दूहा

केइ बालपणे समज्या नहीं, वले जोबन दीधो खोय।

पछें बुढापो आयां थकां, कुण कुण अवस्था होय॥

शक्ति घटी देही तणी, वले वली लीलरी आय।

तिणसूं कमायो पिण जावे नहीं, जब बेठो रह घर मांय॥

जब गमतो लागें केहनें, वले दीठांई सुहाय।

पुण्य संचो पूरो हुवो, हिवें दुख मांहें दिन जाय॥

खाट पड्‌यो खूं खूं करे, हुइ सूगली देह।

हाल हुकम चाले नहीं, परिजन फिर दीधो छेह॥

भूख तृषा पीड्यो थको, पामें दुख अतंत।

जरा आइ जोबन गयो, जब कुण-कुण हुवे वृतंत॥

चौपाई

बूढो डिगतो डिगतो चाले, आंख नाक झरे सिर हाले।

कांख वाय ज्यूं मस्तक घूणे, जब जाय बेठो घर खूणें॥

बूढो खूं खूं करतो थूके, घर रा तिण ऊपर कूकें।

नींठ नीठ दड लीप सुधार्‌यो, थें तो सगळो आंगण विगाड़्यो॥

बूढे हाठ हवेली कराया, तठे वेसण दे जाया।

नोहरे जाय बेसाण्यो एकंत, सार संभार को करत॥

सुसरे करे घणी नरमाइ, पुत्र नी बहु नें बतळाइ।

है तूं बडा साजन की जाइ, मोनें ठंडो सो पांणी पाइ॥

हूंतो होवुं छूं कातण सूं खोटी, हूं तो किम भर ल्यावुं लोटी।

इम सुण हुवो बूढो उदास, न्हांखे हिया मांसूं निसास॥

बूढा सूं बेठो रहणी नावें, वले बेटा री बहु नें बोलावे।

कहे मोसूं बेठो रह्‌यो जाय, खाट गूदड़ी दे तूं बिछाय॥

म्हारा बालक बालकी रोवें, ते तों पालणियां में सोवें।

यांने छोडपरी किम जाऊं, खाट गूदड़ी केम बिछावूं॥

सुसरा मोनें क्यांनें संतावो, थारां बेटां नें कांम भोळावो।

बेटा नें बोलायां मूंन साझे, कने ऊभो रह्‌यो पिण लाजे॥

बूढळा रा पुन्य परवार्‌या, तिणसूं वचन जाए मार्‌या।

जब बूढळो मन में खीजे, बेटा बहु मूल भीजे॥

बूढा रे बाळपणा रा हेवा, जाणे खावूं मिष्ठान नें मेवा।

मन गमता भोजन खावूं, लाडू पेड़ा जलेबी मगावूं॥

उन्हों सीरो मगद वले खाजा, एहवा भोजन ताजा।

जाणे नरमसी खीचड़ी खावू, दही दूध ने बूरो मंगावूं॥

बूढा नें आछा भोजन भावे, पुन्य बिनां कहो कुण खवावे।

तो स्वारथ किणरे आवे, तिण सूं घर रां ने मूळ सुहावे॥

घर सूं सूखी लूखी रोटी आवे, ते तो दांता सूं खाइ जावे।

जब बूढो हुवो दिलगीर, काढें आख्यां मां सूं नीर॥

जां की बोली पिण सुहावे, मीठा भोजन कुण खवावे।

बूढे हाथां सूं द्रव्य कमाया, बेटा दाब रह्‌‌या धन माया॥

जब कर कर लोकां ने भेळा, करे बेटा बहुं नीं हेला।

म्हारां कह्या में को नहीं चाले, पूरो धान खावानें घाले॥

जब लोक हसें पीटें ताल्यां, बोले बेटा बहु नें गाल्यां।

कहे बेटा बहु ने एम, डोकरा नें दुख दो केम॥

केइ केहवा लागा आम, थें तो मत हुवो लूण हराम।

जब बेटा बहु इम बोले, डोकरा रा परदा खोले॥

तो लोका सूं एकठ मांडे, म्हाने यूं ही अनाखी भाडें।

म्हे तो आछा भोजन नित घालां, इणरे केडें सगळा चालां॥

इणरे पीत मुरीद कांई, तो यूं ही करे विकळाई।

इणरी गइ अकल विग्यांनो, इणरी बात कोइ मत मांनो॥

बूढा रो कुण ऊठे बेली, उणरी बात गइ सर्व ठेली।

बूढा रा पुन्य पड़ गया पूरा, तिण सूं सेंण सगा हुवा दूरा॥

निज नारी री आहिज रीत, बूढा सूं धरे प्रीत।

वले ओर सगा सेंण सारा, बूढा सूं होय जाय न्यारा॥

कदे घी गुळ सूंधा होय जात, जब वांछे बूढा री घात।

घर रां तो मांड्‌यो अति आंचो, तों मरे छोडे माचो॥

बाल जवान तो मर जावे, इण बूढा नें मरण आवे।

तों नित नवों होय रह्‌यो सेंठो, म्हारें वारणे रिणाइ ज्यूं बेठो॥

म्हे तो सगळा हुवां छां काया, इण डोकरे वोहत सताया।

इणरी दांई ना पर गया विरखो, तो अजे मुंवो जरखो॥

म्हांरे उघड़ी पाप री खांनो, इण बूढा सूं पड़ियो पानो।

एहुवा वचन बूढा नें सुणावे, जब बूढो अतंत दु:ख पावे॥

बूढे कर्म कीया था जाडा, ते तों आया कुबेळां में आडा।

