नगर रो वरणाव



देखा नगर सुहायणा, अधिक सुचगा थान।
नाउं चगेरी परगट, जन सुर लोक सुजान॥

ट्ठाइ मिंदिर सत खिने, सो नइ लिहिया लेहु।
छीहल तन की उपमा, कहत न आवइ छेहउ॥

ट्ठाइ ट्ठाइ सरवर पेखीया, सू सर भरे निवाण।
ट्ठाइ कूवा बावरी, सोहइ फटक समान॥

पवन छतीसी तिहा वसइ, अति चतुराई लोक।
गुम विद्या रस आगला, जानइ परिमल लोग॥

तिहां ठइ नारी पेखीयइ, रंभा केउ निहारि।
रूप कंत ते आगली, अवर नहीं संसार॥

पहरि सभाया आभरण, अर दख्यण के चीर।
बहुत सहेली साथि मिलि, आई सरवर तीर॥

चोवा चंदन थाल भरि, परिमल पहुप अनंत।
खड़ह बीड़ी पान की, खेलहु सखी बसंत॥

केइ गावइ मधुर धुनि, केइ देवहि रास।
केइ हींडोलइ हींडती, इह विधि करइ विलास॥

नयनह काजळ ना दीउ, ना गळि पहिंदो हार।
मुख तंबोळ न खाईया, ना कछु कीया सिंगार॥

रूखे केस ना न्हाईया, मइले कप्पड़ तास।
विलखी बइसी उनमनी, लांबे लेही उसास॥

सूके अहर प्रवाळीया, अति कुमळाणा मुख।
तउ मइ बूझी जाइ कह, तुम्ह कहउ केतउ दुख॥

दीसय योवन बालिया, रूप दीपती देह।
मोसउ कहउ विचार, जाति तुम्हरी केह॥

तउ ऊनि सच आखीया, मीठा बोल अपार।
ना वह मारी जाति की, छीहल्ल सुनहु विचार॥

मालन अर तंबोलनी, त्रीजी छीपनि नारि।
चउथी जाति कलाळनी, पंचमी सुनारि॥

जाति कही हम तम्ह सउ, अब सुनि दुख हमार।
तुम्ह तउ सुगना आदमी, लहउ विराणी सार॥

मालिण री विरह-व्यथा

पहिली बोली मालनी, मुझं कूं दुख अनंत।
बालइ योवन छड़ि कइ, चल्यु दिसाउरि कंत॥

निस दिन बहइ पवालज्यु, नयनह नीर अपार।
विरहउ माली दुक्ख का, सूभर भर्‌या किनार॥

कमल वदन कुमळाईया, सूकी सूख वनराइ।
वाझू पीया रइ एक खिन, वरस बराबरि जाइ॥

तन तरवर फळ लग्गीया, दुइ नारिंग रस पूरि।
सूकन लागा विरह फळ, सींचन हारा दूरि॥

मन बाड़ी गुण फूलड़ा, प्रीय नित लेता बास।
अब इह थानकि रात दिन, पीड़इ विरह उदास॥

चंपा केरी पंखड़ी, गूंथ्या नव सर हार।
जइ इहु पहिरउ पीव बिन, लागइ अंग अंगार॥

मालनि अपना दुख का, विवरा कह्या विचार।
अब तूं वेदन आपनी, आखि तंबोलन नार॥

तंबोलण री विरह-व्यथा

दूजी कहइ तंबोलनी, सुनि चतुराई बात।
विरहइ मार्‌या पीव बिन, चोली भीतरि गात॥

हाथ मरोरउ सिर धन्यु, किस सउ कहु पोकार।
जउती राता वालहा, करइ न हम दिस भार॥

पान झड़े सब रूंख के, वेल गई तनि सुक्कि।
दूभरि रति बसंत की, गया पीयरा मुक्कि॥

हीयरा भीतरि पइसि करि, विरह लगाई आगि।
प्रीय पानी बिनि ना बूझवइ, बळीसि सबळी लागी॥

तन बाली विरहउ दहइ, परीया दुक्ख असेसि।
ए दिन दुभरि कउं भरइ, छाया प्रीय परदेसि॥

जब थी बालम वीछुड़्या, नाठा सरिवरि सुख।
छीहल मो तन विरह का, नित्त नवेला दुख॥

कहउ तंबोलनि आप दुक्ख, अब कहि छीपन एह।
पीव चलतइ तुझसउं, विरहइ कीया छेह॥

छीपन रो विरह-वरणन

त्रीजी छीपनि आखीया, भरि दुइ लोचन नीर।
दूजा कोइ न जानही, मेरइ जीय की पीर॥

तन कपड़ा दुक्ख कतरणी, दरजी विरहा एह।
पूरा व्योत न व्योतइ, दिन दिन काटइ देह॥

दुक्ख का तागा वाटीया, सार सुई कर लेइ।
चीनजि बधइ अवि काम करि, नान्हा वखीया देइ॥

विइहइ गोरी अतिदही, देह मजीठ सुरंग।
रस लीया अवटाइ कइ, बांकस कीया अंग॥

माड मरोरी निचोरि कइ, खार दिया दुख अति।
इहु हमारे जीव कहु, मइं न करी इहु भ्रंति॥

सुख नाठा दुख संचर् या, देही करि दहि छार।
