पात्र
व्यासजी
प्रसांत
सम्पादक रा साथी
मधुकर
अरोड़ा व दौ दूजा सरकारी अफसर
सम्पादक री विधवा लुगाई
सम्पादक रा दौ टाबर
नानगौ - आरोड़ा रौ नौकर
पैलौ-दरसाव
(स्हैर री गळी में दूसरी मंजिल में अेक छोटौ कमरौ– 9 फीट चौड़ौ, 11 फीट लंबो। कमरै में दो टूट्योड़ा मुड्ढा, अेक पुराणी कुरसी, अेक चीड़ री छोटी टेबल, अर अेक कानी अेक पिलंग, जिण पर गादी अर अेक अधमैली सी चादर बिछ्योड़ी है। अेक बिना किंवाड़ा री आलमारी में कुछेक किताबां अर अखबार अस्त-व्यस्त सा दीखै है। भींत पर अेक कानीं अेक जवान ग्रेज्युओट री तस्वीर– हाथ में डिग्री री भूंगळी कर्यां, सिर पर हुड लगायां अर काळौ गाउन पैर्यां– लटक रयी है। दूसरी भींत पर अेक कलेंडर कोई सिनेमा री अैक्ट्रैस री तस्वीर अर अेक टैगोर री तस्वीर लटक री है। अेक कानीं है दरवाजे पर पुराणी किनारीदार जनानी धोती रौ पड़दौ सूतळी में पिरोकर टांग्योड़ौ दीखै। दूसरौ दरवाजौ खुल्योड़ौ है। दिन रा तीन-चार बजिया री बखत है।)
(पैड़ीयां सूं चढ़ कर ऊपर आता दो आदमियां रै पगां री अर बोलणै री अस्पष्ट आवाज आवै।)
अेक आवाज – (जोर सूं) अरे भई, व्यास जी माराज है कंईं?
(दोन्यूं आदमी चढ़ता-चढ़ता दरवाजै रै कनै आ जावै। अेक छोटौ टाबर भाग कर आवै।)
टाबर – आपरौ सुभ नाम?
अेक आदमी – म्हनै प्रसांत कैवै अर आप है मधुकरजी।
(टाबर भाग कर जावै। इत्तै में ई व्यासजी ‘आओसा, आओसा’ कैता दीखै – तैमद लपेट्यां उघाड़ै डील, हाथ में सुंवार करणै रौ रेजर अर मूंडा पर साबण थेथड़्योड़ा)
प्रसांतजी – वा सा! सम्पादक तौ बिचारा मर पूरा हुवा अर आप सजणै संवरणै में लाग रैया हौ।
व्यासजी – कुणसा संपादक? म्हनै तौ बेरोई कोनीं।
(करतौ-करतौ कुर्सी पर बैठ कर रेजर चलातौ जावै। दोनूं आदमी भी मूड्ढ़ा पर बैठ जावै। प्रसांत जी बात में लाग जावै अर मधुकर कमरै रौ मुआयनौ-सो करण लागै।)
प्रसांत – वैई संपादक जी थारा राजस्थानी रा धजा धारी, जिका खुद मर ग्या पण थारै जिसा नै खड़ा कर ग्या।
व्यासजी – आपरौ मतळब ‘जय राजस्थानी’ रा संपादक आचार्य मुरधर शर्मा सूं तौ कोनॉं? वे तौ काल परसूं तांईं तौ भला चंगा हा।
प्रसांत – हां, वैई आचार्य मुरधर, जिका थांनै भला चंगा दीखै हा, टीबी रा बेमार हा। बिचारा राजस्थानी-राजस्थानी चिल्लाता ई मर गया।
व्यासजी – आ’ तौ गजब री बात सुणाई! कठै ई मजाक तौ नहीं करौ हौ? म्हारै मानणै में ई कोनीं आवै।
मधुकर – (जिका अब तांईं चुप बैठा कमरै रौ अेक-अेक चीज नै ध्यान सूं देखै हौ।) भई, मानौ या मत मानौ, मरणवाळा तौ मर ग्या। अब कोई काम-काज री बात सोचौ। जिंदगी भर तौ आप लोग कुछ भी कोनों कर पाया, पण अब मर्यां पछै तौ बिचारै नै कुछ इज्जत देवौ। मर्योड़ा नै पुजावणै री आपणी भारतीय परंपरा रौ तौ पाळण करौ।
