रूपा कहे रे भाइयों ओ रूप रले ज्यों काच।
रूप लोभ में मत रुलो ढूंढ़ो साहब साच॥
पड़दे में वे रेवसी जिहि जग रो डर होय।
सिंह सुता चवड़े फिरे काल न खावे कोय॥
सिहणी बंधी जो ना बंधे बांधे किता दिन रहेत।
साचो प्रेम म्हारे स्याम सूं जग सूं किसड़ो हेत॥
जग म्हासूं आलगो नहीं मैं हूं जग रे मांय।
फिर पड़दो किण बात रो ओ अचरज मन आय॥
मन में तो पड़दो नहीं अंग पर पड़दो होय।
रूपा कहे रे भाइयों ओ गुण तो करें न कोय॥