चित्तौड़ वरणन


देश बड़ो ‘मेवाड़’ दयाल, प्रारथियां दुखिया प्रतिपाल।
‘चित्रकूट’ तिहां चावो अछै, पहोवी गढ़ बीजा तसु पछै॥

गावै मीठे सुर गंधर्व, सुरनर किन्नर देखे सर्व।
तापस तीर्थ तिहां अति कह्या, राम जिहां वनवासै रह्या॥

ऊंचो गढ़ लागो आकास, हर भूल्यो जाण्यो कविलास।
हर राणी तब कीधो हास, हिम गढ़ चढ़ीयो हेमाचल पास॥

बले अति बांको छै गढ़ घणो, ऊंची पोलि अनैं सोहामणो।
कोसीसा जे ऊंचा कीया, गयण आलंबन थांभा दिया॥

बहैं नदी सीप्रा विस्तार, कूप सरोवर वावि अपार।
गौमुखकुंड प्रमुख बहुकुंड, पाणी जास पीइं खट खंड॥

संचा वस्त अनेको तणा, का न रहइ मननी कामिणा।
ऊंचा तोरण महल अनेक, एक-एक थी अधिका एक॥

सोवन दण्ड धजा करि सोहता, मनड़उ भविक तणा मोहता।
दीपै तिहा जिन शिव देहरा, मोटा सिहर सरद मेहरा॥

वारू चउरासी बाजार, हुंसी बैठा हारो हार।
राज महल अति रलीयामणा, पुण्य बिना ते नहिं पावणा॥

च्यारे वर्ण वसइ अति चंग, पवन अढारें मन नें रंग।
माणिकचउक न लहैं माग, वन वाड़ी फल फूल्या बाग॥

इंद्रपुरी जाणे अवतरी, कोड़ीधज लोके करि भरि।
नगर वर्णनो नावे पार, देव रचई ए गढ़ सार॥

चतुर सुण्यो देह नइं चित्तं, गुर मुख ढाल अरथ सुपवित्त।
‘लब्धोदय’ कहै पहली ढाल, आगइ सुणता अछै रसाल॥

 

राजा रो वरणन

दूहा

सूर वीर अति साहसी, सब राई मइ सिरमौर।
‘रतनसेन’ राणो तिहां, जा सम भूप न और॥

जाकइ तेज प्रताप थइं, दुरजन भागे सब दूर।
अंधकार कैसे रहइ, उदइ होइ जीहां सूर॥

अविचल आज्ञा अवनि परि, न्याय निपुण निरभीक।
अरिगल भंजन केसरी, राखे खत्रीवट लीक॥

मानी मरदाना वली, दरबारइं दोय लाख।
सुभट खड़ा सेवा करइं, सुरपति वदइ ज्युं साख॥

हय गय रथ पायक हसम, करि न सकें कोउ मान।
रयण द्युस ठाढइ रहे, सनमुख सब राय राण॥

पटराणी रो वरणाव

पटराणी ‘परभावती’, रूपे रम्भ समान।
देखत सुरनर किन्नरी, अइसी नारि न आन॥

चंदवदन गजराज गति, पनग वेणि मृग नयण।
कटि लचकनी कुच भार तइं, रति अपछर हइं अयन॥

राणी अवर राजा तणें जी, रूप निधान अनेक।
पिण मनड़ो परभावती जी, रंज्यो करीय विवेक॥

सतर भक्ष भोजन सझें जी, नित नित नवली भांति।
व्यंजन रूड़ी विध करइजी, खाता उपजै खाति॥

रूपवंत नइ रागणी जी, गुणवंती गज गेलि।
मन राजा रो मोहियो जी, सोक्या सहुइ ठेलि॥

भोजन तो परभावती जी, हाथ परुसइ हूँस।
बीजी राणी वारणै जी, सहजे जावा सुंस॥

माहो माही मोहस्युं जी, रति सुख माणइ राय।
खिण एक विरह नवी खमइ जी, दीठां दोलति थाय॥

