मन नैं खुरसी मोहियो, ओछा-लाम्बा अेक।
के सेवा कै कारणै, बद भी होया नेक।
बद भी होया नेक, गोटियां रोज भिड़ावै।
दुश्मण सामी देख, चिणख कर कूठ कढ़ावै।
स्वारथ स्यूं लाचार, देखिया सेवक जन नै।
गुमसुम आंख्यां फाड़, रोइयो जन-गण-मन नै।