हिव सीता रोती-थकी, रावण राखई अेम।
मारग मइं जोतो-थको, मधुर वचन धरि प्रेम॥

कामी रावण इम कहइ, सुणि सुंदरि सुजगीस।
बीजा नामइं अेक सिर, हूं नामुं दस सीस॥

मूंकि सोग तुं सर्वथा, आणि तुं मन उल्हास।
साम्हो जोइसि राग सूं, हुं तुझ किंकर दास॥

कां बोलइ नहिं कामिनी, द्‌यइ मुझको आदेस।
साम्हो जोइ सभागिणी, मुझ मनि अति अंदेस॥

जउ तुं हंसि बोलइ नहीं, तो पणि करि अेक काम।
दे निज चरण प्रहार तूं, मुझ तन आवइ ठाम॥

सीता सुंदरि देखि तूं, पृथिवी समुन्द्रा सीम।
तेहनो हुं अधिराजियो, भांजु दूरजण भीम॥

राजरिद्धि अति रूयड़ी, तूं भोगति भरपूर।
इंद्र इंद्राणीनी परइं, पणि मुझ बंछित पूरि॥

इम वेखास घणा किया, रावण कामी राय।
सीता उपराठी रही, कहइ कोपातुर थाय॥

हा हतास, हा पापमति, हा निरलज, निरभाग।
पर-रमणी बांछइं जिको, ते तो काळो काग॥

आज पछी मुझ अेहवी, मत कहइ बात सपाप।
कां मइलो करइ बंस नइं, कां लाजवीइ मां-बाप॥

नरग पडइं कां बापड़ा, कांइ लगाड़इ खोड़ि।
रावण हुयो कुसीलियो, कहिस्यइं कवियण कोड़ि॥

कां तूं परणी आपणी, छोडि कुळीनी नारि।
परणी बांछइ पारकी, मूरख हियइ विचारि॥

इण परि घणु निभ्रंछियो, राणो रांवण सीति।
बार-बार पाए पड़इं, कहइ मुझसुं करि प्रीति॥

सीताइ तृण सरिखउ गिण्यउं, सीधो उत्तर दिद्ध।
तो पणि लंका ले गयो, रावण आसा बद्ध॥

देवरमण उद्यानमइं, मुंकी सीता नारि।
आडंबरसुं आप पिण, पहुतो भवन मझारि॥

सिंहासन बइठउं सभा, रांणो रावण जाम।
चंद्रानखा रोती थकी, ततखिण आवी ताम॥

साथे ले मंदोदरी, प्रमुख दसानन नारि।
सुणि बांधव हुं दुख भरी, मुझ वीनती अवधारि॥

खरदूषण मुझ प्राणपति, वलि संवुक्क सुपुत्र।
ए बिहुंनो मुझ दुख पड़्यो, नहिं जीवणनो सूत्र॥

स्रोत
  • पोथी : सीताराम चौपाई ,
  • सिरजक : समयसुंदर ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा, भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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