पालइ राम तणी परइ जी, न्यायइं राज नरेस।
आप भुजा अरीयण हण्या जी, सरद कीया सहुदेस॥

राजकुंवर वरणन

जनम्यो पुत्र महाजसी जी, प्रतापी पुण्यवंत।
‘वीरभाण’ वखते बड़ो जी, दिन दिन अधिक दीपंत॥

भोजन-प्रसंग

एकण दिन भोजन समइं जी, दासी बोलैं राज।
पीउ पधारो भोजन समइं जी, ठाढो होवै नाज॥

सिंहासन सोवन तणो जी, आवै बैठा राज।
रतन जड़ित थाली बड़ी जी, कनक कचोला बाज॥

रुड़ी परइं परुसइं रसवती जी, राजा जीमइ राग।
खाटा मीठा चरपरा जी, सखर वणाया साग॥

कदली दल हाथैं करी जी, ढोलै सीतल वाय।
विचि विचि मीठी वातड़ी जी, जीमतां घणो जीमाय॥

मोसा दोसा मसकरी जी, हासै वीनती तेह।
कहिवो हुवै ते सहु कहइ जी, भोजन अवसर जेह॥ 

जीमता रूड़ी जुगति स्यु जी, कहि राजा किण हेत।
स्वाद रहित सब रसवती जी, का न करो चित चेत॥

आजकालिए रसवती जी, निपट करो निसवाद।
कहि चतुराइ किहा गइ जी, कै पकर्‌यो परमाद॥

तब तटकी बोली तिसइं जी, राणी मन धरि रोस।
राणी आणो कां नवी जी, द्यो मति मुझनै दोस॥

म्हे केलवि जाणा नहीं जी, किसो अ करीजैं वाद।
पदमणि का परणो नवी जी, जिम भोजन हुवै स्वाद॥

राजा गुरु स्त्री आगि नो जी, नवि कीजैं आसग।
‘लब्धोदय’ इण परि कहें जी, बीजी ढाल सुरंग॥

 

पद्मिनी पाणिग्रहण री प्रतिज्ञा

दूहा

रीसाणो उठ्यो तुरत, तजि भोजन तिण वार।
राणो तो हुं रतनसी, परणुं पदमणि नारि॥

मोसा तो बोल्या मुनें, जइं में राख्यो मान।
हिवे परणुं तरुणी पदमणी, गालुं तुज्झ गुमान॥

मूरिख तें मुझ नें गण्यो, वचन कह्यो अविचार।
जो पदमणि हाथे जीमस्युं, तो आवुं तुझ बार॥

मान गहेली माननी, विरुअउ बोल्यो वयण।
विण आदर न रहें कदे, सिंह सूर नें सयण॥

गाहा

जणणी जण बंधू, भजा गेह धणं च धन्नं च।
अवि माणया पुरिसा देस दूरेण छंडंति॥

दूहा

कीधी परतज्ञा इसी, मन सेती महाराय।
पदमणि परणुं तो घरि रहुं, नहिं तो गिरि वनराय॥

सिंहलदीप प्रस्थान

इम चित विमासी राय, अश्व दोय घन भर्‌या रे।
साथें एक खवास, छाना नीसर्‌या रे॥

छल करि दोन्युं असवार कि, चाकर नें धणी रे।
जाता नवि जाणें कोइ कि, गया ते भूंय घणी रे॥

स्वामी कहूं कारिज साच कि, सेवक इम भणें रे।
अणजाण्यां आंधि न सेठ कि, दोड़्यां किम वणें रे॥

विण गाम किंहा थी सीम कि, मेह विण वादलइ रे।
ऊखर नवि ऊगै अन्न कि, न खेती विण हलइ रे॥

तिण हेतइं भाखो मुझ कि, गुझ हिरदै तणो रे।
कीजै तसु उपरि काज कि, विचारी आपणो रे॥

तब बोल्यो राजा एम कि, परणुं पदमणी रे।
आदरि करि करिहु उपाय कि, बात कहुं सी घणी रे॥

