सतगुरु देख्या दिल में पेख्या, चरणा चित लावंदा है।

सतगुरु पूरा सिष हजूरा, सनमुख सेव करंदा है॥

सतगुरु चेतन हमी अचेतन, चेतन हुय चेतंदा है।

सतगुरु सबला मैं हूं अबला, निरभै कर खेलंदा है॥

भव-जल भारी राख मुरारी, बांहि पकड़ काढंदा है।

सतगुरु मेरा मैं सिष तेरा, जुग-जुग वास बसंदा है॥

किरपा कीनी कूंची दीनी, ताळा दूर झड़ंदा है।

सतगुर बोल्या अंतर खोल्या, हरि हीरा आखंदा है॥

स्रोत
  • पोथी : श्री रामदास जी की बाणी ,
  • सिरजक : रामदास जी ,
  • संपादक : रामप्रसाद दाधीच 'प्रसाद', हरिदास शास्त्री ,
  • प्रकाशक : श्रीमदाद्य रामस्नेही साहित्य शोध - प्रतिष्ठान, प्रधान पीठ, खेड़ापा, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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