आकुली बोलि पाछइ पछिताइ।

हिव किउ नाह मनावणउ जाइ।

हर तूठइ वर पामिजइ।

सासू गिणी देवर जेठ।

म्हाकउ कह्‌यूं राखियउ।

म्हा तोहे गोरड़ी छेहली भेंटि॥

सात सहेलीय रही समझाइ।

निगुणी हे गुण हूवइ तउ नाह किउं जाइ।

फूल पगर जिउं गाहिजइ।

चांपीया तेजीय जउ रे उससाइ।

मृग रे चरंता मोहिजइ।

सखी अंचलि वांधियउ नाह किउं जाइ॥

सात सहेलीय सुणउ म्हारीय बात।

कंचूउ खोली दिखाड्या गात्र।

जा दीठां मुनिवर चलइ।

म्हाकउं मूरख राव जाणए सार।

त्रियां चरित मइ लख कियां।

राउ नहीं सखी भइंस पीडार॥

आबि दमोदर बैठो छइ पाट।

कैह नइ म्हाका प्रीउ की बात।

खरो पयाणउ ऊपरइ।

आठकउ थावर बारमउ राह।

ग्रह गण तो अतिही बुरा।

सिर धुणि गोरी मेल्ही धाह॥

पंडिया हुं थारी गुणकेरी दासि।

जोसीड़ा दीह मंउडउ परगासि।

मास च्यारि विलंबाविज्यो।

तेतलइ ल्यउंगी म्हाकउ प्रीय समझावि।

देसू हाथ कउ मूंद्रडउ।

सोवन सींगी कविलीय गाइ॥

पंडिया तोहि बोलावइ रे राव।

लेइ पतड़उ पंडिया राउलइ आइ।

सुदिन सोधे म्हारा जोसियां।

काढि पतड़उ अरु बोलि साच।

मास च्यारि राजा दिन नहीं।

स्वामी तित्थ तेरस नइ मंगलवार।

इग्यारमउ चंद्रमा देव नइ।

त्रीजउ चंद्रमा घोड़िला जोग।

जोगिनी काल भद्रा नहीं।

पुखि नक्षत्र नइ कातिग मास।

तठउ राजा तुम्हे गम करउ।

आगिलउ राजा पुरवइ आस॥

चालियउ उलगाणउ छइ सउण।

राजा नइ चालतां बरजस्यइ कउण।

कह्याय हमारउ जे सुणउं।

स्वामी सेव दुहेली अरु परदे।

कर जोड़ी कामणि कहइ।

देखि कुबुद्धीय धण केरउ बेस॥

साधण ऊभी छइ टेकि कमाडि।

कडिहि पटोली चुनड़ी सार।

काने हो कुंडल झिगमगइ।

पगे हो पाइल खरीय सुचंग।

हीरा जड़ित माथइ राखड़ी।

मोनइ सरब गति बीसरी तारी चींत।

राति दिवस चालूं करइ।

स्वामी थां घरि छइ किसी इह रीति॥

लाड गहेलीय हे लाड निवारि।

तुरिय पलाणिया ऊभा छइ वार।

पहिर पटोलीय हे चूनड़ी।

कुंकम चंदन चरचि तू गात्र।

दिन उगइ म्हे चालिस्यां।

हसि हसि गोरी पूछि नइ बात॥

स्वामी ऊलग जाण की खरीय जगीस।

राज चलण करि द्यउं तो नइ सीखि।

इण विधि राज माहे संचरइ।

बइठा राजा सभा परधान।

तिणि सुं मीठा बोलिज्यो।

नाई साहुणी नइ घणउ देज्यो मान।

वदड़ी सरिसउं नवि हंसउ।

तठइ राइ बोलाइसी भीतरि गोठि।

राजा जतन करि बोजिज्यो।

कान नइड़ा अरु नीची द्रेठि॥

राजा ऊलग जाण की खरीय दुसार।

राज नी नीति जिसी खंडा नी धार।

मूरख लोक जाणइ नहीं।

चोर जुवारी नइ कल्लाल।

तिण सुं हसीय बोलिज्यो।

राजा जी पूछइ मरम कइ बात।

जूठी सांची थे मत कहउ।