प्रसांत – औ काम तौ राजस्थानी रा धणी-धोरी बाजणवाळा थां लोगां रौ है। हिंदी री कोई बात होती तौ अब तांईं अखबार अर रेडियौ सगळां पर समाचार आ जाता। पण थां लोगां में दम माड़ौ ई है।
व्यासजी – आ’तौ भ्हौत बुरी बात सुणाई आप लोग। म्हारौ तौ माथौ ई काम कोनीं देवै। आप लोग जियां भी सोचौ म्हैं आपरै साथै हूं।
प्रसांत – म्हारौ बिचार है कै राजस्थानी सूं हमदरदी राखणवाळा लोगां री अेक बैठक बुलाई जावै अर उण में सोक प्रस्ताव पास करण रै साथै-साथै मुरधर स्मारक री योजना बणाई जावै।
मधुकर – हां, उण स्मारक सारू अेक कोस री थापना करी जावै अर कम सूं कम अेक लाख रिपिया भेळा करण रौ लक्स राख्यौ जावै।
प्रसांत – अर वां रिपियां सूं प्रकासण रौ काम चालू कर्यौ जावै। उणरौ न्यारौ अक दफतर, अेक मंत्री, अेक बाबू, अेक चपड़ासी, टेलीफोन अर टाईप राइटर भी हुवै।
मधुकर – अै तौ सब हुवा ई चाहिजै, पण अेक प्रेस हुवण सूं प्रकासण रै काम में भी फायदौ हुवै। इण प्रैस रौ नाम राख्यौ जावै ‘मुरधर प्रैस’
प्रसांत – इसा कामां सूं मुरधरजी रौ नांव अमर व्है जासी। अर फेर मधुकर जी जिसा कार्यकर्ता आंपणै कनै है सो सारौ काम भी संभाळ लेसी।
मधुकर – म्हैं अेकलौ कंईं कर सकूं हूं? म्हैं तौ आप लोगां रै सारै सूं ई आगै बढ़ सकूं हूं। स्मारक कमेटी रा अध्यक्ष तौ आप ईज (प्रसांतजी कानी हाथ करनै) बणौ।
प्रसांत – (फुरती सूं) आप नै तौ उपाध्यक्ष बणणौ ई पड़सी।
व्यासजी – आप लोग मुरधरजी अर राजस्थानी रा इतणा सुभचिंतू हौ आ’ बात तौ म्हनै आज ई ठा’ पड़ी। आप लोग साहित्य अर साहित्यकार रा सच्चा कदरदान हौ।
प्रसांत – अरै भई व्यासजी, म्हारी निगा में तौ साहित्य मात्र इकसार है। जिसी हिन्दी विसी ई राजस्थानी अर विसी ई अंग्रेजी, संस्कृत अर उरदू भी। अर फेर राजस्थानी तौ आपणै राजस्थान री है सो इण पर जादा हेत होणौ ई चाहिजै।
मधुकर – म्हारै कानीं भी तौ देखौ। राजस्थानी म्हारी मातृ भासा कोनीं पण फेर भी म्हैं राजस्थानी पर लेख लिखूं। आप देख्यो कोनीं म्हारौ लेख जिकौ ‘राजस्थानी लोक गीतों में विकास के स्वर’ नांव सूं ‘महान राजस्थान’ में छप्यौ हौ।
प्रसांत – अरै भई, राजस्थानी तौ जमानै री चीज है। आजकाल राजस्थानी रै नांव पर पोथ्यां भी विकास खंडां में ठाठ सूं बिक जावै। आंपां भी मुरधर प्रैस सूं राजस्थानी री पोथ्यां निकाळांला, जिकी पंचायतवाळां नै झट बेच सकां।
व्यासजी – आप लोगां री सारी योजना घणी सरावण जोग है। पण इण मौकै पर म्हारौ मन इण में कम लागै। म्हनै तौ सम्पादकजी रै परवार रौ ध्यान आवै कै वांरौ कंईं हाल हू रैयौ हूसी। वां लोगां वास्तै भी आपनै की सोचणी चाहिजै।
प्रसांत – अरै भई, आ’ भी कोई सोचण री बात है? आपां अठै रा साहित्यकारां सूं अेक अरजी मुख्यमंत्री नै अर अेक साहित्य अकादमी नै जरूर भेजांला कै संपादकजी री विधवा पत्नी नै सायता दी जावै। क्यूं मधुकरजी, ठीक है ना?
