सबसूं हिलमिल चालिये, कह गये तुलसीदास।
सबसूं रिळ-मिळ खाइये, ओ जुग रो विस्वास।
ओ जुग रो विस्वास, मंत्र है भीड़तंत्र रो।
मिनख-मिनख में भेद, जमानो लोह जंत्र रो।
कह निधड़क कविराय, मंत्र चालू कर अब सूं।
धोखाधड़ी न हुवै अरज है म्हारी सब सूं॥