चौपाई
राति दिवस भीनो रहै रे, पदमणि स्युं बहु प्रेम रे रंग रसीया।
पंच विषय सुख भोगवै रे, दोगंधक सुर जेम रे रंग रसीया॥
जीव एक नइं जूजूई रे, देही दीसें दोइ रे रंग रसीया।
चित लागो चतुरां तणो रे, चोल तणी परि जोइ रे रंग रसीया॥
चंदवदन ऊपरि घटा रे, सोहें वेणीदंड रे रंग रसीया।
अथ मृगानयणी ऊपरइ रे, बांध्यो जाळ प्रचंड रे रंग रसीया॥
ताटी मरकत मणि तणी रे, अथवा जाणि भुजंग रे रंग रसीया।
घाटी मन घेरण तणी रे, पाटि वणीय सुचंग रे रंग रसीया॥
सैधो सिंदूरइ भर्यो रे, जाणे रविकर एक रे रंग रसीया।
कब तम पामी एकली रे, बांधी सब धरि टेक रे रंग रसीया॥
सीसफूल तारा भला रे, अरधचंद सम भाग रे रंग रसीया।
विंदी जाणे मणि धरी रे, पीवत अमृत नाग रे रंग रसीया॥
श्रवण किना सोवन तणी रे, सीप सुघट मन फंद रे रंग रसीया।
कुंडळ रे मिसि देखवा रे, आया सूरज चंद रे रंग रसीया॥
अणियाळे काजळ भरी रे, निपट रसीले नयण रे रंग रसीया।
चंचल चतुरा चित हरइ रे, देखत उपजै चैन रे रंग रसीया॥
नयण कमळ ऊपरि वण्या रे, भूंहा भमर समान रे रंग रसीया।
दीपशिखा सम नासिका रे, देखण रूप निधान रे रंग रसीया॥
नासा शुक सोवन तणी रे, बेसर मोती जेह रे रंग रसीया।
आंब सोवट द्ये चंच में रे, विधु बालक सन्नेह रे रंग रसीया॥
काया सोवन तसु तणी रे, गोरा गाल रसाल रे रंग रसीया।
आरीसा कंदर्प तणा रे चंद, सरीसो भाल रे रंग रसीया॥
पाका बिंब मधु समा रे, ओपित विद्रुम जाण रे रंग रसीया रे।
मामोल्या जिम रातड़ा रे, अधर सुधारस खाण रे रंग रसीया रे॥
जाणें मोती लड़ पोई धर्या रे, अधर विद्रम विचि दंत रे रंग रसीया।
चमकै चूनी सारिखा रे, दाड़िम कूलीय दीपंत रे रंग रसीया॥
कोकिल कंठ सुहामणो रे, पति भुज वल्ली खम्भ रे रंग रसीया।
मोतिन की दुलड़ी वणी रे, त्रिवली रेख अचंभ रे रंग रसीया॥
भुजादण्ड सोवन घड़्या रे, कोमल कळस सुनाळि रे रंग रसीया।
मूंगफळी चम्पा कळी रे आंगुलिया सुविशाल रे रंग रसीया॥
कनक कुंभ श्रीफळ जिसा रे, कुच तटि कठिन कठोर रे रंग रसीया।
पाका वील नारिंग सा रे, मानुं युगल चकोर रे रंग रसीया॥
कोमल कमल ऊपरें रे, त्रिवली समर सोपान रे रंग रसीया।
कटि तटि अति सूक्षिम कही रे, थूल नितंब वखाण रे रंग रसीया॥
जंघा सुंडा करि वणी रे, उलटां कदळी खंभ रे रंग रसीया।
सोवन कच्छप सारिखा रे, चरण हरण मन दंभ रे रंग रसीया॥
सकल रूप पदमणी तणो रे, कहत न आवै पार रे रंग रसीया।
‘लब्धोदय’ कहै आठमी रे, ढाल रसिक सुखकार रे रंग रसीया॥
दूहा
हंस गमणि हेजइं हीइं, राति दिवस सुख संग।
राणो लीण हुओ तुरत, जिम चंदन तरुहि भुजंग॥
दूहा गूढ़ा गीत स्युं, कवित कथा बहु भांति।
रीझवियो राणो चतुर, क्रीड़ा केलि करंति॥