लाडू गोविन्द देव, कै लाडू गोपी नाथ।

लाडू का परसाद नै, पसर्‌या रैवै हाथ॥

पसर्‌या रैवै हाथ, पवनसुत नै भी भावै।

लाडू सामैं मेल, जैन महावीर रिझावै॥

पारबती झल्लाय, पूत छै जात बिगाडू।

गास्यो ले गणेस थाळ में जै हो लाडू॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बिहारी शरण पारीक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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