जिण दिन सज्जण बीछड़्या, चाल्या सीख करेह।
नयणे पावस ऊलस्यौ, झिरमिर नीर झरेह॥
सज्जण चल्या विदेसड़ै, ऊभा मेल्हि निरास।
हियड़ा मैं ते दिन थकी, मावै नाहीं सास॥
जीव थकी वाल्हा हता, सज्जनिया ससनेह।
आडी भुंय दीधी घणी, नयण न दीसै तेह॥
खावौ पीवौ खेलबौ, कांइ न गमई मुज्झ।
हियड़ा मांही रात दिन, ध्यान धरूं इक तुज्झ॥
सयणां सेती प्रीतड़ी, कीधी घणै सनेह।
दैव बिछोहो पाड़ियौ, पूरी न पड़ी तेह॥
सयणां सेती जीमतौ, बैसंतौ पिण सैण।
कहियै सैण न वीसरइ, ध्यान धरूं दिन रैण॥
सुणि सज्जण तुझ नै कहूं, मुझ मन वीसारेह।
एक बार इक बरस मंइ, हित सूं चीतारेह॥
थोड़ा बोला घण सहा, नांणै मन में रीस।
एहा सज्जण तौ मिलै, जो तूठै जगदीस॥
पंजर छइ मुझ पाखती, जीव तुमारे पास।
राति दिवस दोलौ भमै, ज्यूं चंदो भमै अकास॥
सज्जण तूं मो मन बसै, जिम चकवी मन भांण।
बीसारूं तुझ नैं नहीं, जां लगी घट में प्राण॥
सज्जन केरा गुण घणा, न लहूं अंत न पार।
ते सज्जण किम बीसरै, आतम ना आधार॥
सज्जन मीठा बोलड़ा, जेही मीठी खंड।
आवी नै संभळावता, सीतळ करता पिंड॥
मन ऊल्हसतौ माहरौ, देखि सुरंगा सैण।
ते सज्जण थी बीछड़्यां, झूरण लागा नैण॥
सज्जण वैण सुणावता, सीतळ करता गात।
दैव बिछोहौ पाड़ियौ, किम जास्यै दिन रात॥
सज्जण मुख देखि करी, पूरवतो मन हांम।
ते सज्जण थी बीछड़्यां, हिवे जीवणौ हरांम॥
सज्जनिया मो चित्त चढ्या, ज्यूं चावळ चढै निलाड़ि।
वाल्हा अेकरसौ वळे, साहिब तिके दिखाड़ि॥
चतुराई, छति, मति, उकति, नैण, वैण मुख मिट्ठ।
अेकणि मोरा चित्त मइं, अवर न क्यां ही दिट्ठ॥
सज्जण तैं चोरी किरी, किणैं पुकारूं जाय।
हियड़ै लोही काढि नै, तन मन लियो छिनाय॥
तूं ही मोरी आतमा, तूं हीज मोरो जीव।
सास तणी परिसासतो, संभारिस्यूं सदीव॥
सज्जण मंनड़ो मांहरो, दीधौ छै तम हाथ।
जिम जाणो तिम राखिज्यो, मरण जिवण तम साथ॥
सज्जण मंनड़ो मांहरो, मूक्यो छै तम पास।
जतन करीनै राखज्यो, मत मेलौ नीरास॥
घणूं घणूं कहियै किसूं, कहतां आवै लाज।
आतमा ना आधार छौ, सज्जनिया सिरताज॥
सज्जण तुम सूं वातड़ी, कीधी छै दोय च्यार।
ते संभारी जीव सूं, एहिज मुझ आधार॥
जे सूं मननी प्रीतड़ी, ते सज्जण परदेस।
हियड़ा कांई फाटै नहीं, जीवी कहा करेस॥
हियड़ा भीतरी तूं वसइ, अवर न जाणै सार।
कै मन जाणै माहरो, कै जाणै करतार॥
सूतां सपनां में मिलै, जो जागूं तो जाय।
चित्त वसतां सज्जणां, इण परि रयण विहाय॥
सैणां साथै प्रीतड़ी, कीधी सुख नै काज।
सुख सपनां ज्यूं वह गयौ, दुख लीधौ तंइ काज॥
रे चतुरंग चोरड़ी, तैं मन लीधौ चोरि।
राख्यो आपण वस करी, बांध्यौ गुणनी डोरि॥
वीसरियां न वीसरइ, चीतारियां दहदंति।
सज्जण हियड़ै वसि रह्यो, सुपनै आय मिलंति॥
सज्जण सेती गोठड़ी, जो मेलै करतार।
तो कांई बिछोहौ पाड़ियौ, कांई दुख दियौ अपार॥
सज्जण हियड़ै वसि रह्या, नयणै नवि दीसंति।
जमवारो किम जावसी, मुझ मन सबळी चिंत॥
नमणा खमणा बहु गुणा, कंचन जिम कसियांह।
एहा सज्जण माहरै, हीयड़ै में बसियांह॥
सज्जण सेती गोठड़ी, जे मेलै जगदीस।
हित सूं हियड़ा ऊपरै, तउ राखूं निसदीस॥
सज्जण तूं मो वालहो, जेहो वाल्हो दाम।
आठ पहुर हियड़ा थकी, कदे न मेलूं नाम॥
सज्जण थया विदेसड़इ, क्यूं करि मिलियै जाइ।
दैव न दीधी पांखड़ी, न मिलइ कोइ उपाइ॥
मुख मीठा दीठा गमइ, अमी भर्या दोय नैण।
सज्जनिया सालै नहीं, सालै सज्जण वैण॥
सयण संदेसा आपवो, सैगूं माणस साथि।
आणि नै ते मो भणी, आपै हाथो हाथि॥
दोधक-छत्तीसी रची, सैंणां हंदै काज।
हेत-प्रीत कागळ लिखी, मोकळिजो जसराज॥