ते भोगवतां दुख पावे, सुमता विण पड़ियो सीदावे॥

बूढा री विपत अनेक, पूरी कहणी नावें वशेख।

थोड़ीसी कही बांनगी मात, देखो अरुबरू साख्यात॥

इणरी सुणज्यो लोक लुगाइ, एहवी विपत बुढापे आई।

जो पेंहली धर्म करतो, एहवी विपत में क्यांनें पड़तो॥

बूढो पेंहलां बूहो मद छकियो, जिण धर्म ओळख नहीं सकियो।

हिवे रह्‌यो आरत ध्यांन ध्याय, तिण सूं धर्म कीयो किम जाय॥

बूढे पेंहलां कीधी कूड़ी सेखी, रह्‌यो धर्म तणो नित धेखी।

करतो साधु श्रावकां री हेला, हिवे आय पड़ी छे बेलां॥

पेंहलां कीधी न्यातीलां ठेलो, जिण धर्म नें जांणियो सेलो।

हिवें न्यातीला आडा आवे, जब आप पड़्यो पिछतावे॥

मोह माया में रह्‌यो कळियो, दुरगति नों टांको झलियो।

जोबन हुंतो ते दीधो गमाय, हिवे कारी लागे काय॥

पछें मरनें माठी गति जावे, चिहुंगति में गोता खावे।

पाप आगे चाले जोरो, पाछो नर भव पावणो दोरो॥

केइ बूढा घर रां नें डरावे, लड़ झगड़ नें आछो खावे।

वले कर कर लोकां नें साखी, बेटा बहु ने भांडे अन्हांखी॥

वले करे खीटोर खोराई, घर रां नें घणो दुखदाइ।

केइ बूढा छे एहवा पापी, रह्‌या घर रां नें नित संतापी॥

केइ बूढा सूधा हुवे जोग, बेटा बहु मिलिया अजोग।

कदा आछी वस्तु बूढो खावे, तो उवे खूणे घाली घुरकावे॥

कहे तूं तो हुवो गटकायो, म्हांरे धन नहीं घर मांयो।

सूधो बेठो रोटी क्यूं खावे, म्हाने कांय अन्हाखी सतावे॥

जब बूढो संके लाजां मरतो, बारे वचन काढे डरतो।

बूढ़े कीयो विचारज ऊंडो, रखे दीसूं लोका में भूंडो॥

एतो कर रह्या फेन फितूरो, म्हांरे धोळां में घालें धूरो।

यांनें छेड़वियां नहीं बाकी, रखे जावे बूढापे नाकी॥

म्हांरो कांण कुख थो भारी, रखे लोकिक बिगड़े म्हारी।

इम जांणी बूढ़े मूंन साझी, जांण्यो राखूं बूढापे बाजी॥

जो हुवे दोयां मांहे लजिया, तिणरा घर मांसू मिटे कजिया।

कुड कुड काढे राता डोळा, नीकळे नित सांग बनोळा॥

बात करता माथे सळ चाढे, नितका दुख में दिन काढे।

देखो नीठ मानव भव पायो, राग धेख में यूही गमायो॥

संसार ना सगा सर्व काचा, त्यांने जाण रह्या मूढ साचा।

तिण री बुधवंत करज्यो पिछाणो, याने जाणज्यो बैरी समाणो॥

केइ बूढा रे पुन्य रहे बाकी, घर रा कार लोपे जाकी।

जिण रे पूर्व पुन्य छे भारी, तिणरी मरजादा राखे नारी॥

जिण पूर्व पुन्य उपाया, त्यारे हाथ जोड़ रे जाया।

जो थोड़ीसी वस्तु मंगावे, तो उवे थाळ भरी बेगा ल्यावे॥

सर्व जी जी कारे बतळावे, वले बूढा को हुकम चलावे।

मन गमता भोजन खवावे, सारा पेहली बूढा ने जीमावे॥

जिण पूरी कीधी पुन्याई, बेटा बहु मिल्या सुखदाई।

रूड़ा रूड़ा वस्त्र पहरावे, सुख सेज्या माहे पोढावे॥

वले काण कुख राखे भारी, सगळा रहे आगन्या कारी।

देव परमेश्वर ज्यूं पूजे, करड़ी नजर कीया सर्व धूजे॥

एहवा सुख में बूढो रति पामे, वले रही लोकिक लोका मे।

बूढो एहवी साता सुख पाय, घणो मगन हुवो मन मांय॥

एतो सारा मिल्या सुखदाय, पिण त्रांण शरण नहीं थाय।

एतो इण भव केड़े चाले, परभव जाता साथे हाले॥

साथ आवे पुन्य ने पाप, सुख दुख भोगवे आपोआप।

इम सांभळ नें नर नारी, करज्यो मन माहिं विचारी॥

एहवा सुख तो सगळाइ फीका, त्यानें कदे जाणो नीका।

ते तो थोड़ा माहे विललावे, सुपना जिम आल माल होय जावे॥

त्यांमें कदे जांणज्यो सार, ते तो मिलिया अनती बार।

एहवा सुख ऊपर निजर दीजें, करणी कर लाहो लीजें॥

स्रोत
  • पोथी : भिक्षु ग्रंथ रत्नाकर भाग 1 ,
  • सिरजक : आचार्य भिक्षु ,
  • संपादक : आचार्य तुलसी, श्रीचंद रामपुरिया ,
  • प्रकाशक : जैन श्वेताम्बर् तेरापंथी महासभा, कलकत्ता ,
  • संस्करण : प्रथम
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