बहैं बहु भाँति त्रिबिद्धि समीर।

रहै नहिं धीरज होत अधीर॥

लता तरु भेंटत संकुल भूरि।

भए त्रण गुल्म हरे जड़ मूरि॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीर रासो ,
  • सिरजक : जोधराज ,
  • संपादक : श्यामसुंदर दास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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