मुंहडा आडउ ते दीज्यो हाथ॥

छंड्या हो गोरी जेसलमेर।

छंड्या टोडा गढ़ अजमेर।

छंड्या टउंक विछाल छइ।

छंड्या राणा का रिणवास।

पंडियउ वउलावी वाहुड्यउ।

गोरी राउ उतर गयउ नदी बनास॥

पंडियउ बोलावि नइ आयउ गोरीय पासि।

नाटिका जीव हीयडलइ सांस।

पलिंग हुं ती धण भुइं पडी।

चीर संभालए पीवए जी नीर।

जाणे हियडइ हरिणी हणी।

उणिरउ गात्र उघाड़ा नइ विकल सरीर॥

सात सहेलीय बइठी छइं आइ।

काढउ पीवए ऊपध पाइ।

दांत सूकट लिया गोरड़ी।

भोली तोथी भलीय दवदंती हे नारि।

सो नल राजा मेल्हि गयउ।

पुरष समउ निगुणी नहीय संसारि॥

रोवती मेल्हि गउ धण कउ रे नाह।

सूनइ मंदिर दीन्हीय छइ धाह।

साधण कुरलइ मोर जिउं।

पाड पाड़ोसण बइठी छइ आइ।

जोवइ निसंतान जेउं बइ गया।

सखीय इणि कति नाह कोइ ऊलग जाइ॥

लंघिया चांविल पाछिला पाल।

डाली देवी अनइ दाहिणी माल।

डावी रे महासती सुर करइ।

वामा हो राजा नइ सिंघ सीयाल।

वामा सारस कुरलिया।

तुरिय डकावइ सइंभरि वाल॥

चालियउ उलगाणउ कातिग मास।

छोडीया मंदिर घर कविलास।

छोडीया चउबारा चउखंडी।

तठइ पंथि सिरि नयण गमाइया रोइ।

भूख गई त्रिस ऊचटी।

कहि सखीय नींद किसी परि होइ॥

मगसिरियइ दिन छोटा जी होइ।

सखीय संदेसउ पाठवइ कोइ।

संदेसइ ही बज पड्यउ।

ऊंचा हो परबत नीचा घाट।

परदेसे पर गयउ।

तठइ चीरीय आवइ चालए बाट॥

देखि सखी हिव लागउ छइ पोस।

धण मरतीय को मत दियउ दोस।

दुखि दाधी पंजर हुई।

धान भावए तज्या सिरि न्हाण।

छांहडी धूप नू आलगइ।

देखतां मंदिर हुयउ मसांण॥

माह मासइ सीय पड़इ ठंठार।

दाध छइ बनखंड कीधा छइ छार।

आप दहंती जग दह्याउ।

म्हाकी चोलीय माहि थी दाधउ गात्र।

धणीय विहूणी धण ताकिजइ।

तूंतउ उवइगउरे आविज्यो करइ पलाणि।

जोबन छत्र उमाहियउ।

म्हाकी कनक काया माहे फेरली आंण॥

फागुण फरहर्‌या कंपिया रूख।

चितइ चकमियउ निसि नींद भूख।

दिन रायां रितु पालटी।

म्हाकउ मूरख राउ देखइ आइ।

जीवउं तउ जोबन सही।

फरहरउ चिहुं दिसि बाजइ छइ बाइ॥

चेत्र मासइ चतुरंगी हे नारि।

प्रीय विण जीविजइ किसइ अधारि।

कंचूयउ भीजइ जण हसइ।

सात सहेलीय बइठी छइ आइ।

दंत कबाड़्या नइ नह रंग्या।

चालउ सखी आपे खेलण जाइ।

आज दिसइ काल्हे नहीं।

म्हे किउं होली हे खेलण जांह।

उलगाणइ की गोरड़ी।

म्हाकी आंगुली काढतां निगलीजइ बांह॥

वइसाखइ धुर लूणिजइ धान।

सीला पाणी अरु पाका जी पान।

कनक काया घट सींचिजइ।

म्हाकउ मूरख राउ जाणइ सार।

हाथ लगामी ताजणउ।

ऊभउ सेवइ राज दुआरि॥

देखि जेठाणी हिव लागउ छइ जेठ।

