करि प्रणाम रवि ताम ध्यान ग्यानह मन धारे।

धसण धोम विचि धार वसण वैकुंठ विचारे॥

तजे मोह चढि सोह लोह बोहां जुध लिज्जण।

ताणि मूंछ ऊससे जाणि पांडव्व अरजण॥

उल्हसै रोम पौरस्स अति ग्रहे पछाडण गैवरां।

रूठौ सरीर उप्परि रतन तूठौ सीस पळच्चरां॥

स्रोत
  • पोथी : वचनिका राठौड़ रतनसिंघजी महेशदासौत री ,
  • सिरजक : खिड़िया जग्गा ,
  • संपादक : काशीराम शर्मा, रघुवीरसिंह ,
  • प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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