मतळब खुद रौ काढण सारू

लागोड़ा सगळा असवार

जाज हाकणिया लड़भिड़ जावै

मारै कूटै है लगातार।

उण जीवण री कीं गत व्हैला

थै इज कीं बतळावौ नीं

जो घणा-घणा है निबळा कंवळा

तिरणै री गत जाणै नीं।

स्रोत
  • पोथी : रसूल अमजातोव अर विदेसी कवितावां ,
  • सिरजक : रसूल हमजातोव ,
  • प्रकाशक : रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
जुड़्योड़ा विसै