है। आप रौ बरदान ई फळै तौ फळै।

केसौ – रायसींजी, म्हारौ बरदान है– आप जांगळू रा धणी बणसौ। अेक काम करौ। आप दहियां रै सगाई रा नारेळ भेजौ– सिरदारां री बेटियां सिरदारां नै, रजपूतां री रजपूतां नै, नै और और जातां री और और जातां नै। आप इण भांत सगायां करौ। मोटी जान बुलावौ। पछै (कान में) यूं करौ। सारौ काम म्हे पूरौ पाड़देसां। आप तौ म्हारै कैयां मुजब चुपचाप करता चालौ।

रायसीं – तौ गरू माराज रौ हुकम सिर माथै।
(सिर झुकावै)।

(पड़दौ पड़ै)

 

तीजौ-दरसाव

(अजैसींजी रौ दरीखानौ। दिन रा दस बजियां री बखत। अजैसींजी गादी पर मसनद रै सारै बिराजिया है। केसौजी वां रै नैड़ा सा आगै बैठा है।

केसौ – तौ म्हैं अरज करूं– करड़ाई करणौ राजा रौ धरम है। जे कुमारग चालै तौ आप रै सागी बेटै नै भी डंड देणौ जरूरी है।

अजैसीं – हां राज! आप कथा मांय असमंजस री बात सुणाई ही। राज-धरम निभाणौ ई पड़ै।

केसौ – असमंजस ई क्यूं, रायसींजी नै देखौ। नेम पर कोनीं चाल्या तौ सीहड़जी सागी भाई नै भी परै कर्‌या। अब रायसींजी रौ माथौ ठिकाणै आयौ है। जे राज प्रतपाळणा न करता तौ गाडां लियां भटकता फिरता हूता।

अजैसीं – कंईं करां? सगपण रौ धरम भी निभाणौ ई पड़ै।

केसौ – धरम री जड़ सदा हरी है।

(खवास आवै)

खवास – (झुक कर) राज! रायसींजी रा कामदार हाजर व्हैणौ चावै है। कंईं हुकम है?

अजैसीं – कामदारां नै आवणा दो।

(कामदार जसकरण आवै)

जसकरण – (झुकनै) राज! मुजरौ मंजूर हुवै। (केसौ कानी) गरू माराज, पायै लागूं।

(केसौ हाथ सूं आसीस देवै)

अजैसीं – जसकरणजी! आवौ बैठौ।

जसकरण – रायसींजी मुजरौ मालम करायौ है अर राज री कुसळ पुछाई है।

अजैसीं – रायसींजी मोटा सिरदार है। सिरदारां रौ कई हुकम है?

जसकरण – राज! रायसींजी अरज कराई है – दहियां रा कंवर कूवै पर जावै अर म्हारी डावड़ियां नै कैवै– ‘आ हूं परणीजू’, ‘आ हूं परणीजूं।’

अजैसीं – (बीच में ई गरम होय’र) आ’ बात! कंवरां री इसी अनीत! म्हैं आज ई जाबतौ करसां। कंवर नहीं मानसी तौ डंड पासी। आप तौ म्हारा सगा हौ।

जसकरण – राज! रायसींजी सगपण नै और भी ऊंडौ करण रौ प्रस्ताव भेज्यौ है। वै अरज कराई है कै म्हारै सातबीसी डावड़ियां बास में परणावण जोग है। सिरदारां री सिरदारां नै, रजपूतां री रजपूतां नै, और और जातां री और और जातां नै परणाय देसां।

अजैसीं – नहीं, नहीं । रायसींजी नाराज मन सूं और प्रस्ताव भेज्या है। म्हे मंजूर करां कोनीं।

जसकरण – राज, इसी बात कोनीं। रायसींजी राजी मन सूं औ प्रस्ताव भेज्यौ है। परणावण जोग डावड़्यां तौ परणावणी ई पड़ै। राज पुराणा सगा है। राज नै नहीं परणाय अर दूजा नै क्यूं परणावां?