मधुकर – हां, हां, बिलकुल ठीक है। म्हारा अेक रिस्तेदार केन्द्र रै अेक मंत्री रा मरजीदान है। वै म्हारी भूवा रै जेठूतै रा सुसरा है। आप कैवौ तौ वांनै लिख कर प्रधानमंत्री नै भी अेक दरखास्त भेज देवां। म्हारौ ख्याल है कै वांरै कैवणै रौ जरूर असर हूसी।
प्रसांत – अरै भाई, अै सब काम भी तौ मुरधर स्मारक री कमेटी रै ई करणै रा है। सो सबसूं पैलां कमेटी बणांणी चाहिजै।
मधुकर – बणाणी कंईं चाहिजै, बणगी ई समझौ। आज री आ बेठक हुगी है अर इण में पदाधिकारी भी चुण्या ई गया। म्हैं अखबारां में खबर भेज देवूं हूं। भेज कंईं देवूं खुद जा’र दीयाऊं हूं। सगळा आंपणा भायला ई तौ है। खबर सामलै पानै पर आवैला दनदनाती!
प्रसांत – अरै भई, इण में कोई मीन-मेख थोड़ी ई है। घणी बार चाय पाय-पाय नै पाळ्या है। आखर कद काम आसी?
व्यासजी – म्हारै विचार में आप लोग थोड़ा बड़ा आदमियां में भी बात कर लेता तौ ठीक रैतौ। राजस्थानी नै चावणिया केई विधानसभा रा सैक्रेटरी अर अफसर लोग भी है।
प्रसांत – अरै भई, बडा लोग तौ नांव रा भूखा हुवै। आंपां वानै संरक्षक बणा लेसां। औ म्हारौ जिम्मौ रैयौ।
मधुकर – तौ अब आंपां नै चालणौ चाहिजै। खबर भी लिखणी है, फेर देर हू जासी।
प्रसांत – अरै भई, ठीक याद दिराई, व्यासजी नै भी न्हाणौ-धोणौ है, आंपां तौ भूल ई गया।
(प्रसांत अर मधुकर ऊठै अर व्यासजी सूं हाथ मिला’र नमस्कार कर विदा हुवै।)
दूजौ-दरसाव
(नूवीं बस्ती में अेक बंगलौ, जिण में दूब रै ऊपर मेज कुर्सियां लाग रैयी है। नौकर चाय-नास्तै रा बरतन सजा रैया है। दो-तीन अफसर बैठा बातां करै है। बंगलै रै सामै मोटरां रै आणै री आवाज आवै। बखत सिंझ्या री 6-7 बजे री। अेक अफसर मोटर सूं उतर कर मांयनै आयौ है जिण रौ स्वागत करण सारू बंगलै रौ मालक खड़ौ हुवै अर हाथ मिळावै।)
आणै वाळौ – बधाई है अरोड़ा साब! आपरै नूंवै ग्रेड अर स्पेसल अलाउन्सी री।
अरोड़ा – (हंस कर) आ तौ आपरी ई मैहरबानी है। आप जे ‘बॉस’ नै सिफारिस नी करता तौ काम कोनीं पार पड़तौ।
पैलो अफसर – औ तौ करणौ ई पड़ै। म्हारी कोई काम हुवै तौ आप इनकार थोड़ौ ई कर सकौ। अर हां, म्हैं तौ आपनै कैणौ भी चावतौ हौ कै म्हारै गांव रौ अेक लड़कौ है मैट्रिक पास, उणनै आपरै दफ्तर री तरफ सूं ट्रेनिंग में भिजवाणौ है, सो आप कैवौ तौ काल आप कनै भेज देऊं।
अरोड़ा – हां..हां जरूर, पण म्हारै ख्याल में तौ राजस्थान रै रैवण वाळां नै ई भेजणै री बात बताई।
पैलो अफसर – आ’ तौ मामूली बात है। आप लिख देवौ कै राजस्तान रौ कोई ठीक सर आदमी नीं मिळणै सूं पंजाब रै अेक लड़कै री दरखास्त मंजूर करी है अर ट्रैनिंग रै बाद बो आकर राजस्थानी लड़कैं नै सिखा सकसी।
अरोड़ा – पण म्हारै कनै तौ राजस्थान रा अेम.अे. अेल.अेल.बी. तक पढ़्योड़ा लड़कां री दरखास्तां पड़ी है, जिका साठ रिपियां रै वजीफै पर भी जावण नै त्यार है।
पैलो अफसर – अरोड़ा साब, आपरा बॉस भी म्हनै कैयौ हौ कै सीनियरिटी रै हिसाब सूं क्लेम कोई लोकल अफसर रौ ई बणै है, पण म्हैं वांनै म्हारै तरीकै सूं राजी कर्या है। अब आप ई देख लौ।
अरोड़ा – नहीं जी, म्हारौ मतलब औ नहीं है। आपरौ हुकम सिरमाथै पर । म्हैं जरूर-जरूर कर देसूं। म्हैं तौ आप सूं गुर सीखणौ चावतौ हौ सो आप अकल बतायदी। आवौ, आवौ चाय रौ बखत हू रैयौ है।
(लोग-बाग चाय रा प्याला में चाय ढाळै अर पीणै खातर मूंडै कानीं लै जावै जितणै में पड़ोस सूं लुगायां रै रोणै री आवाज आवै। ‘औ म्हारा देवर जी..औ..’ चाय पीवण वाळा आवाज सुणै।)
पैलो अफसर – (हंसकर) अरोड़ा साब! आपरी पार्टी में औ अनोखौ संगीत कठै सूं आयौ?
