अही सू वैंण, मृग नैण, दीप नासका भणूँ।

लिलाट चंद, बीज बंद तिंद्र क्रोध है अणू।

धनुंष भूंह, लाज व्यूह तद्रपि पंकजं मुखं।

करं विसाल चंपडाल ग्री कपोत के रूखं॥

भावार्थ :- उस अप्सरा की केश राशि (वेणी) सर्प के समान लम्बी, मृग के जैसी बड़ी-बड़ी आंखें दीपक की लौ के समान नासिका है। पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान इसका ललाट है तथापि स्वभाव में जब भी थोड़ा क्रोध आता है तब इस पर द्वितीया के चन्द्रमा सी पतली रेखा उभर कर आती है। इसकी धनुषाकार भौंहे हैं। यह स्वभाव से लज्जादान है। इसका मुख कमल के समान सुवर्ण है। चम्पा की डाली के समान लम्बी भुजाएं तथा कबूतर के जैसी लम्बी गर्दन है।

प्रवाल उष्ट वैण मिष्ट दंत वज्र के कणं।

सुरं कलापि कोकला कनंक कुंभ से स्थणं।

गजंद सूंड नाभ कूंड पेट पत्र पीपलं।

नितंब तंब जंघ रंभ केहरी कटी मिलं॥

भावार्थ :- आँखों के परवाल ऊँचे लम्बे हैं, उसका बोलना बहुत मधुर है। दांत वज्र के कण के समान मजबूत कोयल के जैसी सुरिली आवाज, सोने के घड़े के समान उभरे हुए स्तन है। उसका नाभि कुण्ड हाथी के सुण्ड जैसा पीपल के पत्ते के समान पेट है। तंदूरे की तांद जैसे कठोर उभरे हुए नितम्ब, सुडोल चिकनी जंघा कमर शेर के जैसी पतली है।

गति करिंद की प्रभा पदां रविंद ओपमा।

गुमांन मोख इंद्र विद्यमांन जोति लोपमा।

पतिव्रता सो पीव के हणंत आध व्याध कूं।

उदार मेरू सक्ति हेरू जोग के समाध कूँ॥

भावार्थ :- हाथी के जैसी उसकी मस्त चाल, सूर्य के समान मुख मण्डल का तेज। उसकी ऐसी विद्यमान ज्योति के आगे इंद्रदेव का गर्व भी चूर-चूर हो जाता है। अपने पति के लिए प्रतिव्रता धर्म का पालन करते हुए उसके बहुत से कष्टों का निवारण करती है। योग साधना के वे लोग जो पर्वत के समान अडिग हैं, उनकी शक्ति भी इसके आगे विचलित हो जाती है।

मनोव्रती सु व्रम सी अनोप रूप गौर सो।

महाबळी त्रकाळ पे विरंच बोध जोर सो।

वनागतीज व्योम सी रु सीत है तूहीन सो।

सदागती सी श्रेष्ट है, रू ताप है दिनेस सौ॥

भावार्थ :- जिस प्रकार महाबली ब्रह्मा की शक्ति का प्रभाव तीनों समय– भूत, भविष्य और वर्तमान पर कायम रहता है, उसी प्रकार इस गौरी की मनोव्रती रूप सौंदर्य का प्रभाव भी तीनों काल पर छाया रहता है। जब यह आकाश की तरह स्थिर रहती है। तब पानी (बर्फ) की तरह लुभावनी शीतलता प्रगट करती है। परन्तु जब चंचलता में अस्थिर होती है तब सूर्य के तापमान की दाहक होती है।

सरूप दिव्य अंबका सुदेह तेजत के मई।

कहूं कविंद मोड' नेज सो दई दू खोजही।

कही ओपमा अनोप धी जिती कविन्द्र की।

माहा सू सूरवीर की जनेत है जतेन्द्र की॥

भावार्थ :- अत्यन्त लावण्यमय रूप और तेज युक्त कान्तिमय जिसका शरीर है, उसका वर्णन अपनी बुद्धि से अनेक उपमाओं को खोज-खोज कर मैंने कविराजा मोड़दान ने किया है। फिर यह महाशूरवीर पाबू की जननी है।

स्रोत
  • पोथी : पाबूप्रकास-महाकाव्य ,
  • सिरजक : मोडजी आशिया ,
  • संपादक : शंकर सिंह आशिया ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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