फीणी बिन सकरांत को, कांईं हुयो तिंवार।
घी, मैदा का पिंड में निपजै तार हजार॥
निपजै तार हजार तई में झट फूल्यावै।
सरधा-सारू राव-रंक सगळा ही खावै॥
केसर बरणी तार-तार में पै’री चीणी।
तिरपत तन-मन करै, धरी रसना पर फीणी॥