दूजौ अफसर – (हंसकर) कंईं बढिया ‘हारमनी’ है।
अरोड़ा – आ’तौ कोई रै रोणै री आवाज है। सायद पाड़ोसी रै अठै ई कोई रोवै है। थोड़ा दिनां पैलां कोई आं रै मरग्यौ बतावै।
पैलो अफसर – किसा गंवारू लोग है? मरग्यौ तौ यूं असभ्य तरीकै सूं थोड़ौ ई रोवणौ चाहिजै? कित्तौ भद्दो लागै!
(रोणै री अवाज अेक सूं दो होणै सूं तेजी सूं आवती जावै)
दूजौ अफसर - यार, पार्टी रौ मजौ किरकिरौ कर दियौ। औ भी कोई पाड़ोसी है? कैं नै बसा लिया अरोड़ा साब?
अरोड़ा – भई, म्हनै तौ खुद नै ठा’ कोनीं। कदै-कदै कोई धोती-कुड़तै में दूबळौ सो आदमी बड़तौ-निकळतौ दीखै।
(नौकर नै हेलौ मार कर) अरै नानगा! थूं जाणै अैं मकान में कुण रैवै?
नानगो – (दुख सूं) हुकम, अेक मारवाड़ी रौ छापौ निकाळता जिका मुरधरजी रैता हा। बौत चोखा काणी किस्सा अर गीत छापता हा। म्हारा सगळा टाबर चाव सूं पढ़ता। बिचारा मर गया। आज ग्यारवों है सो रिस्तैनातै रा लोग आया है।
अरोड़ा – म्हारै नानगै री रुची रौ ई कोई हूसी। जिसौ गंवारुं स्तर इणरौ है, विसौ ई उणरौ हूसी।
पैलो अफसर – यार, आपरौ पाड़ोसी है अर आपनै बेरौ भी कोनी कै कुण है अर कंईं करतौ अर कद मरग्यौ?
अरोड़ा - भई, आंपां अठै रा टुच्या-पुच्या लोगां नै मूंडै नहीं लगावां। आंपां नै कंईं गरज है? अर रही मरणै री बात, सौ इत्तै बडै स्हैर में नित सैकड़ां ई मरै अर हजारां ई जलमै। किण-किण रा लेखा-जोखा राखां?
दूजौ अफसर – आज रै अखबार में अेक खबर म्हैं पढ़ी ही, जिण में सायद आं’ रौ ई जिकर हौ। कोई ‘स्मारक समिति’ बणी है, वा प्रैस खोलसी, किताबां छापसी अर उण कमेटी रा चैयरमैन भी सायद स्पीकर सा’ब नै बणाया है। हुवै न हुवै आपरै पाड़ोसी री ई बात है वा।
अरोड़ा – वां लोगां रै और धंधौ ई कंईं है। कोई मरै उणनै सहीद बणा’र झोळी ले’र निकळ जावै। मरण वाळा मर जावै अर पैट भरण वाळां रौ रस्तौ निकळ आवै। खैर, जाण भी दौ जी, नास्तौ करौ आप तौ। अरै नानगा! गरम चाय ला; और देख, गरम पकोड़ा भी।
नानगो – हुकम, अबार लाऊं।
पैलो अफसर – यार अरोड़ा साब, (रोणै री आवाज कानी इसारौ करतां) इण बैकग्राउंड पर थोड़ौ सीलोन रेडियौ तेज करौ तौ कीं रंग जमै।
(अरोड़ा जी रेडियौ तेज करै जिण सूं धुन निकळै ‘बोल राधा बोल, संगम होगा कि नहीं’ सगळा अफसर ठहाकौ लगा’र हंसै। प्यालियां री खणखणाहट हुवै, दरसाव बदळै)
तीजौ-दरसाव
(सम्पादक रै घर रौ अेक कमरौ। बखत 9-10 बज्यां दिनूगै री। सम्पादक री बिधवा खाट पर पड़ी खांसै है। कनै अेक 9-10 बरस री छोरी बैठी चूल्हौ फूंकै। अेक 2-3 बरस रौ टाबर रोवै अर 6-7 बरस रौ छोरौ पाटी पर कीं लिखै। इत्तै में दरवाजै पर डाकियै री आवाज आवै ‘चिट्ठी’। पढणों छोड’र छोरौ झट दौड़ कर आवै अर 8-10 चिट्ठियां अर अखबार लेकर आवै।)
बिधवा – (खांसती खांसती) बेटा, कैंरी चिट्ठी है? म्हनै दिखा, देखूं।
छोरो – मां, अै तौ सगळी संपादक ही संपादक रै नांव री है। सुणाऊं कंईं?
