केल रित सारी कह देत मरग जी सारी,

जतारी कंचुकी तनी ते जान पाए हैं।

पाइ को म्हाउर म्हाउर प्रभास प्रीत,

लाल गुही वेनी वाल छप्पे छिपाई हो।

कहै सिरदार कीन्हो बिपन बिहार भारी,

गिरधारी संग अंग अंग छबि छाई हो।

बातन उडावती हो भृकुटी चढाइ अब,

फूल की ये फूल लीये कुंजन ते आई हो॥

स्रोत
  • पोथी : सुर-तरंग ,
  • सिरजक : सरदार सिंह ,
  • संपादक : डी.बी. क्षीरसागर ,
  • प्रकाशक : राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर। ,
  • संस्करण : प्रथम