मुंह कुमलाणा नइ सूक गया होठ।

मास दिहाड़उ दारुण तबइ।

धण कउ हे धरणि लागए पाउं।

अनल जलइ धण परजलइ।

हंस सरोवर मेल्हिउ ठांह॥

आसाढइं धुरि बाहुडया मेह।

खलहल्या खाल नइ बहि गइ खेह।

जइ रि आसाढ आवई।

माता रे मइगल जेउं पग देइ।

सद मतवाला जिम दुलइ।

तिहि धरि ऊलग काइं करेइ॥

स्रावण बरसइ छइ छोटीय धार।

प्रिय विण जीविजइ किसइ आधारि।

सही समाणी खेलइ काजली।

तठइ चिड़य कमेड़ीय मंडिया आस।

बाबहियउ प्रीय प्रीय करइ।

मोनइ अणख लावइ हो स्रावण मास॥

भाद्रवइ बरसइ छइ गुहरि गंभीर।

जल थल महीयल सहु भर्‌या नीर।

जांणि कि सायर ऊलट्यउ।

निसि अंधारीय बीज खिवाइ।

बादल धरती स्यउं मिल्या।

मूरख राउ देखइ जी आइ।

हूं ती गोसामी नइ एकली।

दुइ दुख नाह किउं सहणा जाइ॥

आसोजइ धण मंडिया आस।

मांडिया मंदिर घर कविलास।

धउलिया चउवारा चउखंडी।

साधण धउलिया पउलि पगार।

गउख चडी हरखी फिरइ।

जउ घर आविस्यइ मुंध भरतार॥

हेम की कूंपली मइण की मूंद।

साधण ऊभी रे मत्त गइंद।

चउबारा की चउखंडी।

तठइ बाइ बाजे ना तपइ सूर।

बादल छायउ चंद जेउं।

रात्र अंधारीय जोवन पूर॥

सासू कहइ बहू घर माहे आबि।

चंदरइ भोलइ गिलेसी राह।

चंद पूलाणउ बनि गयउ।

दूधु इम उवरइ मजारि कह फेरि।

पवनहि दीवलउ नवि वलइ।

नाह उड़ीसइ धण अजमेरि॥

अस्त्रीय जनम काइं दीधउ महेस।

अवर जनम थारइ घणा रे नरेस।

रानि सिरजीय रोझडी।

घणह सिरजीय धउलीय गाइ।

बनखंड काली कोइली।

हउं बइसती अंबा नइ चंपा की डाल।

भखती द्राख बीजोरडी।

इणि दुख झूरइ अबला जी बाल॥

आंजणी काइं नि सिरजीय करतार।

खेत्र कमावती स्यउं भरतार।

पहिरिण आछी लोवडी।

तुंग तुरीय जिम भीड़ती गात्र।

साईय लेती सामुही।

हंसि हंसि बूझती प्री तणी बात॥

असीय बरस की बूढइ बेस।

दंत कवाड़्या सिरि पांडुरा केस।

आइ अवासइ संचरी।

गलइ लागी अनइ रुदन करंति।

किउं दिन काटइ हे भाणिजी।

रात दिवस मोनइ थारडी चिंत।

जेतलइ आवइ सइंभरि धणी।

तो नइ महा अपूरब करि द्युं मीत॥

बात सुणी कूटणी चालीय ऊठि।

पाटलउ लेइ मचकाइयउ पूठि।

पेट फडावउं थारउ कूटणी।

कोकउं देवर अरु वडउ जेठ।

काढउं जीभ जिण वोलियउ।

नाक सरीसा काटउं दूनिउ होठ॥

गोरठी वइठी छइ पंडिया कइ आइ।

कर जोड़ी अरु लागुं पाइ।

राजमति करइ वीनती।

पंडिया कहिज्यो म्हारइ प्रीय नइ जाइ।

डावां हाथ कउ मूंदड़उ।

ढलिक करि आवइ हो जीमणी बांह॥

पंडिया जाइ कहे धण का नाह।

तइ मोनइ दीधी थी जीमणी बांह।

चंद सूरिज दुइ साखिया।

पवन पाणी अरु धरती आकासि।

धूप जयायउ थउ वंभणा।