बिधवा – (ऊंची सास ले’र) हूं।
(छोरौ कागद खोल-खोल नै बांचै)
प्रिय संपादकजी,
आप राजस्थानी भासा अर साहित्य सारू घणौ मोटौ काम कर्यौ है। आपरी जित्ती तारीफ करी जावै थोड़ी है। कागज रै साथै अेक कविता ‘भतेरण’ नांव सूं भेजी है। औ म्हारौ पैलौ ई प्रयास है सो जरूर-जरूर जगां देवोला। हां, अंक जरूर-जरूर भिजवावोला।
आपरौ
फूसाराम आर्य
(दूसरौ कागद खोलै अर बांचै)
म्हारा घणा बाला संपादकजी,
आपरौ छापौ देखणै में आयौ। म्हे लोग गांव में ‘गांधी वाचनालय’ नांव सूं अेक संस्था बणाई है, जठै हिन्दी रा घणा अखबार चंदौ देकर मंगवाया जावै। ‘जय राजस्थानी’ तौ आपणो घर रौ ई अखबार है। आप इणरी अेक प्रति निःसुल्क भेजणै री किरपा करता रैवोला। आसा है आप इण में भूल नहीं करोला।
आपरौ
सांडिल्यकुमार पूलासरिया ‘प्रमत्त’
छोरौ – (अेक और लिफाफौ खोल कर बांचण लागै) भारत सरकार की सेवार्थ।
बिधवा – (बीच में ही रोक कर) हैं..हैं अैं में कंई लिख्यौ है? देख। सायद कोई राज सूं पीसा-टका आया हुवै।
छोरौ - नहीं मां, लिख्या है..
प्रिय महोदय,
आपने अपनी पत्रिका के अंक पिछले 3-4 महीनों से नहीं भिजवाये हैं। अतः आपको लिखने में आता है कि सभी अंक शीघ्रातिशीघ्र भेज दें अन्यथा हमारा चंदा वापिस कर दें नहीं तो वसूली की कानूनी कार्यवाही की जावेगी।
आपका,
पी.के. मलहोत्रा
विकास अधिकारी
बिधवा – (खांसती-खांसती) हे राम, तुळी लगा आं कागदां रै! खड़्यौ हू, खा-पी नै स्कूल जा।
(छोरौ कागद-पत्र अर पट्टी-बस्तौ जमावण लागै। इत्तै में फेर दरवाजौ खटखटाणै अर ‘बहिनजी बहिनजी’ री अवाज आवै। छोरौ दरवाजौ खोलण जावै अर प्रसांत अर मधुकर रै साथै पाछौ आवै। विधवा मांचै पर सूं खांसती-खांसती ऊठै अर माथौ ढेर'र नीचै बैठै। रोटी बणाती छोरी भी आपरा गाभा संभाळै अर चौकै रा बरतण ठीक-ठाक करण लागै।)
प्रसांत – (गम्भीर मुद्रा अर चंटाई रै ढंग सूं) माताजी, आपनै कियां बताऊं कै सम्पादकजी कै सुरगवास सूं म्हनै कित्तौ दुख हुयौ है। वै म्हारा बड़ा अच्छा दोस्त हा। होणी रै आगै कोई रौ कंईं जोर चालै?