बोलें सेवक धन्न मो पास कि, असंख्य गाने घणो रे।
पिण नवि जाणुं गृह गाम कि, ठाम पदमणी तणो रे॥

थानिक जाणे विण मारग कि, कह्यो बूझयां किणै रे।
तरु तलि लीधो विश्राम कि, ते बेहु जणें रे॥

तिण बेला पंथी एक कि, भूख त्रिस भेदीयउ रे।
विण अमलें गहिलें देह कि, पंथ अति देखियउ रे॥

अटवी मांहि माणस एक कि, जोता नवि जुड़यो रे।
तदि देख्यो राजा तेण कि, पगि आवी पड़यो रे॥

कीधा सीतल उपचार कि, अमल पाणी दीयो रे।
भोजन मेवा बहु भांति कि, राय संतोषीयो रे॥

पथीक नै कोतिक बात कि, राय पूछें वली रे।
देख्यो तें पदमणी देश कि, किंहा हि सांभली रे॥

सुणि राजन सिंघलद्वीप कि, दक्षिण दिशि अछै रे।
आडो बहैं जलधि अथाह कि, पार जेहनो न छै रे॥

तिहां पदमणि नारि अनेक कि, रूपें अपछरी रे।
सुणि राजा देइ कान कि, सीख तिण सु करी रे॥

मनिं आणिंद्यो महाराय कि, दीप सिंघल भणी रे।
चालविया चपल तुरंग कि, पवन थी गति घणी रे॥

लांघ्या गिर नगर निवाण कि, सूर अति साहसी रे।
दोन्युं आया दरिया तीर कि, मन माहि अति खुशी रे॥

जगि पुण्य सहाइ जास कि, तास पूजें मन रली रे।
मुनि ‘लब्धोदय’ कहै एमकि, को न सकै कली रे॥


समंदर वरणाव

दूहा

जळ भरीयो दरीयो घणो, उछळता उद्धांन।
कल्लोले कल्लोले थी, उदक वध्यो असमान॥

मच्छ कच्छ मांहिं घणा, न सकें जाय जीहाज।
न चले जोरो नीरस्युं, कीज्ये किसो इलाज॥

चिंता मन भूपति चतुर, स्युं कीजै जगदीस।
वेलि महा बीहामणी, पूजें केम जगीस॥

पदमणि स्युं पाणीग्रहण, विचि वारिधि अति क्रूर।
ऊखाणो साचो हुओ, बाघ नदी जल पूर॥

गुड़ मीठो ऊंडी नदी, आय मिल्यो ए न्याय।
हिकमति सी बीजी हिवें, कीजें कोउ उपाय॥


जोगी सूं मिळाप

जावइं आघो जेहवें, सेवक लीधो साथ।
जोग पंथ साधइ जुगतिं, निरख्यो अउघड़नाथ॥

काने मुद्रा कनक की, आसण चीता चर्म।
लगाय विभूति तप जप करें, ते साधे शिव धर्म॥

सिध साधक योगी भणी रे, जाय कीयो आदेस रे।
वार वार वीनती करी रे, लागो पाय नरेस रे॥

मुझ मनि सिंघलद्वीप नी रे, पदमणि देखण चाह।
तुझ परसादे सहु हस्यें रे, हिव मुझ सी परवाह रे॥

विविध विनय वचने करी रे, सुप्रसन्न हुओ साम।
आंखि उघाड़ी देखीयो रे, बोलायो ले नाम रे॥

भूपति मन अचरिज थयो रे, किम जाण्यो मुझनाम।
ए ज्ञानी आयस अछै रे, पूरवस्यै मुझ हाम रे॥

जोगी जंपे राणजी रे, तुं आयो मुझ थान।
कारिज थांरो हुं करुं रे, जो गुरु लागो कान रे॥

ईम कही सांही समरणी रे, हाथे बेऊं असवार रे।
आयस अंबर ऊडीयो रे, लागी बार न लिगार रे॥

स्रोत
  • पोथी : पद्मिनी चरित्र चौपाई ,
  • सिरजक : कवि लब्धोदय ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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