हउ तउ मूवी हो स्वामी तणइ वेसासि॥

बालुं हो धणीय तुम्हारडउ जांण।

कठिन पयोहरां तिज्यउ परांण।

बालउ जोबन, खिसी गयउ।

जोबन के सिरि बांधिया नेत।

जिण बांधिया रावण खिस्यउ।

त्रिय कारणि राम बांधियउ सूरा सेत॥

कातिग मासह जणह चलाइ।

नान्हडउ आखर गुपति लिखाइ।

आप हस्तइ लिखी गोरडी।

जिम जिम बाचसीय तिम तिम हुस्यइ हेत।

घणीय उमाहउ लागसी।

सखी राजा करिस्यउ घरइ की चित॥

चीरी लिखी धण आपणइ हाथ।

पंडिया हो चालि हेडाऊ कय साथि।

सात सउ कोसकउ गामंतरउ।

पंडिया रूडा चालिज्यो देस की सीम।

तावडउ गिणज्यो छाहडी।

म्हारी चीरी राखिज्यो जिउं थारउ जीव॥

सात सहेलीय बइठी छइ आइ।

छानउ लिखीउ तेह माहि सुणावि।

लालच लिखिया बहिनड़ी।

साम्हइ हियडलइ जीमणी कूंखि।

दुइ नख लागा नाह का।

आप समांणी करती आलि।

धण विसहर प्रीयड गारुडी।

आउ सामी थारा डंक संभालि॥

नाल्ह म्हाका दुख सहिसी कउण।

म्हे तउ पलिंग तज्यउ नइ परहर्‌यउ लूण।

पान सोपारीय विस बडइ।

ले जपमालीय मइ जपउं नांहि।

दीह गिणंता नह घस्या।

म्हांकी काग उडावतां थाकीय जीमणी बांह॥

जाणियउ हो राजा थाकउ जांण।

दुहुं रे काया मिलउ एक परांण।

सा क्यउं दूरि थी मेल्हियइ।

कुल की रे बेटीय सील जंजीर।

जोबन राखउं मइ चोर जिउं।

पगि पगि तो नइ पहूंच रे पाप।

इणि भवि उलगाणउ हूउ।

अवर भवि होयउ कालउ सांप॥

पंडिया जइ तूं चालियउ प्रीय कइ देसि।

हउं रि कहउं वीरा तिउ रि कहेसि।

एक सरां घरि आवज्यो।

थारी बाट बुहारूं सिरह का केसि।

जोबन भरि जल ऊलट्यउ।

थाग पावुं धरह नरेस॥

पंडिया तिम कहेज्यो जिम प्रीय नि रिसाइ।

साधण तुझ विण अन्न खाइ।

कुहाणी फाटउ रे कंचुकउ।

खोपरी फाठउ तु धण केरउ चीर।

जिम दव दाधो लाकड़ी।

तूं तउ उवइगउ रे आविज्यो नाणदका बीर॥

कहि नइ गोरी थारा प्रीयरा अहिनाण।

थोड़ा थोड़ा म्हानय दे सहिनाण।

किण उणहारइ सारिखउ।

लहुड़ा देवर कइ उणहारि।

एह गोरउ प्रीय सामलउ।

सीस तिलक नितु नवइरे विहाण।

उरि चौडउ कड़ि पातलउ।

ऊंचल रे जाडउ कडि जमडाढ।

लाखां माहि पिछाणिजइ।

पंडिया प्रीय छइ एह सहिनाण॥

बलि कहि गोरी थारा प्रीयरा अहिनाण।

थोड़ा थोड़ा म्हांनइ दे सहिनाण।

किण उणहारइ सारिखउ।

दाढीय रायकइ भमर भमाइ।

मस्तक माहे केवड़उ।

माहिलइ कीइय जीमणी आंखि।

कालउ तिलक अछइ भमर जिसउ।

कड़ि तरकस छइ जहंउ किरवाण।

तेजीय चडयउ राजा नवलखइ।

पंडिया प्रीय छइ एह सहिनाण॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
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