भवस बतावै गांव को, खुद की कठै पिछाण?

पोथी-पनड़ा खोल कर, मूंडै खूब जहान।

मूंडै खूब जहान, दसा करड़ी बतळावै।

करणो पड़सी दान, जोर कोया मटकावै।

गर चावै तूं चैन, तो पूज इणां नै अवस।

खाकर होसी शान्त, चमकसी सांवठो भवस।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : केसरीकांत शर्मा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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