अजैसीं – क्यूं केसोजी, आप री कंईं राय है?

केसौ – रायसींजी ठीक विचार कर्‌यौ है। वे राज रौ उपकार मानै है। नेठ नै तौ मोटा सिरदार है। बात नै भूलै क्यूं कर?

अजैसीं – तौ जसकरणजी, रायसींजी नै म्हारौ मुजरौ कैवौ अर नारेळ बंदाय लेसां।

जसकरण – (सिर झुकाय’र) जो हुकम।

(पड़दौ पड़ै)

 

चोथौ-दरसाव

(केसौ रौ घर। दिन री दो बजियां री बखत। केसी चौबारै में अेकलौ घूमै है।)

केसौ – दहिया मोद में भर’रे नारेळ बंदाय लिया। आज रौ लगन है। लाडी रौ चा’व घणौ। सगळा मोह में माता-माता फिरै है। (हंस’र) दुनिया भी कई जाणसी। बामण रौ माजनौ बिगाड़्यौ, जिण रौ औ’ फळ है। (रुक’र) म्हैं सांखळां रौ मंडप परख आयौ। पैली ऊंडौ दरड़ौ खोद्‌यो। दरड़ै में लकड़ा गेर्‌या, ऊपर कांटी बिछाई। पछै झांसां लगाया अर बारूद री मोटी तै’ गेरी। ऊपर सोवणी-सोवणी मखमली बिछायत करी। मंडप फूटरौ घणौ है। दहिया देखतां ई रींझ जासी। (मुळक’र) पण वे कई जाणै के औ मंडप तौ लाखाघर है। पांडू धरमी हा, जिण सूं लाखाघर में बचगा। पण अै पापी क्यूं कर बचसी?  (फेरूं मुळकै) दहियां रा मोटा-मोटा मिनख सगळा ई बींद बणसी। अजैसीं आप मौड़ बांधसी। सागै जनेती लेसी दारूं रा दौर चालसी। मतवाळा झूमसी। पछै सगळा मंडप में बिराजसी। अर पछै अेक साथै ई सगळा हा..हा..हा! (डरावणी हंसी) केसौ रै मन री रळी जदैई पूजसी। (फेरूं हंसै) ह..ह..ह..ह।

(खवास आवै)

खवास – गरू माराज, पायै लागूं। पधारौ, निकासी करावणी है। सात बीसी बींद बणावणा है। अेक, बींद थोड़ौ ई है? सांखळा तौ जात-जात री बींदणी परणावै है। (मुळक’र) आप भी नवा गुराणीजी परण लाया हूता।

केसौ – अरै खवास! म्हांनै कुण परणावै? सगळां रै आप आधी लाग रैयी है। पण जनेती तौ म्हे भी बणसां ई।

खवास – आ’ ई म्हारै व्है रयी है। मैं भी तौ कोरौ जनेती ई बणसूं। माराज! आज तौ राज में कुंवारौ बस अेक म्हें ई रैतौ लागू हूं ।

केसौ- नहीं, थारौ भी काम बणाय देसां । यूं राज री घणी सेवा करी है। थारी सेवा निरफळ क्यूं रैसी? थूं चाल। म्हे नुंई पोसाक धारण करनै बेगाई आवां हां। चार मिनखां में चोखा लागां।

(खवास जावै)

केसौ – (अकेलौ) अरे अजैसीं! केसै रौ तळाव बुरायौ तौ वैं रा भी हाथ देख! उणी ठौड़ तळाव बणायौ तौ म्हैं बामण अर म्हारौ नांव केसौ! अठै तौ बस बात ई है। अर म्हारै तौ जिसा दहिया, विसा ई सांखळ! अजैसीं न सही, रायसीं सही

(पड़दौ पड़ै)

 

पांचवौं-दरसाव

(सांखळां रौ बास। मंडप रै आगै रात रा दस बजियां रायसीं नागी तलवार लियां अेकलौ आवै।)

