बसंत की रुत आई बागां में बहार ल्याई।

पीळी-पीळी सरसूं की क्यारी मुस्कायी है।

भंवरा फूलां पै डोलै घूंघट सै कळी खोलै।

डाळ-डाळ पात-पात तरुणाई छायी है॥

बोलै है पपैया मोर कोयल मचावै सोर।

राग रो महीनो आज रागणी सुणायी है।

विरहण जोवै कंत च्यारूं ओर है बसंत।

पीव रो संनेसो सुण काया हरसायी है॥

स्रोत
  • पोथी : कथेसर ,
  • सिरजक : अनिता सैनी ,
  • संपादक : रामस्वरूप किसान ,
  • प्रकाशक : कथेसर प्रकाशन ,
  • संस्करण : अप्रैल-जून 2026
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