म्हे लोग आ’ तय करी है कै संपादकजी री यादगार में पोथियां अर अखबार छापणै रौ काम चालू करयौ जावै। उण रै वास्तै पीसा भी भेळा कर्या जासी। वां पीसा सूं अेक दफतर अर प्रैस चलायौ जासी। उण काम रै वास्तै अेक समिती बणाई है जिण रौ मुखिया म्है हूं अर (मधुकरजी कानीं हाथ करनै) मधुकरजी उठै काम करसी। आज चन्दौ भेळौ करण रै वास्तै अेक नाटक खेल्यौ जासी अर स्कूलां री लड़कियां रा नाच-गाणा भी हूसी। सो म्हैं आपनै अै दो पास देवण नै आयौ हूं। आप टाबरां नै जरूर-जरूर भिजवावोला। (हंसतौ-हंसतौ पास निकाळै अर विधवा रै हाथ कानीं करै। विधवा पासां नै अेक हाथ में लेवै अर दूजै सूं आंख्यां सैं आंसू पूंछै। प्रसांत अर मधुकर ‘अच्छा नमस्ते’ कैता-कैता बारै जावै।)
बिधवा – राम-मार्यां रौ राम निकळयौ है। अठै तौ रोटियां रा सांसा लाग रैया है अर उठै नाच-गाणा करता फिरै! ठग कठैरा (पासां नै फाड़’र फैंक देवै। पड़दौ बदळै।)
चौथौ-दरसाव
(प्रसांत रौ घर। सिंझ्या री 6-7 बजियां री बखत। प्रसांत अर मधुकर दोनूं नीचौ माथौ कर्यां बैठा है। होळै-होळै मून तोड़ कर मधुकर बोलै।)
मधुकर – भाई प्रसांतजी, म्हैं तौ गरीब आदमी हूं। परदेसी अलग हूं। म्हनै तौ आज ई खावण नै चाहीजै, सो कुछ न कुछ तौ जुगाड़ करावौ। काल नाटक री बुकिंग सूं सौ-दोसौ रिपिया तौ आया ई हूसी।
प्रसांत – (झाळ में भरतौ) थांनै बैम है तो हिसाब देख लौ। थे बचण री बात करौ हौ। म्हारै तौ घर सूं पीसा लाग्या है। घर-खरच रा पीसा हा जिका सै ले’र फुटकर खरच में उड़ा दिया। म्हारै तौ खुद रै मुसकल हूगी। गया हा ‘छब्बा’ बणनै अर बणग्या ‘दूबा’।
मधुकर – पर म्हनै तौ म्हारी मैणत मिलणी ई चाहिजै। आपतौ रिक्सां अर स्कूटरां पर फिरता हा अर चाय-नास्ता उडावता हा जद कै म्हैं दो दिन सूं दो प्याला चाय रै अलावा पेट में दाणौ तक नीं गेर्यौ है। म्हनै तौ चक्कर आवै, ऊठ्यौ भी कोनी जावै। म्हैं तौ धायौ थांरी स्मारक समिती रौ मंत्री बणणै सूं।
प्रसांत – खैर, घाटै री लड़ाई सूं कोई फायदौ कोनी। अबार हजार पांच सौ आ जाता तौ थे भी घणा ही मुळकता-मुळकता फिरता। पण मूळ में ही टोटौ पड़ग्यौ। काल व्यासजी कानीं चालसां अर उणांसूं कुछ झंपणै री चेस्टा करसां। वो पंछी संपादकजी रौ भगत हौ।
मधुकर – म्हनै चार आनां रा पीसा तौ देवौ जिकौ चणा ल्या’र तौ चाबूं। म्हारा तौ प्राण निकळै है।
प्रसांत – भई, अबार तौ कोनी, दो अेक घंटा बाद ‘प्लाजा’ सिनेमा रै फाटक पर मिळ जाजौ। म्हैं कोई साथी नै पटाकर ल्याऊं हूं सो थारी पेटपूजा भी करासां अर मनोरंजन रौ जुगाड़ भी करसां। (हंसै)
(मधुकर धीरै-धीरै ऊठै अर लांबी-लांबी सांसां लेतौ बारै जावै। प्रसांत भी उठै अर दरवाजै सूं बारै झांक कर बन्द कर लेवै। फेर तकियै रै नीचै सूं बटुवौ निकाळ कर रिपिया गिणै अर ‘जय संपादकजी री’ कैतौ वांनै सिर पर लगा कर पाछा बटुवै में घालकर मेल देवै अर कुटिल हंसी हंसै।)
(पड़दौ पड़ै)