धर वराह अवतार, मुरदाणु हरि मारियो।

डाढा दई पसार, सारो साथ सिंघारियो।

सगळो साथ सिंघारियो नै, पापी किया पेमाल।

मुख में रोल रवे ज्यों राख्या, डाढा बीच दयाल।

अपणां संत उबारिया, सही सिरजणहार।

पोकर तीर्थ परकट कियो, धर वराह अवतार॥

स्रोत
  • पोथी : जांभोजी विष्णोई संप्रदाय और साहित्य ,
  • सिरजक : आलम जी ,
  • संपादक : हीरालाल माहेश्वरी ,
  • प्रकाशक : सत साहित्य प्रकाशन, कलकत्ता ,
  • संस्करण : प्रथम
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