लड़िया काठा लोगड़ा, लाठी-गोळी झेल।

रुळ्या गांव रा टापरा, समझ्या फांसी खेल।

समझ्या फांसी खेल, जगत में हाको फूट्यो।

हरख्यो भारत देस, भाग गोरां रो रूठ्यो।

गोळां रो अभिसेग, घाव में छूरी करिया।

जुलम्यां रा सिरदार, देसहित कद हा लड़िया।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : केसरीकांत शर्मा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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