दूहा

एक आंधो नें एक पांगळो, दोनूं पड़िया अटवी मांय।

इणरे आंख नहीं उणरे पग नहीं, त्यां सूं नगर गयो नहीं जाय॥

आंधो डूंडाटी मारतो थको, आमों साहमों भमलेटा खात।

पांगळो पड़ियो तिहां आवियो, दोनूं करे मांहोमांहि बात॥

पांगळो कहे हूं दुखियो घणो, हूं पड़ियो छूं अटवी मांय।

दोनूं पग नहीं भाई मांहरे, मोसूं नगर गयो नहीं जाय॥

जब आंधो कहे हूं पिण दुखियो घणो, हूं पिण मारूं अटवी में डूंडाट।

आंख्या विण नगर पोहचूं नहीं, नोनें कुण बतावे बाट॥

जो तं खांधे वेसे मांहरे, तूं मोनें मारग चलाय।

तो आपां दोनं जणा, नगरी पहुंचा जाय॥

ढाळ

पांगळो सुण हरख्यो ताहि, मिसलत कीधी मांहोमांहि।

पांगळा नें उठायो आंधे, बेसाण्यो पोतारा खांधे॥

पांगळो ते आंधा नें चलावे, सांनीकर मारग बतावे।

इण विध अटवी लांघी ताहि, दोनूं आया छें नगरी मांहि॥

नगरी आया तो सुखिया हुआ, अन्न पांणी बिनां नहीं मुवा।

दिष्टांत रूड़ी रीत जांणों, संसार ने मुगत पिछाणों॥

मोटी अटवी जिम संसार, तिण में दुखिया जीव अपार।

नगर जिम मुगति नं जांणो, तिण नें रूडी रीत पिछांणो॥

आंधा ज्यूं जीव ग्यांन रहित, अग्यांनी मिथ्यात सहित।

तिण रे क्रिया रूप नहीं पाय, ते मुगत नगर किम जाय॥

ते जीव क्रिया करवा लागो, पिण नहीं जांणे मुगत रो मागो।

जिण आगम नों जांण नांहीं, जीवादिक जांणे काई॥

ते मुगत नगर किम जावें, संसार में झोला खावें।

ते तों आंधा जेम अळूझें, ग्यांन बिनां संवळो सूझें॥

कदा जीवादिक नो हुवो जांण, मोख मारग लियो पिछांण।

पिण क्रिया करणी नहीं आवे, तो पिण मुगत नहीं जावे॥

मिळिया आंधो ने पांगळो दोय, सुखे नगर पोहता सोय।

ज्यूं ग्यांन क्रिया नों संयोग थाय, तो जीव मुगत माहे जाय॥

क्रिया तो ग्यान छे नाहीं, क्रिया तो जांणे देखे नहीं कांइ।

क्रिया तो सुमता रस भाव, कर्म रोकण तोड़ण रो सभाव॥

ग्यांन दरसण छें उपयोग, ते जांणे देखे लोक अलोक।

कोइ क्रिया नें कहे उपयोग, तिण ते मोटो मिथ्यात रो रोग॥

ग्यान क्रिया छे दोय, त्या नें एक जांणो कोय।

त्यांरो सभाव जूवो जूवो जांणो, त्यांने रूड़ी रीत पिछांणो॥

स्रोत
  • पोथी : आचार्य भिक्षु ग्रंथावली भाग 1 ,
  • सिरजक : आचार्य भिक्षु ,
  • संपादक : आचार्य तुलसी, श्रीचंद रामपुरिया ,
  • प्रकाशक : जैन श्वेताम्बर्त रापंथी महासभा, कलकत्ता ,
  • संस्करण : प्रथम
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