रायसीं – (तलवार ऊंची करनै) भवानी री मैर हुयी! सारा पापी अेक सागै ई स्वाहा! ह..ह..ह (डरावणी हंसी) म्हारी डावड़ियां नै छेड़वा रौ फळ पायौ। अब राजगादी आधी कोनीं। बींद अर जनेती अेक भी पूठा कोनीं जाण पायौ। सारा ई स्वाहा! ह..ह..ह..ह! (हंसै)।

(केसौ मोद में भर्‌यौ आवै)

केसौ – राज! अेक काम तौ पूरौ हुवौ। अब दूसरै में ढील मत करौ। बेगा कोट पर कब्जौ करौ। रातौ-रात सारौ काम सळटाणौ है। बात फूट्यां, न जाणै ऊंट के कवड़ बैठै? उतावळ करौ।

रायसीं – म्हारै तौ गरू माराज रौ हुकम सिर माथै है। आप आगै, अर रायसीं लारै। पण कोट रै तौ भीतरला ताळा पड़्या हुसी, काठी आगळ हुसी।

केसौ – राज, फिकर मत करो। म्हैं इतरौ नाटक पूरौ पाड़ दियौ तौ आ’ के बडी बात है? पण बात फूट न जावै। उतावळ करौ।

रायसीं – माराज, मारग दरसावौ। रजपूत तौ त्यार है।

केसौ – तौ म्हारी बुध भी त्यार है। थोड़ा रजपूतां नै बींद अर जनेतियां रै रूप में घोड़ा पर चढावौ, थोड़ां नै सुखपाळां में बिठावौ, थोड़ां नै लारै सूं बुलावौ। राज म्हारै साथै पधारौ। म्हे प्रवेश रै मौरत री बात पर दरवाजौ खुलाय देसां। पोळियौ म्हारी बात मान लेसी। पछै भीतर रौ काम राज रा रजपूत सळटाय देसी..।

(पड़दौ पड़ै)

 

छठौ-दरसाव



(जांगळू रै कोट रौ दरीखानौ। दिन रा ग्यारै बजियां री बखत। रायसीं अेकलौ घूमै है। मन में बडौ चा’व है।)

रायसीं – भाई चूक तेवड़ी पण म्हारौ भी भाग है। पुरसारथ सूं जांगळू रौ राज पायौ। जांगळू रूण सूं कम कोनीं।
(तरवार ऊंची करै। केसौ आवै अर जसकरण केसै रै पगां पड़ै)

केसौ – जद तांई सूरज-चांद है, राज कायम रैवौ। आज जांगळू में राज री आण फिरी। पापी परळै गया।

रायसीं – माराज! आप री कंईं ओपमा बखाणूं? कोई दिन चाणक्क भी नंदबंस में आ’ ई करी ही। जांगळू री गादी पर म्हनै आप ई बिठायौ है। म्हारै अर म्हारी आस-ओलाद रै गरूपद पर आप रौ बंस ई रैसी। म्हैं आज ई ताम्र-पत्तर भेंट कर देसूं। कामदारां! ताम्र-पत्तर रौ इंतजाम करौ।

जसकरण – जो हुकम, अन्नदाता।

केसौ – आ राज री बडाई है, राज रौ गुण है।

रायसीं – (राजी होय’र) हां, जसकरण, आज गरू माराज री मैर सूं म्हारै भी बैठण नै ठौड़ हुई। आज ई ओडां नै पाछा बुलावौ। वां नैं सिरौ-पाव देवौ। उणी सागी ठौड़ तळाव खुदावौ। सारौ खरचौ राज रौ लागसी। तळाव रौ नांव केसोळाव रैसी। औ म्हारौ पैलौ हुकम है, औ म्हारौ पैलौ काम है!

जसकरण – जो हुकम माराज! (जावै)
(केसौ दायणौ हाथ उठा,र आसीस देवै)


(पड़दौ पड़ै)

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : मनोहर शर्मा ,
  • संपादक : गणपति चन्द्र भण्डारी ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : चतुर्थ
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