अलख निरंजण आप,

कुदरत-पत उतपत करण।

सुरसत उकत समाप,

दरखत रा गुण दाखवूं॥

आई बिरखा अेह,

विरछां छाई वेलड़ी।

निपट नहाई नेह,

मुळकाई थळवट मही॥

इळा रूंख ऊगंत,

बिन सींचियां बधंत वे।

विकसै फूल वसंत,

जिके हुलस निरखंत जंग॥

ईश्वर कुदरत अेक,

रूप अनेक रचंत वे।

हरियौ रूंख हरेक,

रख विवेक रखवाळणो॥

उपवन सूं आवंत,

पवन झकोरा प्रेम रा।

भाद्रव मन भावंत,

जीवण - धन जगत रौ॥

खमण नमण गुण खास,

श्रमण भाव आचरण सत।

आतम-रमण उजास,

प्रात भ्रमण रूंखां परस॥

गिरां तरवरां गेह,

नदी सरोवर निरझरां।

जीव वनचरां जेह,

पाळग गरीब- परवरां

गुणकारी रुत गेड़,

संसारी जीवां सकळ।

पर उपकारी पेड़,

जटधारी जोगेस ज्यूं

गूंजे धरती गीत,

मेहळियां मन मीत रा।

पणिहारी री प्रीत,

रीत मेह तरु नेह री॥

चौमासै री चूंप,

हेर रूप हरखै हियौ।

कविता में रसकूंप,

उकती अनूप ऊकलै

छटा रूंख छाजंत,

मेघ घटा छायां मही।

सरस थटा साजंत,

मोर सूवटा व्है मगन

जमै हथाई जोर,

सैण सगा व्है उण समै।

धमै ऊधमै धोर,

रूंखां तळ टाबर रमै

झंगी रूंखां झाड़,

लेत सुरंगी लूहरां।

पंगी सिखर पहाड़,

चंगी छिब चत्रमास में

डहकै फूलां डाळ,

चहकै मीठी चिड़कल्यां।

हद महकै हरियाळ,

लहकै वेलां लचकती

स्रोत
  • पोथी : रूंख - रसायण ,
  • सिरजक : डॉ. शक्तिदान कविया ,
  • प्रकाशक : थलवट प्रकाशन, जोधपुर