कंचन लता सी थहरात अंग अंग मिलि,
सीकर समूह अंग अंगनि मैं दरसै।
चुंबन कपोल नैन खंडन अधर नख,
गहत पयोधर प्रचंड पानि परसै॥
आनँद उमंगन मैं मुसकात वाल तुत,
रात बतरात सतरात रस बरसै।
लपटनि झपटनि मसकनि अनेक अंग,
रति रंग जंग तैं अनंग रंग सरसै॥