रबि तपै विषम अति किरन धूप।

रबि नैण खुल्लि दिक्खिय अनूप॥

बट इक्क महा गह्यर सुजानि।

तिहिं निकट सरोवर सुरस मानि॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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