संतो ऐसा देस हम देख्या, सतगुरु सबदां पेख्या हो॥
सतगुरु हमको भेद बताया, उलट’रु मिल्या असंखा हो॥
खाण न बाण न वेद कतेबा, ना कोई पढिया पंडिता हो॥
धरन न गगन न पवन न पाणी, आपो आप अलेखा हो॥
चंद न सूर न तेज न तारा, केवल ब्रह्मा वसेखा हो॥
ब्रह्मा विष्णु न सेस महेसा, ना माया परवेसा हो॥
सांख्य न जोग न नवध्या तिरगुन, ना षट दरसण भेखा हो॥
जाग्रत स्वप्न सुषुपत तुरिया, संता माहिं वसेखा हो॥
रूप न रेख न बंध न मोखा, हद बेहद नहीं देसा हो॥
रात न दिवस न जनम न मरना, कल न जाल न शेसा हो॥
तीरथ न वरत न प्रतिमा सेवा, आपो आप अलेखा हो॥
बाल न दीरघ वृद्ध न होई, तिरगुण नाम निरेसा हो॥
राम रामियो एकज होई, विरला जाने वमेखा हो॥