सबसूं हिलमिल चालिये, कह गये तुलसीदास।

सबसूं रिळ-मिळ खाइये, जुग रो विस्वास।

जुग रो विस्वास, मंत्र है भीड़तंत्र रो।

मिनख-मिनख में भेद, जमानो लोह जंत्र रो।

कह निधड़क कविराय, मंत्र चालू कर अब सूं।

धोखाधड़ी हुवै अरज है म्हारी सब सूं॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शिवराज छंगाणी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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