विरहइ कीया कंत वनि, इम अम्ह सुं उपगार॥

कलालण रो विरह

छीपनि कह्या विचार करि, अपना सुख दुख रोइ।
अबहि कलालनि आखि तुं, विरहइ याई सोइ॥

चउथी दुख सरीर का, लागी कहन कलाळि।
हीयरइ प्रीयका प्रेम की, नित्त खटूकइ भालि॥

मोतन भाठी ज्युं तपइ, नयन चुवइ मद धारि।
विनही अवगुन मुझ सुं, कस कर रह्या भरतार॥

देखिइ केली तइ दई, विरह लगाई घाइ।
बालभ उलटा हुइ रह्या, परउप छारी खाइ॥

इस विरहइ के कारणइ, धन बहु दारू कीय।
चित्त का चेतन ट्ठाहस्या, गया पीयरा लेय जीय॥

माता योवन फाग रीति, परम पीयारा दूरि।
रली न पूरी जीयकी, मरउ विसूरि विसूरि॥

हीयरा भीतरि झूर रहुं, करूं घणेरा सोस।
बइरी हुआ वालहा, विहरइ किसका दोस॥

मोसउं व्युरा विरह का, कह्या कलालन नारि।
इहु कुछु दुख सरीर महि, सो तु आखि सुनारि॥

सुनारिण रो विरह-वरणन

कहइ सुनारी पंचमी, अंग उपना दाह।
हूं तउं बूड़ी विरह मइ, पाउं नाही थाह॥

हीया अंगीट्ठी मूसि जिय, मदन सुनार अभंग।
कोयला कीया देह का, मिल्या सवेइ सुहाग॥

टका कलिया दुख का, रेती न देइ धीर।
मासा भासा न मूकीया, सोध्या सब सरीर॥

विहरह रूप बुराइया, सूना हुआ मुझ जीव।
किस हइ पुकारूं जाइ कइ, अब घरि नाही पीव॥

तन तोले कंटउ धरी, देखी किस किस जाइ।
विरहा कुंड सुनार ज्यउं, घड़ी फिराय पिराइ॥

खोटी वेदन विरह की, मेरो हीयरो मांहि।
निसि दिन काया कळमळइ, ना सुख धूपनि छांह॥

छीहल वयरी विरह की, घड़ी न पाया सुख।
हम पंचइ तुम्ह सउं कह्या, अपना अपना दुख॥

कहि करि पंचउ चलीया, अपने दुख का छेह।
बाहुरि वइ दूजी मिली, जवह धड़ूक्या मेह॥

भुइं नीली घन पूंवरि, गुनिहि चमकी बीज।
बहुत सखी के झूंड मंई, खेलन आइ तीज॥

विहंसी गावइ हि रहिससुं, कीया सह संगार।
तब उन पंच सहेलीयां, पूछी दूजी वार॥

पांच स्त्रियां रो अपूठो मेळ

मइं तुम्ह आमन दूमनी, देखी थी उतवार।
अब हुं देखुं विहंसती, मोसउं कहइ विचार॥

छीहल हम तउ तुम्ह सउं, कहती हइ सतभाइ।
साई आया रहससुं, ए दिन सुख मांहि जाइ॥

गया वसंत वियोग मइं, अर घुख काळा मास।
पावस रिति पीय आवीया, पूगी मन की आस॥

मालनि का मुख फूल ज्यउं, बहुत विगास करेइ।
प्रेम सहित गुंजार करि, पीय मधुकर सलेइ॥

चोली खोल तंबोलनी, काढ्या गात्र अपार।
रंग कीया बहु प्रीयसुं, नयन मिलाई तार॥

छीपनि करइ वधाईयां, जउ सब आए दिट्ठ।
अति रंगिराती प्रीयसुं, ज्यउं कापड़इ मजीठ॥

योवन बालइ लटकती, रसि कसि भरी कलाळि।
हंसि हंसि लागइ प्रीय गळि, करि करि बहुती आलिं॥

मालनि तिलक दीपाईया, कीया सिंगार अनूप।
आया पीय सुनारि का, चढ्या चवगणा रूप॥

पी आया सुख संपज्या, पूगी सबइ जगीस।
तब वह पंचइ कामिनी, लागी दयन असीस॥

हुं उ वारी तेरे बोलकुं, जहि वरणवी सुट्ठाइ।
छीहल हम जग मांहि रही, रह्या हमारा नांव॥

धनिस मंदिर धन्न दिन, धनस पावस एह।
धन वल्लभ घरि आईया, घनस चुट्ठा मेह॥

निस दिन जाइ आनंद मइं, विलसइ बहु विध भोग।
छीहल्ल पंचइ कामिनी, आई पीय संजोग॥

मीठे मन के भावते, कीया सरस वखाण।
अण जाण्या मूरिख हंसइ, रीझइ चतुर सुजांण॥

संवत पनर पंचहुत्तरइ, पूनिम फागण मास।
पंच सहेली वरणवी, कवि छीहल्ल परगास॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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