किय स्राद्ध नंदि मुख बेद बृद्धि।
सब जात कर्म किन्नौ सु सुद्धि॥
गो भुम्मि अन्न कंचन सु दिन्न।
द्विजराज सकल संतुष्ट किन्न॥